टाटा ट्रस्ट्स घराना, कभी भारत की ईमानदारी का प्रतीक माना जाता था। “टाटा” नाम सुनते ही एक भरोसे की छवि उभरती थी — सादगी, समर्पण और स्वच्छता की। लेकिन आज वही घराना सवालों के घेरे में है। Tata Trusts, जो 156 साल पुराने इस साम्राज्य की आत्मा माने जाते हैं, अब खुद दो हिस्सों में बंट चुके हैं। एक तरफ़ रतन टाटा की पारदर्शिता की विरासत है, तो दूसरी ओर सत्ता की भूख, आरोपों और टकराव का अंधकार। सवाल ये उठता है — क्या टाटा जैसा ब्रांड अब उस दिशा में जा रहा है, जहाँ भरोसे की जगह राजनीति और लालच ने ले ली है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
आपको बता दें कि Tata Trusts के भीतर अब दो गुट आमने-सामने हैं। एक गुट कहता है कि नियमों का पालन होना चाहिए, सब निर्णय सामूहिक हों, ट्रस्टियों की राय अनिवार्य हो। दूसरा गुट कहता है कि वक्त बदल चुका है — फैसले तेज़ होने चाहिए, और जिनके पास शक्ति है, वही निर्णय करें। और इसी खींचतान ने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित भारतीय कॉर्पोरेट समूह को एक भीतरी जंग में झोंक दिया है।
सूत्रों के मुताबिक़, मतभेद की शुरुआत हुई “नियुक्ति” और “निर्णय प्रक्रिया” से। यानी कौन बनेगा बोर्ड का सदस्य, और बड़े वित्तीय फैसले कौन लेगा। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है — यानी पूरे साम्राज्य की नब्ज़ वहीं से चलती है। लेकिन अब इस नब्ज़ पर दो हाथ पड़ गए हैं। एक तरफ़ वे ट्रस्टी हैं जो परंपरा, नैतिकता और पारदर्शिता की बात करते हैं, और दूसरी ओर नोएल एन टाटा का गुट, जिन पर आरोप है कि उन्होंने नियमों को दरकिनार कर अपने हिसाब से साम्राज्य चलाने की ठान ली है।
नोएल एन टाटा, रतन टाटा के चचेरे भाई, जो कभी इस समूह में एक “पारिवारिक संतुलन” के नाम पर लाए गए थे, अब इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं। आरोप है कि उन्होंने ट्रस्ट के नियमों को नज़रअंदाज़ कर मनमाने तरीके से फैसले लिए, ट्रस्टियों को जानकारी से वंचित रखा, और यहां तक कि घाटे में डूबी कंपनियों को भी अरबों की रकम मंज़ूर कर दी। सोचिए, एक कंपनी जो पहले से 3,000 करोड़ रुपये के घाटे में थी, उसे और 1,000 करोड़ का अप्रूवल दे दिया गया — बिना किसी विस्तृत चर्चा के, बिना ट्रस्ट की मंज़ूरी के।
टाटा इंटरनेशनल लिमिटेड — वही कंपनी जो कभी भारत की ग्लोबल पहचान थी, अब सवालों में है। कहा जा रहा है कि नोएल एन टाटा की अगुवाई में इस कंपनी को तीन हज़ार करोड़ के घाटे में धकेला गया। और हैरानी की बात यह है कि इस घाटे के बावजूद उन्होंने टाटा संस से और 1,000 करोड़ की रकम की मांग की, जो मंज़ूर भी हो गई। ट्रस्ट का Article 121A साफ कहता है कि ऐसे किसी भी बड़े निर्णय के लिए ट्रस्ट की सामूहिक स्वीकृति ज़रूरी है। लेकिन यहाँ तो ट्रस्टियों को भनक तक नहीं लगी। यानी जिस व्यवस्था को पारदर्शिता का उदाहरण कहा जाता था, वही अब छिपे हुए फैसलों का केंद्र बन चुकी है।
सोचिए, जब किसी आम कंपनी में कुछ करोड़ का गड़बड़झाला सामने आता है, तो सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स की जांच शुरू हो जाती है। लेकिन जब टाटा जैसे समूह में हज़ारों करोड़ डूब जाते हैं, तो चारों ओर सन्नाटा क्यों है? क्या ये सन्नाटा किसी “बड़ी सच्चाई” को ढकने की कोशिश है? या फिर यह सत्ता और प्रतिष्ठा की वो ढाल है, जिसके आगे कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता?
नोएल एन टाटा के ख़िलाफ़ यह भी आरोप है कि उन्होंने बाकी ट्रस्टियों को ‘जानकारी से वंचित’ रखा — यानी जानबूझकर उन्हें उन निर्णयों में शामिल नहीं किया, जो अरबों रुपये से जुड़े थे। यह न केवल कंपनी के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि भारत की कॉर्पोरेट गवर्नेंस के लिए एक चिंताजनक उदाहरण भी है। आखिर अगर टाटा जैसे संस्थान में जवाबदेही नहीं बचेगी, तो बाकी कॉर्पोरेट घरानों का क्या होगा?
इस विवाद की जड़ में सिर्फ़ पैसे का नहीं, बल्कि नियंत्रण का सवाल है। कहा जा रहा है कि नोएल एन टाटा और उनके समर्थक अब पूरे समूह पर “पूर्ण नियंत्रण” चाहते हैं — यानी न केवल टाटा संस, बल्कि ट्रस्ट्स, बोर्ड, और फैसलों की हर चाबी उनके हाथ में हो। इस रणनीति में वे अकेले नहीं हैं। उनके साथ विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन जैसे अनुभवी लेकिन विवादित नाम भी हैं। आरोप है कि इन दोनों ने नियमों को ताक पर रखकर अपना कार्यकाल बढ़ाया, जबकि अन्य ट्रस्टियों को इसकी जानकारी तक नहीं दी गई।
विजय सिंह, जो 77 वर्ष के हैं, अभी भी Director पद पर बने हुए हैं, जबकि सामान्य नियमों के अनुसार यह कार्यकाल समाप्त हो जाना चाहिए था। ट्रस्टियों का कहना है कि यह कार्यकाल “जानकारी छिपाकर” बढ़ाया गया। और यह सीधे-सीधे कंपनी लॉ के उल्लंघन के बराबर है। दूसरी ओर, वेणु श्रीनिवासन — जो पहले ही टीवीएस और सत्य साईं बाबा ट्रस्ट से रिटायर हो चुके हैं — टाटा संस में “वाइस चेयरमैन” पद पर अब भी बने हुए हैं। सवाल यह है कि जब टाटा संस के संविधान में ऐसा कोई पद ही नहीं है, तो उन्हें यह पद किस अधिकार से मिला? क्या किसी सर्कुलर के माध्यम से यह पद खुद ही बना लिया गया?
अगर यह सब सच है, तो यह केवल संस्थागत विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन भी है। टाटा समूह, जो कभी रतन टाटा की ईमानदारी का प्रतीक था, अब उन्हीं के नाम का इस्तेमाल शक्ति और लालच के खेल में किया जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे कुछ लोग इस साम्राज्य की विरासत को “निजी जागीर” में बदल देना चाहते हैं।
Independent Director हरीश मनवानी ने भी इस पर खुलकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि साइकिल और जूते के कारोबार में टाटा इंटरनेशनल को शामिल करने का कोई औचित्य नहीं है। यह कारोबार समूह की विशेषज्ञता या रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि “कमीशन गेम” का हिस्सा लगता है। जितना बड़ा घाटा, उतना बड़ा बैकएंड कमीशन — यह वह व्यवस्था है जिसमें घाटा दिखाकर मुनाफ़ा कमाया जाता है, लेकिन वह मुनाफ़ा किसी और की जेब में जाता है।
अब सवाल उठता है — क्या ये सिर्फ़ नोएल एन टाटा की कहानी है या फिर टाटा ट्रस्ट्स के भीतर कोई बड़ा “क्लब” बन चुका है, जो पर्दे के पीछे से फैसले ले रहा है? टाटा संस की मिनिट्स में साफ़ लिखा गया है कि जो 1,000 करोड़ रुपये दिए गए, वो ऋण नहीं हैं, क्योंकि उसके पीछे कोई “अंडरलाइंग असेट” नहीं है। यानी वह पैसा गया, तो गया। किसी जवाबदेही की गुंजाइश नहीं। अगर यही कहानी किसी दूसरी कंपनी में होती, तो मीडिया में तूफ़ान मच जाता। लेकिन यहाँ सब खामोश है। क्या ये चुप्पी खरीदी गई है? क्या यह वही “कॉर्पोरेट साइलेंस” है जो केवल बड़े नामों के लिए आरक्षित होता है?
अब सोचिए, टाटा ग्रुप का नाम भारत की आर्थिक आत्मा में कितनी गहराई से बसा हुआ है। यह केवल एक व्यापारिक घराना नहीं, बल्कि भारत की नैतिक शक्ति का प्रतीक था। अगर इस पर ही दाग लग जाए, तो foreign investors का विश्वास कितना हिलेगा? जो लोग “मेड इन इंडिया” के भरोसे भारत आते थे, अब शायद वही सवाल पूछेंगे — “क्या टाटा भी बाकी घरानों जैसा हो गया?”
यह वही टाटा है जिसने ब्रिटेन में जंग से जूझती कंपनियाँ खरीदीं, भारत में स्कूलों और अस्पतालों का निर्माण किया, और गरीबों के लिए अरबों दान दिए। लेकिन आज उसी ट्रस्ट की आत्मा पर आरोप हैं कि वहां कुछ गिने-चुने लोग सत्ता का फायदा उठाकर नियमों को तोड़ रहे हैं। रतन टाटा ने हमेशा कहा था — “A brand is not built by money, it’s built by trust.”
लेकिन अगर वही विश्वास अब टूटने लगे, तो ब्रांड बचेगा कैसे? नोएल एन टाटा पर आरोप है कि उन्होंने न केवल पारदर्शिता तोड़ी, बल्कि ट्रस्टियों की गरिमा को भी मिटा दिया। आज ट्रस्ट के भीतर बैठने वाले कई सदस्य खुद को “हाशिये पर धकेला गया” महसूस कर रहे हैं।
ट्रस्टियों का कहना है कि अब वे केवल नाम के लिए रह गए हैं — असली फैसले तो तीन नामित Director ही कर रहे हैं। यह स्थिति किसी लोकतांत्रिक संस्थान के लिए शर्मनाक है। जहाँ हर सदस्य का बराबर अधिकार होना चाहिए, वहाँ कुछ व्यक्तियों का वर्चस्व नियमों की आत्मा को ही नष्ट कर देता है।
टाटा समूह की इस हालत ने पूरे देश में चिंता पैदा कर दी है। यह सिर्फ़ एक व्यापारिक विवाद नहीं, बल्कि भारत की कॉर्पोरेट नैतिकता की परीक्षा है। अगर टाटा ग्रुप जैसी संस्था में भी पारदर्शिता नहीं बचेगी, तो फिर कौन बचेगा? जब नियम किताबों में रह जाएं और निर्णय सत्ता के आधार पर हों, तो संस्था नहीं, व्यक्ति सर्वोच्च हो जाता है — और वही किसी साम्राज्य के पतन की शुरुआत होती है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अब इस पूरे मामले की “फोरेंसिक जांच” जरूरी है। हर एक रुपये का हिसाब लिया जाना चाहिए। जो भी निर्णय Article 121A के खिलाफ़ लिए गए हैं, उन पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर यह नहीं हुआ, तो आने वाले समय में कोई भी ट्रस्ट अपने उद्देश्य से भटक सकता है। याद कीजिए, रतन टाटा ने जब टाटा ट्रस्ट्स की कमान संभाली थी, तो उन्होंने एक ही बात कही थी — “हम जो भी करेंगे, वह भारत की आत्मा के अनुरूप होगा।”
लेकिन आज सवाल यही है कि क्या नोएल एन टाटा और उनके साथी वही आत्मा बचा रहे हैं, या उसे बेच रहे हैं? भारत में जब भी कोई कॉर्पोरेट स्कैंडल सामने आता है, तो जनता कहती है — “टाटा जैसा क्यों नहीं हो सकते?” लेकिन अगर अब टाटा का नाम भी इस तरह के विवादों में घिर गया, तो जनता किस पर भरोसा करेगी?
विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन जैसे वरिष्ठ सदस्यों पर लगे आरोप केवल व्यक्ति की महत्वाकांक्षा नहीं दिखाते, बल्कि उस प्रणाली की कमजोरी भी उजागर करते हैं, जिसने समय रहते चेतावनी नहीं दी। सत्ता का मोह, पद का लालच और अंदरूनी राजनीति ने टाटा समूह की साख पर सबसे गहरी चोट पहुंचाई है।
यह वही समूह है जिसने टाटा स्टील से लेकर टाटा मोटर्स तक भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता की कहानी लिखी। जिसने एयर इंडिया को वापस खरीदा और देश को गौरव दिया। लेकिन अब वही संस्था आंतरिक अविश्वास और अराजकता से जूझ रही है। यह विडंबना नहीं तो क्या है?
भारत की जनता, Investor और मीडिया — सबका हक है जानना कि इस साम्राज्य में हो क्या रहा है। आखिर किस अधिकार से नोएल एन टाटा और उनके साथी फैसले ले रहे हैं? क्यों 1,000 करोड़ का Approval बिना ट्रस्ट की सहमति के पारित हुआ? और अगर यह सब नियमों के खिलाफ़ है, तो जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही?
Conclusion
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