Inspiring: Tej Pandya की कहानी: स्टार्टअप की जंग से सीखी ज़िंदगी की जीत – हकीकत जो हर Entrepreneur को जाननी चाहिए I 2025

क्या कभी आपने किसी को ये कहते सुना है — “मैं अपनी नौकरी छोड़कर स्टार्टअप शुरू करने वाला हूं”? उस पल में उसकी आंखों में चमक होती है, दिल में जुनून होता है, और चेहरे पर एक अजीब-सी आज़ादी का एहसास। लेकिन कुछ महीनों बाद वही चेहरा थकान, तनाव और अकेलेपन से भर जाता है। वो व्यक्ति, जिसने कभी अपने सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था, अब सोच रहा होता है — क्या मैंने सही किया? यही वो दौर है जब ‘स्टार्टअप’ एक सपने से ज़्यादा, एक सर्वाइवल गेम बन जाता है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको बता दें कि यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की है जिन्होंने सोचा कि स्टार्टअप शुरू करना मतलब अपनी जिंदगी की दिशा खुद तय करना। लेकिन हकीकत ये है कि 10 में से 9 स्टार्टअप असफल हो जाते हैं। और हैरानी की बात ये है कि उनमें से ज़्यादातर अपने प्रोडक्ट या आइडिया की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए फेल होते हैं क्योंकि उनका फाउंडर बीच रास्ते में टूट जाता है।

ये बात कही है Growizy A I के संस्थापक Tej Pandya ने, जिन्होंने हाल ही में लिंक्डइन पर एक दिल छू लेने वाली पोस्ट लिखी। उन्होंने कहा — “स्टार्टअप में सबसे बड़ी लड़ाई बिजनेस से नहीं, खुद से होती है।” उनका कहना है कि ज़्यादातर फाउंडर्स हमेशा एक भ्रम में जीते हैं — “अगला फीचर सब ठीक कर देगा”, “अगली मार्केटिंग कैम्पेन से कस्टमर आ जाएंगे”, “अगला इन्वेस्टर सब बदल देगा।” लेकिन ये ‘अगला’ कभी आता नहीं। और इसी इंतज़ार में साल निकल जाते हैं, बचता है बस अनिश्चितता का बोझ और थकान का समंदर।

तेज की ये बातें हर उस व्यक्ति को झकझोर देती हैं जो सोचता है कि स्टार्टअप का मतलब है अमीरी, फ्रीडम और फेम। वो कहते हैं — “सफलता की कोई गारंटी नहीं होती, लेकिन अनिश्चितता की गारंटी पक्की होती है।

एक युवा फाउंडर की जिंदगी कैसी होती है, ज़रा सोचिए… सुबह पांच बजे उठकर पिच डेक पर काम करना, दिन भर कॉल्स, मीटिंग्स, और Investors के ईमेल का जवाब देना, और फिर रात में टीम को मोटिवेट करना जबकि खुद का मन टूट चुका हो। बैंक अकाउंट में पैसे कम हैं, लेकिन उम्मीद बड़ी है। और यही उम्मीद कई बार जाल बन जाती है — ऐसा जाल जिसमें फाउंडर खुद फंस जाता है।

Tej Pandya लिखते हैं — “स्टार्टअप की दुनिया में हर दिन जंग है। सुबह उम्मीद से शुरू होती है और रात सवालों में खत्म।”
वो बताते हैं कि कैसे एक समय ऐसा आता है जब आपको लगता है कि दुनिया आगे बढ़ रही है, और आप एक जगह रुक गए हैं। आपके दोस्त शादी कर रहे हैं, नई गाड़ियां खरीद रहे हैं, यूरोप घूम रहे हैं — और आप? आप एक्सेल शीट में अपने खर्च गिन रहे हैं और सोच रहे हैं कि अगले महीने की सैलरी कहां से आएगी।

फाउंडर की सबसे बड़ी मुश्किल यह होती है कि उसे खुद को “मजबूत” दिखाना पड़ता है — टीम के सामने, Investors के सामने, परिवार के सामने। लेकिन भीतर से वो हर दिन बिखर रहा होता है। तेज कहते हैं — “ज्यादातर स्टार्टअप प्रोडक्ट से नहीं, बल्कि फाउंडर के टूट जाने से खत्म होते हैं।

और यह टूटना सिर्फ़ आर्थिक नहीं होता। ये मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक थकान का मेल होता है।
हर सुबह जब फाउंडर दफ्तर पहुंचता है, वो मुस्कुराता है, लेकिन भीतर एक सवाल गूंजता है — “कब तक?

Tej Pandya की पोस्ट में सबसे दर्दनाक बात यह थी — उन्होंने लिखा, “जिंदगी आपके साथ देर नहीं करती।”
मतलब, जब आप अपने सपने में खोए होते हैं, तभी असल जिंदगी आपसे हिसाब मांगने लगती है — माता-पिता की उम्मीदें, बिलों की तारीख़, सेहत की चिंता, और रिश्तों का बोझ। सब कुछ एक साथ सामने आ जाता है।

और इस सबके बीच, फाउंडर को ‘पॉज़िटिव’ रहना पड़ता है। वो लोगों को प्रेरित करता है, लेकिन खुद को कोई नहीं। स्टार्टअप की दुनिया में हर कोई “फंडिंग”, “पिच डेक” और “प्रोडक्ट-मार्केट फिट” की बात करता है। लेकिन कोई नहीं बताता कि जब रात के तीन बजे आपको नींद नहीं आती, जब इन्वेस्टर का ईमेल ‘ना’ कह देता है, या जब टीम का कोई अहम सदस्य अचानक छोड़कर चला जाता है, तब उस फाउंडर पर क्या गुजरती है।

तेज ने बिल्कुल सटीक कहा — “स्टार्टअप सिर्फ़ काम नहीं है, ये एक मानसिक परीक्षा है। यह सिखाता है कि जब चारों ओर अराजकता हो, तब शांत कैसे रहना है। भारत में आज लाखों लोग स्टार्टअप शुरू करने का सपना देख रहे हैं। 2025 तक देश में 1 लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप्स होने का अनुमान है। लेकिन क्या हम जानते हैं कि इनमें से 90% कभी मंज़िल तक नहीं पहुंचते? क्योंकि असफलता सिर्फ़ फंड की कमी से नहीं आती — बल्कि उस मनोबल की कमी से आती है, जो हर झटके के बाद भी मुस्कुरा सके।

कई फाउंडर्स की निजी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। वो शादी टाल देते हैं, परिवार से दूर हो जाते हैं, दोस्तों से मिलना बंद कर देते हैं। उनका सारा ध्यान सिर्फ़ “सर्वाइव करने” पर होता है, “जीने” पर नहीं। हर महीने कुछ फाउंडर्स हार मान लेते हैं। कुछ डिप्रेशन में चले जाते हैं। कुछ वापस कॉर्पोरेट नौकरियों में लौट आते हैं, और कुछ चुपचाप गायब हो जाते हैं। लेकिन कोई उनकी कहानियों पर डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाता। कोई नहीं पूछता कि उन्होंने किस कीमत पर अपने सपनों के लिए लड़ाई लड़ी थी।

Tej Pandya लिखते हैं — “ (Entrepreneurship) किसी आइडिया की नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा है।” उन्होंने अपने पोस्ट में एक सवाल पूछा — “क्या आप अपने भ्रम को तब तक जिंदा रख सकते हैं, जब तक वह हकीकत न बन जाए?” ये सवाल जितना सुंदर है, उतना ही दर्दनाक भी। क्योंकि यही भ्रम ही है जो फाउंडर को हर असफलता के बाद भी उठने की ताकत देता है।

भारत में आज “स्टार्टअप इकोसिस्टम” तेजी से बढ़ रहा है। सरकारें ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी योजनाओं के जरिए फंड और प्रोत्साहन दे रही हैं। लेकिन इन योजनाओं के पीछे एक और दुनिया है — जहां अकेलापन, बर्नआउट, और थकान हकीकत है। यह वह दुनिया है जहां हर दिन एक जंग है — जंग Investors की उम्मीदों से, ग्राहकों की मांगों से, और खुद के डर से।

Tej Pandya के मुताबिक, हर फाउंडर दो जिंदगी जीता है — एक वो जो सोशल मीडिया पर दिखती है, और एक वो जो उसके भीतर चलती है। सोशल मीडिया पर “सीईओ”, “फाउंडर”, “विजनरी” जैसे टैग चमकते हैं, लेकिन रात के अंधेरे में वही इंसान सोचता है कि क्या ये सब वाकई इसके लायक था?

एक उद्यमी ने एक बार कहा था —
“लोग सोचते हैं कि स्टार्टअप करना बहादुरी है, लेकिन असल में ये पागलपन है। हर सुबह उठकर खुद को यह समझाना कि आज फिर कोशिश करनी है, जबकि कल सब बिखर गया था — यही असली साहस है।” और सच भी यही है। क्योंकि स्टार्टअप की दुनिया में हर दिन उम्मीद की मौत और हिम्मत का पुनर्जन्म होता है।

Tej Pandya की बातों में एक और गहरी सच्चाई है — “ज्यादातर लोग इसलिए नहीं हारते क्योंकि उनका आइडिया गलत था, बल्कि इसलिए क्योंकि उनका मन टूट गया।” वो बताते हैं कि जब आप महीनों तक बिना सैलरी काम करते हैं, जब बैंक बैलेंस शून्य पर पहुंच जाता है, तब सिर्फ़ एक चीज़ बचती है — भरोसा। और अगर वो भी डगमगा जाए, तो कहानी खत्म।

आज भारत के हर बड़े शहर में स्टार्टअप हब हैं — बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, दिल्ली…
हर कोने में कोई न कोई नया आइडिया जन्म ले रहा है। लेकिन हर नए आइडिया के पीछे एक अनसुनी कहानी भी है — संघर्ष की, अनिश्चितता की, और उस इंसान की जिसने अपने सपनों को ज़िंदा रखा जब सबकुछ खत्म होता दिखा।

स्टार्टअप की दुनिया में सफलता का जश्न सब मनाते हैं, लेकिन असफलता का मातम कोई नहीं। जो 90% फाउंडर हार जाते हैं, उनकी आवाज़ अक्सर भीड़ में खो जाती है। लेकिन शायद यही फर्क है सफल और असफल के बीच — सफल वही होते हैं जो हारने के बाद भी उठते हैं, जो भ्रम में भी उम्मीद ढूंढ लेते हैं। Tej Pandya की पोस्ट के आखिर में एक लाइन थी, जिसने हजारों उद्यमियों के दिल को छू लिया — “अगर आप हर दिन गिरते हैं, लेकिन अगले दिन फिर उठ जाते हैं, तो आप पहले से ही विजेता हैं।”

यह लाइन सिर्फ़ प्रेरणादायक नहीं, बल्कि एक सच्चाई है — क्योंकि असली जीत आइडिया की नहीं, इंसान की होती है। स्टार्टअप की यह दुनिया बाहर से जितनी ग्लैमरस लगती है, भीतर से उतनी ही कठोर है। यहां हर मुस्कान के पीछे एक तनाव छिपा है, हर प्रेस रिलीज़ के पीछे नींदहीन रातें हैं, और हर फंडिंग न्यूज के पीछे सैकड़ों रिजेक्शन लेटर हैं।

Conclusion

अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।

GRT Business विभिन्न समाचार एजेंसियों, जनमत और सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी लेकर आपके लिए सटीक और सत्यापित कंटेंट प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हालांकि, किसी भी त्रुटि या विवाद के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। हमारा उद्देश्य आपके ज्ञान को बढ़ाना और आपको सही तथ्यों से अवगत कराना है।

अधिक जानकारी के लिए आप हमारे GRT Business Youtube चैनल पर भी विजिट कर सकते हैं। धन्यवाद!”

Spread the love

Leave a Comment