सोचिए उस पल को… एक 13 साल का बच्चा, गांव से निकलकर बड़े शहर की ओर बढ़ता हुआ। जेब में सिर्फ 12 रुपये, आंखों में अनजाना डर, लेकिन दिल में एक अजीब सी ज़िद। ना उसे पता है कि शहर कैसा होगा, ना यह भरोसा कि काम मिलेगा भी या नहीं। लेकिन एक बात तय है—वापस लौटना कोई ऑप्शन नहीं है।
यहीं से शुरू होती है वो कहानी, जो हमें बताती है कि हालात अगर इंसान को कुचलने की कोशिश करें, तो वही हालात किसी के लिए सीढ़ी भी बन सकते हैं। आज जब आप 16,000 करोड़ के कारोबार, हजारों कर्मचारियों और दुनिया भर में फैले बिजनेस नेटवर्क की बात सुनते हैं, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो कि इसकी शुरुआत उन 12 रुपयों से हुई थी। यह कहानी है Savji Bhai Dholakia की—एक ऐसे इंसान की, जिसने हीरों से पहले संघर्ष को तराशा।
आपको बता दें कि गुजरात को अक्सर भारत की कारोबारी नर्सरी कहा जाता है। यहां की हवा में ही व्यापार बसता है। बड़े-बड़े नाम, बड़ी फैक्ट्रियां, विशाल पोर्ट्स और अरबों डॉलर के साम्राज्य। लेकिन इन चमकते नामों के पीछे कई ऐसी कहानियां हैं जो अखबारों की हेडलाइन नहीं बनतीं, लेकिन दिलों पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। सावजी ढोलकिया उन्हीं कहानियों में से एक हैं। ना ज्यादा दिखावा, ना बड़ी-बड़ी बातें। फिर भी जब उनका नाम आता है, तो वजह सिर्फ बिजनेस नहीं होती—वजह होती है इंसानियत, उदारता और वो सोच जो आज के कॉरपोरेट वर्ल्ड में दुर्लभ होती जा रही है।
कई बार आपने खबरें पढ़ी होंगी—“सूरत के एक हीरा कारोबारी ने कर्मचारियों को कार गिफ्ट की”, “दिवाली पर कर्मचारियों को फ्लैट दे दिए गए।” सोशल मीडिया पर लोग दो हिस्सों में बंट जाते हैं। कुछ कहते हैं, “वाह, कितनी दरियादिली।” कुछ सवाल उठाते हैं, “क्या यह सिर्फ पब्लिसिटी है?” लेकिन अगर आप सावजी ढोलकिया की जिंदगी को शुरू से देखें, तो समझ आएगा कि यह किसी कैमरे के सामने किया गया ड्रामा नहीं, बल्कि उस दर्द की गूंज है जिसे उन्होंने खुद महसूस किया है।
सावजी ढोलकिया का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। खेती, मौसम पर निर्भर आमदनी और सीमित संसाधन—यही उनका बचपन था। गांव में सपने देखने की जगह बहुत कम होती है। वहां पहले पेट भरने की चिंता होती है, फिर बाकी बातें आती हैं। पढ़ाई भी कई बार मजबूरी में छूट जाती है। सावजी के साथ भी यही हुआ। पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई रुक गई। उस उम्र में जब बच्चे नई किताबों का इंतज़ार करते हैं, सावजी को घर की जिम्मेदारियों का बोझ समझ में आने लगा था।
1977 का साल उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बना। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने फैसला किया कि अब कुछ करना होगा। घर में हालात ऐसे नहीं थे कि बैठकर इंतज़ार किया जाए। इसलिए वह अपने चाचा के साथ सूरत की ओर निकल पड़े। सूरत—एक ऐसा शहर जो उस वक्त कपड़े और हीरे के कारोबार के लिए जाना जाता था। कहा जाता है कि जब सावजी सूरत पहुंचे, तो उनकी जेब में सिर्फ 12 रुपये थे। आज के ज़माने में यह रकम सुनकर हंसी आ सकती है, लेकिन उस वक्त यह उनकी पूरी पूंजी थी।
सूरत ने उनका खुले दिल से स्वागत नहीं किया। कोई रेड कारपेट नहीं, कोई गाइड नहीं। बस एक अनजान शहर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और खुद को साबित करने की चुनौती। शुरुआत एक हीरा पॉलिशिंग फैक्ट्री से हुई। काम मुश्किल था, हाथों में छाले पड़ते थे, आंखों पर ज़ोर पड़ता था। लेकिन सावजी ने कभी शिकायत नहीं की। उन्हें 179 रुपये महीने की सैलरी मिलती थी। यह रकम भले छोटी लगे, लेकिन उस वक्त उनके लिए यह आत्मसम्मान की पहली कमाई थी।
यहीं से सावजी की सोच बाकी लोगों से अलग दिखने लगी। ज़्यादातर लोग उस सैलरी को जैसे-तैसे खर्च कर देते, लेकिन सावजी ने बचत शुरू कर दी। हर महीने 39 रुपये अलग रख देते थे। सोचिए—179 में से 39 रुपये बचाना। यह सिर्फ पैसों की बचत नहीं थी, यह अनुशासन था, भविष्य की तैयारी थी। यह इस बात का संकेत था कि यह लड़का सिर्फ आज के लिए नहीं, कल के लिए जी रहा है।
काम के साथ-साथ सावजी सीखते भी गए। उन्होंने हीरे की दुनिया को बहुत करीब से देखा। कौन सा पत्थर किस क्वालिटी का है, किस देश में किस तरह के हीरे की मांग है, कैसे ग्राहक बनते हैं और कैसे टूटते हैं—यह सब उन्होंने फैक्ट्री के फर्श पर खड़े होकर सीखा। यह ज्ञान किसी किताब में नहीं मिलता। यही उनकी असली यूनिवर्सिटी थी।
धीरे-धीरे साल बीतते गए। अनुभव बढ़ा, आत्मविश्वास भी। और फिर 1984 में वह दिन आया जब सावजी ने नौकरी से आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने अपने भाइयों हिम्मत और तुलसी के साथ मिलकर हरि कृष्णा एक्सपोर्टर्स की शुरुआत की। यह आसान फैसला नहीं था। नौकरी छोड़ना, पूंजी जुटाना, बाजार में जगह बनाना—हर कदम पर Risk था। लेकिन सावजी ने कभी Risk से भागना नहीं सीखा था।
शुरुआत में कंपनी छोटी थी, ऑर्डर सीमित थे, लेकिन एक चीज़ साफ थी—क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होगा। ग्राहकों से किया गया वादा निभाया जाएगा, चाहे मुनाफा कम हो जाए। यही सोच धीरे-धीरे कंपनी की पहचान बन गई। 1992 में हरि कृष्णा एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के रूप में कंपनी ने एक नई उड़ान भरी। अब यह सिर्फ एक छोटा कारोबार नहीं, बल्कि एक प्रोफेशनल संगठन बन चुका था।
इसके बाद जो हुआ, वह मेहनत का नतीजा था। कंपनी ने इंटरनेशनल मार्केट में कदम रखा। पॉलिश्ड डायमंड्स की डिमांड बढ़ी। अमेरिका, यूरोप, मिडल ईस्ट, एशिया—79 से ज्यादा देशों में हरि कृष्णा के हीरे पहुंचने लगे। जिस इंसान ने कभी खुद मशीन पर खड़े होकर काम किया था, आज उसकी कंपनी हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी।
आज सावजी ढोलकिया की नेटवर्थ करीब 16,000 करोड़ रुपये बताई जाती है। वह गुजरात के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। लेकिन अगर आप उनसे पूछें कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, तो शायद वह यह नहीं कहेंगे कि उनकी कंपनी का टर्नओवर कितना है। वह कहेंगे—“मेरे लोग।”
यहीं से उनकी कहानी बाकी बिजनेस स्टोरीज़ से अलग हो जाती है। सावजी ढोलकिया को लोग सिर्फ एक सफल कारोबारी के रूप में नहीं जानते, बल्कि एक ऐसे मालिक के रूप में जानते हैं जो अपने कर्मचारियों को परिवार मानता है। दिवाली आती है और वह कर्मचारियों को बोनस के साथ-साथ कारें, घर और दूसरी सुविधाएं देते हैं। यह किसी साल की बात नहीं, यह एक सोच है।
बहुत से लोग पूछते हैं—“इतना देने की क्या ज़रूरत है?” शायद इसका जवाब सावजी का अतीत है। जिसने खुद अभाव देखा हो, उसे पता होता है कि छोटी सी मदद किसी की ज़िंदगी बदल सकती है। वह जानते हैं कि कर्मचारी सिर्फ मशीन का पुर्जा नहीं होते, वे भी सपने देखते हैं, जिम्मेदारियां निभाते हैं।
आज जब बड़े-बड़े कॉरपोरेट ग्रुप डायमंड और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में उतर रहे हैं, मुकाबला आसान नहीं है। लेकिन सावजी ढोलकिया की ताकत सिर्फ पैसा नहीं है। उनकी ताकत है उनकी टीम, उनका अनुभव और वो भरोसा जो दशकों में बना है। जिस इंसान ने 12 रुपये से शुरुआत की हो, उसे बड़े नामों से डर नहीं लगता।
इस कहानी से हमें एक गहरी सीख मिलती है। सफलता सिर्फ अमीरी नहीं होती। सफलता वह होती है जब आप ऊपर उठते हुए दूसरों का हाथ भी थामे रखते हैं। सावजी ढोलकिया ने साबित किया कि बिजनेस का असली मतलब सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि मूल्य होता है। तो अगली बार जब आप सुनें कि किसी कारोबारी ने कर्मचारियों को कार या घर गिफ्ट किया, तो इसे सिर्फ खबर मत समझिए। यह उस 13 साल के लड़के की कहानी का विस्तार है, जिसने 12 रुपये की जेब से 16,000 करोड़ का सफर तय किया… और रास्ते में यह नहीं भूला कि असली हीरे इंसानों के दिल में होते हैं, तिजोरी में नहीं।
Conclusion
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