Shocking Reality: Sanjeev Sanyal की मजबूत सोच — कमजोर रुपया, बड़ी बहस | क्या डेटा उनकी बात साबित करता है? 2025

सोचिए ज़रा… सुबह आप मोबाइल खोलते हैं और एक हेडलाइन चमकती है—“रुपया फिर टूटा, डॉलर के सामने नई गिरावट।” दिल में हल्की सी बेचैनी होती है। दिमाग तुरंत पेट्रोल, गैस, महंगाई, EMI और foreign investment की तरफ भागता है। लेकिन इसी बीच एक टॉप इकोनॉमिस्ट सामने आकर कहता है—“मुझे रुपये की कमजोरी की बिल्कुल भी चिंता नहीं है।” यहीं पर कहानी दिलचस्प हो जाती है। क्योंकि जब आम आदमी घबराया हुआ है, तब देश की आर्थिक नीति से जुड़े लोग कह रहे हैं—चिंता मत करो। सवाल ये है कि क्या वाकई कमजोर रुपया डरने की बात नहीं है, या फिर हम किसी बड़े खतरे को नजरअंदाज कर रहे हैं?

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री की Economic Advisory Council के सदस्य, Sanjeev Sanyal का बयान ऐसे वक्त पर आया है जब रुपया तेज़ी से फिसलता दिख रहा है। कुछ ही दिनों में 90 से 91 प्रति डॉलर तक का सफर तय कर लेना अपने आप में बड़ा मूव है। आम तौर पर ऐसी गिरावट को आर्थिक कमजोरी, कैपिटल आउटफ्लो या मैक्रो तनाव से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन सान्याल की दलील इस पूरी बहस को उलट देती है। उनका कहना है—ऊंची ग्रोथ वाले दौर में करेंसी का कमजोर होना असामान्य नहीं, बल्कि कई बार रणनीतिक भी होता है।

यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन अगर इतिहास की परतें खोलें तो तस्वीर थोड़ी साफ होने लगती है। सान्याल ने जापान और चीन का उदाहरण दिया। जब जापान 1960 और 70 के दशक में तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, तब उसकी करेंसी जानबूझकर कमजोर रखी गई थी। उसी तरह चीन ने 1990 और 2000 के दशक में युआन को लंबे समय तक नियंत्रित और कमजोर बनाए रखा, ताकि उसका Export सस्ता रहे और फैक्ट्रियां दुनिया भर में Competitive बन सकें। यानी कमजोर करेंसी हमेशा संकट का संकेत नहीं होती, कभी-कभी वह ग्रोथ की रणनीति का हिस्सा भी होती है।

लेकिन यहीं से दूसरी बहस शुरू होती है। भारत आज 1990 का चीन नहीं है, न ही 1970 का जापान। भारत की इकोनॉमी की संरचना अलग है। हमारा Import-export पैटर्न अलग है। हमारी इंडस्ट्री कई मामलों में अभी भी Import पर निर्भर है—खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सेमीकंडक्टर्स, केमिकल्स और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स में। ऐसे में सवाल उठता है—अगर रुपया कमजोर होता है, तो क्या वाकई Export को फायदा होगा या Import महंगा होकर फायदा खा जाएगा?

यहीं पर रिसर्च की आवाज़ एंट्री लेती है। कई हालिया अध्ययनों ने यह दिखाया है कि रुपये की कमजोरी से मिलने वाला फायदा अब उतना सीधा नहीं रह गया है। थ्योरी में पढ़ाया जाता है कि कमजोर करेंसी से एक्सपोर्ट सस्ते होते हैं, ऑर्डर बढ़ते हैं और ट्रेड बैलेंस सुधरता है। लेकिन प्रैक्टिस में तस्वीर इतनी सरल नहीं है। भारत के बहुत से Export सेक्टर्स Imported कच्चे माल और कंपोनेंट्स पर निर्भर हैं। जब रुपया गिरता है, तो इन इनपुट्स की लागत बढ़ जाती है, जिससे एक्सपोर्ट का फायदा सीमित हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स को लें। भारत मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक सामान का बड़ा एक्सपोर्टर बनना चाहता है। लेकिन इन प्रोडक्ट्स के लिए चिप्स, डिस्प्ले, बैटरी जैसे कई हिस्से बाहर से आते हैं। रुपया कमजोर हुआ तो इन हिस्सों की कीमत बढ़ेगी। नतीजा—एक्सपोर्ट प्राइस का फायदा काफी हद तक खत्म हो जाएगा। यही कहानी केमिकल्स, मशीनरी और पेट्रोलियम आधारित प्रोडक्ट्स में भी दिखती है।

कुछ रिसर्च यह भी कहती हैं कि कमजोर रुपये का असर असमान होता है। फूड और एग्री-आधारित एक्सपोर्ट को थोड़ा ज्यादा फायदा मिल सकता है, क्योंकि इनकी Import निर्भरता कम होती है। लेकिन कुल मिलाकर, भारत जैसे देश में करेंसी गिरावट ट्रेड बैलेंस को चमत्कारी तरीके से नहीं सुधारती। कई बार तो उल्टा, इम्पोर्ट बिल बढ़ने से घाटा और चौड़ा हो जाता है।

इसीलिए कुछ अर्थशास्त्री कहते हैं कि रुपया भारत के लिए “शॉक एब्जॉर्बर” की तरह काम नहीं करता। यानी अगर ग्लोबल झटका लगे, तो करेंसी गिरकर उसे सोख ले—यह मॉडल भारत में पूरी तरह काम नहीं करता। क्योंकि Import की संरचना ऐसी है कि कीमतों का असर जल्दी दिखने लगता है। हालांकि सान्याल इस बात पर जोर देते हैं कि फिलहाल रुपये की कमजोरी से घरेलू महंगाई नहीं बढ़ी है, और यही सबसे अहम बात है।

महंगाई ही असली कसौटी है। अगर रुपया गिरता है और पेट्रोल, डीज़ल, खाना-पीना, दवाइयां सब महंगे हो जाते हैं, तब यह आम आदमी के लिए सीधा संकट बन जाता है। लेकिन अगर महंगाई कंट्रोल में रहती है, तो करेंसी की गिरावट को सिर्फ नंबर का खेल मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है। अभी तक भारत में यही स्थिति दिख रही है। तेल की कीमतें बहुत उछली नहीं हैं, फूड इंफ्लेशन भी मैनेज में है। इसीलिए नीति-निर्माता घबराए हुए नहीं दिखते।

अब एक और एंगल समझना जरूरी है—कैपिटल फ्लो। इस साल रुपये की गिरावट का बड़ा कारण विदेशी पूंजी का बाहर जाना भी है। जब foreign investors भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया दबाव में आता है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि यह निकासी भारत की अर्थव्यवस्था पर अविश्वास का संकेत हो। कई बार यह ग्लोबल फैक्टर का नतीजा होता है—जैसे अमेरिका में ब्याज दरें, वहां बॉन्ड यील्ड्स, या दुनिया के दूसरे हिस्सों में अचानक बने अवसर।

foreign exchange reserves इस कहानी का अहम किरदार है। जब किसी देश के पास पर्याप्त डॉलर रिज़र्व होते हैं, तो वह बाजार में जरूरत पड़ने पर दखल दे सकता है। इससे करेंसी में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सकता है। भारत ने पिछले एक दशक में इस मोर्चे पर काफी मजबूती हासिल की है। यही वजह है कि रुपये की चाल भले कमजोर हो, लेकिन वह बेकाबू नहीं दिखती।

अब सवाल उठता है—तो क्या हमें कमजोर रुपये की बिल्कुल चिंता नहीं करनी चाहिए? जवाब इतना सीधा नहीं है। अल्पकाल में अगर महंगाई कंट्रोल में है और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बनी हुई है, तो घबराने की जरूरत नहीं। लेकिन लंबी अवधि में अगर करेंसी लगातार कमजोर होती रहे, तो यह कुछ स्ट्रक्चरल सवाल खड़े कर सकती है। जैसे—क्या हमारी मैन्युफैक्चरिंग पर्याप्त मजबूत है? क्या हम Import निर्भरता कम कर पा रहे हैं? क्या हम हाई-वैल्यू एक्सपोर्ट बढ़ा पा रहे हैं?

असल में, कमजोर रुपया एक लक्षण है, बीमारी नहीं। बीमारी तब होगी जब ग्रोथ स्लो हो, महंगाई बढ़े, investment रुक जाए और रोजगार पर असर पड़े। अभी भारत उस स्थिति में नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि रुपये की कमजोरी को “कुछ भी मायने नहीं रखता” कहकर पूरी तरह नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा।

यह एक संकेत है, जिसे समझना जरूरी है हालांकि इस पूरी बहस में एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। करेंसी अक्सर भरोसे का आईना होती है। जब लोग देखते हैं कि रुपया गिर रहा है, तो उन्हें लगता है कि अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, भले ही डेटा कुछ और कहे। यही वजह है कि नीति-निर्माताओं के बयान इतने अहम हो जाते हैं। वे सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि भावनाओं से भी जूझ रहे होते हैं।

Sanjeev Sanyal की बात का असली मतलब शायद यही है—हमें घबराहट में फैसले नहीं लेने चाहिए। हर गिरावट को संकट मान लेना भी उतना ही खतरनाक है, जितना हर गिरावट को नजरअंदाज कर देना। संतुलन जरूरी है। इतिहास से सीख लेना जरूरी है, लेकिन आज की संरचना को समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

आज भारत एक ट्रांजिशन फेज में है। हम एक्सपोर्ट बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन साथ ही आत्मनिर्भर भी बनना चाहते हैं। हम ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा भी बनना चाहते हैं और अपनी घरेलू इंडस्ट्री को भी बचाना चाहते हैं। ऐसे में करेंसी का रोल भी बदल जाता है। वह सिर्फ ट्रेड का टूल नहीं रहती, बल्कि स्ट्रैटेजिक बैलेंस का हिस्सा बन जाती है।

Conclusion

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