ज़रा सोचिए… एक ऐसा देश जिसे दुनिया की सबसे ताक़तवर अर्थव्यवस्था कहा जाता है, जहाँ डॉलर को वैश्विक करेंसी का दर्जा मिला हुआ है, जहाँ वॉल स्ट्रीट का उतार-चढ़ाव पूरी दुनिया के बाज़ारों को प्रभावित करता है—वही देश अब Recession की कगार पर खड़ा है। यह कोई आम गिरावट नहीं है, बल्कि ऐसा संकट बताया जा रहा है जो कोविड महामारी के दौरान देखे गए आर्थिक झटके से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है।
अमेरिका के हर गली-मोहल्ले में आज अनिश्चितता का साया है। लोग नौकरी खोने के डर में जी रहे हैं, कंपनियाँ छँटनी की तैयारी कर रही हैं और महंगाई हर अमेरिकी परिवार की रसोई तक पहुँच चुकी है। यह वह तस्वीर है जो हमें बताती है कि ताक़तवर भी कभी-कभी अपने ही बनाए जाल में फँस जाते हैं। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
डोनाल्ड ट्रंप, जिन्होंने “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का नारा देकर दूसरी बार सत्ता में वापसी की, आज उसी वाक्य के उलट हालात में खड़े हैं। उन्होंने वादा किया था कि वह अमेरिकी उद्योगों की रक्षा करेंगे, नौकरियाँ अपने देश के नागरिकों के लिए बचाएँगे और व्यापार घाटा कम करेंगे।
इसके लिए उन्होंने टैरिफ को हथियार बनाया। उन्होंने चीन, यूरोप, भारत और कई अन्य देशों से आने वाले सामान पर भारी-भरकम शुल्क लगा दिए। उनका तर्क था कि इससे विदेशी सामान महंगा होगा और अमेरिकी कंपनियाँ ज्यादा उत्पादन करेंगी। लेकिन वास्तविकता इसके उलट निकल रही है। इन टैरिफों से विदेशी सामान तो महंगा हुआ, लेकिन साथ ही अमेरिकी कंपनियों के लिए कच्चा माल भी महंगा हो गया। इसका असर उत्पादन लागत पर पड़ा और अंततः महंगाई उपभोक्ताओं तक पहुँच गई।
वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज़ की ताज़ा रिपोर्ट इस खतरे को और गंभीर बना देती है। मूडीज़ के चीफ इकोनॉमिस्ट मार्क जैंडी ने कहा है कि अमेरिका अब Recession के मुहाने पर खड़ा है। जैंडी वही शख्स हैं जिन्होंने 2008 की महामंदी का सबसे पहले अनुमान लगाया था। उस वक्त उनकी चेतावनी को कई लोगों ने नज़रअंदाज़ कर दिया था, लेकिन कुछ महीनों बाद ही लेहमन ब्रदर्स जैसे दिग्गज बैंकों का पतन हुआ और पूरी दुनिया में आर्थिक हलचल मच गई। आज वही जैंडी कह रहे हैं कि इस बार का संकट और भी गहरा है।
जैंडी का कहना है कि अमेरिका के जिन राज्यों का योगदान कुल अर्थव्यवस्था में एक-तिहाई से अधिक है, वे पहले ही गिरावट का सामना कर रहे हैं। उनके उत्पादन में कमी आ रही है, इंडस्ट्रीज़ ठहर गई हैं और कई राज्यों में रोजगार का ग्राफ़ नीचे जा चुका है। सोशल मीडिया पर लिखे अपने पोस्ट में उन्होंने साफ कहा—“33% हिस्सेदारी वाले राज्य या तो Recession में हैं या उसके बिल्कुल कगार पर हैं। अगर अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो यह स्थिति देशव्यापी संकट में बदल सकती है।”
अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत चौंकाने वाली है। कोविड महामारी के दौरान जब पूरी दुनिया ठहर गई थी, तब भी अमेरिका ने बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन पैकेज देकर नौकरियाँ बचाई थीं। उस समय हर महीने औसतन 1.75 लाख नई नौकरियाँ निकल रही थीं। लेकिन 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 85 हज़ार रह गई है। यानी महामारी के दौर से भी बदतर स्थिति बन चुकी है। इसका मतलब यह है कि कंपनियाँ अब नई भर्ती करने से बच रही हैं, कई जगह छँटनी हो रही है और नौजवानों को नौकरी के अवसर नहीं मिल रहे।
मार्क जैंडी ने चेतावनी दी है कि यह Recession अमेरिकी नागरिकों पर “दोहरा संकट” बनकर टूटेगी। पहला संकट महंगाई का है। मौजूदा समय में अमेरिका की महंगाई दर 2.7% है, लेकिन अगर हालात नहीं सुधरे तो यह 4% तक पहुँच सकती है। ज़रा सोचिए, जब खाने-पीने की चीज़ों से लेकर पेट्रोल और दवाइयों तक सब कुछ महंगा हो जाए तो आम आदमी का बजट कैसे बिगड़ता है। दूसरा संकट नौकरियों का है। जब लोगों की आय घटेगी और खर्च बढ़ेगा तो परिवार टूटने लगेंगे। जिन लोगों ने घर, गाड़ी या पढ़ाई के लिए लोन लिया है, वे किस्तें नहीं चुका पाएँगे और बैंकिंग सेक्टर पर भी दबाव बढ़ेगा।
आज अमेरिकी नागरिकों के लिए ज़िंदगी और मुश्किल हो गई है। किराये लगातार बढ़ रहे हैं, हेल्थकेयर पहले से ही बेहद महंगा है और शिक्षा पर खर्च आसमान छू रहा है। अब अगर नौकरियाँ भी कम हो जाएँ तो परिवारों के लिए यह स्थिति असहनीय होगी। कई परिवार पहले ही “पेचेक टू पेचेक” ज़िंदगी जी रहे हैं—यानी हर महीने की सैलरी से ही उनका खर्च चलता है, बचत नहीं होती। ऐसे हालात में नौकरी का जाना या कीमतों का बढ़ना उनके सपनों को चकनाचूर कर देता है।
ट्रंप की नीतियों को लेकर अब अमेरिका के भीतर भी आलोचना बढ़ रही है। टैरिफ लगाने से अमेरिका का व्यापार घाटा तो कम नहीं हुआ, उल्टा घरेलू उत्पादन महंगा हो गया। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए टैरिफ का उदाहरण लें—अमेरिकी ऑटो कंपनियों को कच्चा माल महंगा मिला और उन्होंने इसकी भरपाई गाड़ियों की कीमत बढ़ाकर की। नतीजा यह हुआ कि गाड़ियों की बिक्री कम हो गई और उत्पादन घटने लगा। यही हाल इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर का भी हुआ। इससे यह साबित हुआ कि टैरिफ का बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं पर ही आता है।
इतिहास हमें सिखाता है कि जब अमेरिका Recession में जाता है, तो पूरी दुनिया को इसकी गूँज सुनाई देती है। 1929 की ग्रेट डिप्रेशन ने यूरोप और एशिया को भी झकझोर दिया था। 2008 की Recession का असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ा था। लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की नौकरियाँ गई थीं और हमारे स्टॉक मार्केट धराशायी हो गए थे। इस बार भी अगर अमेरिका फिसलता है तो इसका असर भारत, चीन, यूरोप और बाकी दुनिया पर ज़रूर होगा। Export घटेगा, foreign investment कम होगा और ग्लोबल इकॉनमी एक बार फिर धीमी पड़ जाएगी।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे मानवीय पहलू है—लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी। कल्पना कीजिए, एक अमेरिकी परिवार जो अपने बच्चों की यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के लिए लोन चुका रहा है। पति-पत्नी दोनों काम करते हैं, लेकिन अचानक पति की नौकरी चली जाती है। महंगाई के कारण रोज़मर्रा का खर्च बढ़ गया है और लोन की किश्तें भी चुकानी हैं। ऐसे में परिवार टूटने लगता है, रिश्तों में तनाव आ जाता है और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। यही वह मानवीय त्रासदी है जिसे आंकड़े कभी पूरी तरह बयान नहीं कर पाते।
जैंडी का कहना है कि अब भी समय है। अगर सरकार और फेडरल रिज़र्व सही कदम उठाएँ तो इस मंदी से बचा जा सकता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि अमेरिका टैरिफ की जिद छोड़कर सहयोग और साझेदारी की नीति अपनाए। दुनिया से अलग-थलग होकर अमेरिका न तो अपने उद्योगों को बचा पाएगा और न ही अपनी जनता को राहत दे पाएगा।
फिलहाल अमेरिकी शेयर बाज़ार में भारी उतार-चढ़ाव हो रहा है। Investors का भरोसा डगमगा रहा है। डॉलर की मजबूती पर भी सवाल उठ रहे हैं। यूरोप और एशिया के बाज़ारों में यह चर्चा जोरों पर है कि अगर अमेरिका Recession में गया तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी झटका लगेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति नए अवसर भी ला सकती है, लेकिन जोखिम कहीं ज्यादा होंगे।
यह पूरी कहानी हमें एक गहरी सीख देती है। शक्ति और अहंकार के खेल में सबसे बड़ी कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ती है। सरकारें अपनी नीतियों से वैश्विक खेल खेलती हैं, लेकिन जब संकट आता है तो सबसे पहले असर आम नागरिकों पर ही पड़ता है। आज अमेरिका में लोग वही कीमत चुका रहे हैं। सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपनी गलतियों से सबक लेगा या फिर इतिहास खुद को एक बार फिर दोहराएगा?
Conclusion
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