Vivek Chand Sehgal: मां-बेटे की कंपनी से कंगारुओं के देश तक—एक भारतीय की Global Empire Story I 2025

सोचिए ज़रा… एक छोटा सा कमरा, पुरानी सी टेबल, पास बैठी एक मां, और सामने खड़ा उसका जवान बेटा—जेब में ज्यादा पैसा नहीं, पहचान भी नहीं, लेकिन आंखों में कुछ ऐसा जुनून जो आज नहीं तो कल दुनिया को मजबूर कर दे झुकने पर। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही मां-बेटे की जोड़ी एक दिन ऑस्ट्रेलिया की धरती पर सबसे अमीर भारतीय की कहानी लिखेगी। और यही सस्पेंस इस कहानी को खास बनाता है—क्योंकि यह सिर्फ अमीरी की कहानी नहीं है, यह गिरकर उठने, हार को सीख में बदलने और खुद पर भरोसा रखने की कहानी है।

हम अक्सर कहते हैं—मेरे पास resources नहीं हैं, मेरे पास support नहीं है, सिस्टम मेरे खिलाफ है। लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया में सबसे बड़ी कमी resources की नहीं, resolve की होती है। और यही resolve दिखता है Vivek Chand Sehgal की जिंदगी में। एक ऐसा नाम, जो आज global auto industry में respect के साथ लिया जाता है I

लेकिन जिसकी शुरुआत इतनी साधारण थी कि शायद आप खुद को उससे जुड़ा हुआ महसूस करने लगें। यह कहानी उस लड़के की है जिसने अपनी मां के साथ मिलकर बिजनेस शुरू किया, पहला बिजनेस फ्लॉप होते देखा, कर्ज और uncertainty का स्वाद चखा, लेकिन फिर भी रुकने के बजाय direction बदली। यही वो मोड़ था जहां किस्मत नहीं, सोच बदलती है। 1970s का भारत—ना startup ecosystem, ना mentors, ना venture capital। सिर्फ मेहनत, ईमानदारी और long-term vision।

Vivek Chand Sehgal महज 18 साल के थे, जब उन्होंने commission पर चांदी ट्रांसपोर्ट करने का काम किया। पैसा कम था, risk ज्यादा, लेकिन सीख priceless थी। बाजार कैसे चलता है, भरोसा कैसे बनता है, और सबसे जरूरी—कैश फ्लो कितना critical होता है। यही शुरुआती lessons बाद में एक global empire की foundation बने।

1975 में उन्होंने अपनी मां स्वर्ण लता सहगल के साथ मिलकर एक छोटा सा venture शुरू किया—नाम रखा गया मदरासन ट्रेडिंग कंपनी। यह सिर्फ एक कंपनी नहीं थी, यह एक मां के भरोसे और बेटे के सपने का संगम था। मां ने पूंजी से ज्यादा जो दिया, वो था emotional strength। जब दुनिया सवाल करती है, तब घर से मिलने वाला भरोसा सबसे बड़ी ताकत बनता है।

कंपनी का नाम “मदरासन” उनके पिता ने सुझाया था। एक simple सा नाम, लेकिन इसके पीछे छुपा था trust और roots से जुड़ाव। विवेक बाद में कहते हैं कि यह नाम उन्हें हर दिन याद दिलाता है कि वे कहां से आए हैं और क्यों आगे बढ़ना है। लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। चांदी का बाजार गिरा, एक competitor दिवालिया हुआ, और पूरी इंडस्ट्री हिल गई।

पैसा डूबा, confidence shaken हुआ, लेकिन सपने नहीं टूटे। यही वो moment होता है जहां ज्यादातर लोग quit कर लेते हैं। लेकिन विवेक ने सवाल बदला—“मैं क्या गलत कर रहा हूं?” से “अब क्या नया किया जा सकता है?” की तरफ। उन्होंने electrical wiring के काम की तरफ रुख किया। 1977 में पहली cable factory शुरू हुई। यह decision बाद में history बन गया।

फिर आया 1983—एक ऐसा साल जिसने सिर्फ एक कंपनी नहीं, पूरे भारत की mobility बदल दी। देश में पहली बार एक affordable car का सपना साकार हो रहा था। Maruti 800 assembly line से बाहर आने वाली थी। यह सिर्फ एक car नहीं थी, यह middle-class aspiration की symbol थी। और यहीं मदरसन की कहानी ने रफ्तार पकड़ी।

विवेक को पता चला कि Maruti की wiring harness जापान की एक कंपनी ने design की है। यहां एक आम businessman शायद wait करता, contacts ढूंढता, लेकिन विवेक ने दस दिन के अंदर वीज़ा लिया और Tokyo पहुंच गए। ना appointment, ना guarantee—सिर्फ confidence और clarity। उन्हें factory देखने से मना कर दिया गया, लेकिन वे sample लेकर लौटे और भारत में day-night मेहनत करके वही quality replicate की।

यह सिर्फ manufacturing नहीं थी, यह mindset shift था—“हम भी world-class बना सकते हैं।” यही सोच आगे चलकर जापानी partnership में बदली। Technical agreement से शुरू होकर यह रिश्ता joint venture बना। भारत में पहली बार automotive wiring harness local level पर बना। जब Maruti plant का उद्घाटन हुआ, उसमें मदरसन का product इस्तेमाल हुआ। उस दिन शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह एक global journey की शुरुआत है। 1986 में joint venture formal हुआ। 1990s में liberalization आया। Foreign brands भारत में आईं, लेकिन साथ ही local sourcing पर जोर बढ़ा। यह वही मौका था जहां prepared mind opportunity को पहचानता है। मदरसन ने quality, scale और reliability—तीनों पर focus किया।

1993 में कंपनी stock exchange पर list हुई। सिर्फ एक million dollars जुटाए गए, लेकिन confidence billion-dollar का था। अगले साल एक और बड़ा मौका आया—Mercedes-Benz। भारत में luxury cars का concept नया था। Mercedes ने Pune में assembly शुरू की और मदरसन को wiring harness बनाने की जिम्मेदारी दी। सिर्फ 39 दिनों में एक नया plant खड़ा कर दिया गया। यह speed, execution और commitment का unmatched example था।

Mercedes के साथ काम करना सिर्फ revenue नहीं लाया, credibility भी लाई। Global brands ने देख लिया कि एक Indian company भी international standards meet कर सकती है। धीरे-धीरे dashboard assemblies, complex modules—सब portfolio में जुड़ते गए। 1997 तक Hyundai, Ford जैसे brands भी जुड़ चुके थे। अब मदरसन सिर्फ Indian supplier नहीं रहा, वह global tier-1 बनने की राह पर था।

लेकिन विवेक यहीं नहीं रुके। उन्होंने global exposure को next level पर ले जाने का फैसला किया। 1990s में वे अकेले business migrant के रूप में Australia गए। एक नई जमीन, नया सिस्टम, नया culture। वहां उन्होंने देखा कि Australian manufacturers कैसे बिना ज्यादा capital लगाए volume बढ़ाते हैं। Process efficiency, worker pride, systems thinking—यह सब उन्होंने absorb किया।

उनकी famous line बाद में philosophy बन गई—Japanese training, Australian execution, और Indian entrepreneurship—तीनों ने मिलकर मदरसन को बनाया। उन्होंने Melbourne के पास घर खरीदा, बच्चों को local school में पढ़ाया, और 1997 तक Australian citizen बन गए। लेकिन दिल और vision हमेशा global रहा।

Australia में उन्होंने joint ventures किए, नई technologies सीखी—headlights, door trims, advanced modules। यह diversification बाद में global expansion में काम आई। आज जब हम global supply chains की बात करते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि यह journey overnight नहीं बनती। यह decades की consistency से बनती है।

आज मदरसन ग्रुप 44 देशों में फैला है। Automotive, aerospace, technology—हर sector में presence है। Mercedes-Benz, Audi, Volkswagen जैसे premium brands से लेकर Airbus जैसे aerospace giants तक—सबके लिए critical components बनते हैं। Wiring, polymers, vision systems—यह सब invisible होते हैं, लेकिन इनके बिना कोई car, कोई plane, कोई system चल नहीं सकता।

यही सबसे बड़ी irony है—सबसे जरूरी चीजें अक्सर दिखाई नहीं देतीं। जैसे wiring harness। और शायद यही Vivek Chand Sehgal की leadership style भी है—low profile, high impact। ना flashy interviews, ना over-marketing। सिर्फ execution और long-term thinking।

उनकी net worth billions में है, लेकिन उनसे पूछिए सबसे बड़ी achievement क्या है, तो जवाब होगा—global trust। 2022 में उन्होंने India wiring business को अलग कर दिया और उसे stock exchange पर list कराया। यह strategic clarity दिखाता है—right structure at right time।

यह कहानी हमें सिर्फ business lessons नहीं देती, यह life lessons देती है। पहला—failure final नहीं होता। दूसरा—partnerships तब काम करती हैं जब humility और learning mindset हो। तीसरा—global बनने के लिए local roots मजबूत होना जरूरी है। आज जब कोई young entrepreneur कहता है कि competition बहुत है, market tough है, system unfair है—तो यह कहानी याद रखिए। 1970s का India उससे कहीं ज्यादा tough था। फर्क सिर्फ इतना था कि उस दौर में excuses कम थे, hunger ज्यादा थी।

Conclusion

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