सोचिए… किसी छोटे से गांव में रात का सन्नाटा है। एक कुम्हार अपने चाक के पास बैठा आख़िरी मिट्टी का दीपक बना रहा है, उसके हाथ रुक-रुककर चलते हैं… क्योंकि मन में डर है—कल काम मिलेगा भी या नहीं? एक बुनकर के घर में आधी रात तक करघा चल रहा है… लेकिन चेहरे पर चिंता है—“मेहनत तो बहुत है, पर दाम कौन देगा?” एक महिला, जो सालों से हस्तशिल्प बनाती आई है, छत की ओर देख रही है I
“शायद ये हुनर अब किसी काम का नहीं…” और ठीक उसी वक्त देश के किसी और हिस्से में एक मीटिंग रूम के अंदर फैसला हो रहा है—“अब गांव का हुनर बचेगा नहीं… चमकेगा।” एक ऐसी स्कीम, जो सिर्फ योजना नहीं… उम्मीद है। सिर्फ फंड नहीं… भविष्य है। सिर्फ मदद नहीं… इज्जत है। ये कहानी है SFURTI की—Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries—एक ऐसी सरकारी योजना, जो कहती है: “Local ko Global बनाना है… और हर कारीगर को ये एहसास दिलाना है कि उसका हुनर बेकार नहीं, अनमोल है।”
अब सवाल ये है कि SFURTI क्या है? क्यों ये इतना important है? और कैसे कोई गांव, कोई संस्था, कोई क्लस्टर 8 करोड़ रुपये तक की मदद लेकर अपनी पूरी जिंदगी बदल सकता है? यही सब हम इस पूरी कहानी में समझेंगे। क्योंकि ये सिर्फ scheme नहीं, उन लाखों कारीगरों का सपना है जो आज भी अपनी मेहनत, अपने पसीने, अपने हुनर से भारत की पहचान बनाए हुए हैं।
भारत की असली ताकत सिर्फ बड़े शहरों की skyscrapers नहीं हैं। असली भारत बसता है गांवों में। मिट्टी के घरों में। मेहनतकश हाथों में। उन कारीगरों में जो पीढ़ियों से काम कर रहे हैं—हथकरघा बुनकर, बांस शिल्पकार, लकड़ी कारीगर, कोयर उद्योग, खादी वाले, कुम्हार, घंटियों, पत्थरों, धातुओं, और हस्तशिल्प के कलाकार।
उनके बिना हमारा कल्चर आधा रह जाता, हमारी पहचान अधूरी हो जाती। लेकिन सच्चाई ये भी है… कि modernization की दौड़ में ये लोग कहीं पीछे छूट गए। मार्केट तक पहुंच नहीं, पैसे की कमी, मशीनों का अभाव, डिजाइन पुरानी, और सबसे बड़ी बात—काम तो है, पर कमाई नहीं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या सरकार सिर्फ शहरों को ही देखे? या उन हाथों को भी थामे, जो मिट्टी से सोना गढ़ते हैं?
यहीं से शुरू होती है SFURTI की कहानी। ये योजना 2005 में शुरू हुई थी। लक्ष्य साफ था—Traditional Industries को सिर्फ बचाना नहीं, revive करना है… modern बनाना है… market से जोड़ना है… और उन्हें “रोज़ी-रोटी” से उठाकर “आवाज़ और इज्जत” देनी है। SFURTI कहती है—अगर आप अकेले संघर्ष कर रहे कारीगर हैं तो आपको एकजुट किया जाएगा। अगर बिखरी हुई ताकत है, तो उसे संगठित किया जाएगा। अगर हुनर है पर प्लेटफॉर्म नहीं, तो प्लेटफॉर्म बनाया जाएगा। मतलब—skill, setup, system और success—चारों देना SFURTI का काम है।
ये योजना कैसे काम करती है? ये कोई छोटे-छोटे random grants नहीं देती। SFURTI गांवों और कस्बों के पारंपरिक उद्योगों को “क्लस्टर” के रूप में organize करती है। Imagine कीजिए—एक जगह जहां 300, 500, 800 कारीगर एक साथ काम करते हैं, एक बड़ी इकाई के रूप में। उनके लिए Common Facility Center होता है। Modern मशीनें होती हैं। Training होती है। Branding और Packaging होती है। Marketing Experts होते हैं। Online platform से जोड़ने का सिस्टम होता है। Export की तैयारी होती है। मतलब… एक small scattered effort को powerful organized industry में बदल देना।
अब सबसे बड़ा सवाल—पैसा। क्योंकि बिना फंड के कोई सपना पूरा नहीं होता। SFURTI यहां game changer बनती है। एक क्लस्टर प्रोजेक्ट को सरकार 8 करोड़ रुपये तक support करती है। जी हाँ—8 करोड़। ये छोटी रकम नहीं, ये किसी भी rural industry के लिए life changing amount है। और सबसे खूबसूरत बात ये है कि ये पैसा बस नाम के लिए नहीं, बल्कि सटीक जगह खर्च होता है। दो हिस्से होते हैं—Soft Intervention और Hard Intervention।
Soft Intervention मतलब training, skill development, branding, packaging, design improvement, digital marketing, workshops, exposure visits—इन सब पर सरकार 100% खर्च उठाती है। यानी knowledge free में। नई सोच free में। नए ideas free में। कारीगरों का confidence free में। ये वो investment है जो किसी industry को अंदर से strong बनाती है।
Soft Intervention मतलब training, skill development, branding, packaging, design improvement, digital marketing, workshops, exposure visits—इन सब पर सरकार 100% खर्च उठाती है। यानी knowledge free में। नई सोच free में। नए ideas free में। कारीगरों का confidence free में। ये वो investment है जो किसी industry को अंदर से strong बनाती है। ज्यादा हैं, वहां government extra support देती है। ये बताता है कि योजना सिर्फ formality नहीं, strategy है।
अब सवाल आता है—ये पैसा मिलता किसे है? क्या कोई भी individual कारीगर जाकर कह सकता है “मुझे पैसा दे दो”? नहीं। SFURTI serious है, organized है। इसे मिलता है institutions को। NGO, Government और Semi Government bodies, Panchayats, Cooperative societies, Private institutions, CSR foundations, industrial organizations… और सबसे important—SPV यानी Special Purpose Vehicle यानी वो group जो पूरे cluster को professionally manage कर सके। मतलब plan हो, टीम हो, execution हो… तभी फंड मिलेगा। क्योंकि government चाहती है कि पैसा सिर्फ खर्च ना हो… result भी दे।
आवेदन का प्रोसेस भी modern है—online। Physical दौड़-भाग, endless files, बैठे रहो culture—इन सबको कम से कम रखा गया है। Online portal पर registration, proposal submission, documents upload, evaluation… और फिर approval। लेकिन approval सिर्फ कागज़ों पर नहीं होता। ये देखा जाता है—क्या वाकई cluster है? क्या वास्तव में artisans ready हैं? क्या जमीन है? क्या वास्तविक काम हो सकता है? यानी “intention” नहीं, “implementation” देखा जाता है।
अब सोचिए… एक गाँव जहाँ पहले हर कारीगर अकेला था… बिना resource… बिना market… बिना confidence। वही गांव SFURTI की मदद से cluster बनता है। वहाँ training होती है। लोग सीखते हैं कि आज की market क्या चाहती है। Designs modern होते हैं। Products attractive बनते हैं। Packaging classy होती है।
Brand identity बनती है। Social media pages बनते हैं। E-commerce platforms से जोड़ दिया जाता है। Exhibitions में भेजा जाता है। Buyers से connect कराया जाता है। पहले जो product सिर्फ local haat में बिकता था… वो अब देशभर में जाता है… कुछ international market तक पहुंच जाता है। और वहीं बैठा वो कुम्हार… वो बुनकर… वो महिला self-help group की member… अचानक महसूस करती है—“मैं सिर्फ कारीगर नहीं… मैं entrepreneur हूं।”
यही SFURTI की असली जीत है। ये charity नहीं है। ये भीख नहीं है। ये किसी को dependent नहीं बनाती। ये empower करती है। ये कंधे पर हाथ रखकर कहती है—“तुम कर सकते हो… और हम साथ हैं।”
अब थोड़ा दिल से बात करते हैं। आज गांवों से youth शहर भागता है। क्यों? क्योंकि उसे लगता है घर पर रहकर कुछ नहीं होगा। ये migration सिर्फ population का movement नहीं, सपनों का टूटना भी है। SFURTI इस mindset को बदलना चाहती है। ये कहती है—“गांव में ही industry बनाओ। गांव में ही काम मिले। गांव में ही factory खड़ी हो। गांव ही self-reliant बने।” ये आत्मनिर्भर भारत की असली परिभाषा है। Self-reliance का मतलब सिर्फ बड़ी factories नहीं, छोटे artisans की capability भी है।
सोचिए… अगर हर राज्य में सैकड़ों SFURTI clusters बनें। हर cluster में 500, 700, 1000 artisans हों। हर artisan के घर में स्थिर income आए। बच्चों की पढ़ाई सुधरे। घरों में respect आए। गाँव आर्थिक रूप से strong हों। शहरों पर population का दबाव घटे। देश की economy local roots से मजबूत हो। और साथ ही—India का culture दुनिया तक जाए। ये सिर्फ economics नहीं, emotional victory भी है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। SFURTI सिर्फ machines और training नहीं देती… identity देती है। पहले artisans सिर्फ suppliers थे। अब वो brand owners बन सकते हैं। पहले वो mediator पर depend थे। अब direct market access मिलता है। पहले उनका नाम खो जाता था… अब उनकी पहचान बनती है। पहले उनका हुनर धीरे-धीरे खत्म हो रहा था… अब वही हुनर family legacy बन रहा है।
अब practicality की बात करते हैं… कि किसी संस्था या organization को क्या सोचना चाहिए अगर वो SFURTI के लिए apply करना चाहते हैं। सबसे पहले… clarity। किस traditional industry को develop करना है? कितने artisans हैं? क्या ground पर वाकई काम हो रहा है? क्या लोग ready हैं? क्या टीम है जो जिम्मेदारी निभा सके? क्या long term सोच है? क्योंकि SFURTI सिर्फ पैसे लेकर छोड़ देने का कार्यक्रम नहीं। ये एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। Proper planning चाहिए। सही management चाहिए। Honest execution चाहिए। तभी ये योजना दमदार साबित होती है।
और हाँ… ये भी याद रखें कि government support करती है, spoon feeding नहीं करती। जिम्मेदारी साझा है। अगर artisans ready हैं… institutions committed हैं… policies supportive हैं… तो result breathtaking होते हैं। लेकिन अगर कोई सिर्फ fund लेने आए, implementation कमजोर हो… तो scheme बेकार लगने लगती है। इसलिए SFURTI सिर्फ उन लोगों के लिए है जो सच में बदलाव चाहते हैं। अब बात करते हैं इससे मिलने वाले फायदों की। ये सिर्फ income बढ़ाने की बात नहीं करता।
ये dignity देता है। हौसला देता है। social upliftment करता है। Women artisans को empowerment देता है। Youth को गाँव में रहने का reason देता है। Culture को conserve करता है। Econom को local से global तक push करता है। और देश को बताता है—India सिर्फ I T और industry से नहीं, अपनी मिट्टी, अपने हाथों और अपनी परंपरा से भी महान है।
Conclusion
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