Sanjeev Sanyal का Economic Reality Check: Free Bus, Free Bijli… पर देश का Bill कौन चुकाएगा? 2026

सोचिए… एक दिन सुबह आप उठते हैं और खबर आती है—सरकार ने फिर से एक नई “फ्री” योजना लॉन्च कर दी। कहीं फ्री बिजली, कहीं फ्री पानी, कहीं फ्री बस यात्रा, कहीं फ्री राशन… स्क्रीन पर चमकते ये वादे शुरुआत में खुशी देते हैं, उम्मीद देते हैं, और कई लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला देते हैं। लेकिन कुछ दूर कहीं देश की आर्थिक मशीनरी के अंदर, कुछ gears धीरे धीरे घिसने लगते हैं।

बजट की किताब में numbers हिलते हैं, balance sheets का सवाल कठिन होता जाता है और अर्थव्यवस्था की धड़कन थोड़ी तेज हो जाती है। बाहर से सब कुछ “जनकल्याण” जैसा दिखता है… लेकिन अंदर कहीं ये सवाल चिल्लाता है—“Free तो दे दिया… पर इसका bill कौन भरेगा?” और यही वह सवाल है जिसे देश के जाने माने अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने बहुत साफ, बहुत सख्त और बहुत गंभीर तरीके से उठाया है।

ये कहानी सिर्फ free schemes की नहीं है, ये कहानी उस thin line की है जो welfare और freebie के बीच खींची जाती है। ये कहानी उस भविष्य की है, जो अगर आज समझदार फैसलों से secure न किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसका बोझ ढोते ढोते टूट जाएंगी। और ये कहानी उस सच्चाई की है, जिसे सुनना शायद कई लोगों को अच्छा नहीं लगेगा… लेकिन इससे आंखें बंद करने का मतलब है आने वाले संकट को खुद बुलाना।

Sanjeev Sanyal ने सबसे पहले एक बहुत बड़ा फर्क साफ किया—welfare और freebie का फर्क। Welfare का मतलब है जरूरतमंदों को support देना, ताकि वो गिरकर टूट न जाएं। Freebies का मतलब है चुनाव जीतने के लिए, लोकप्रियता पाने के लिए, या political advantage के लिए बिना सोचे समझे मुफ्त बांटना। और यही अंतर तय करता है कि कोई योजना देश के लिए “medicine” है या “poison”।

सान्याल कहते हैं कि एक विकसित और महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था में social safety net बहुत जरूरी है। जहां Risk है, वहां गिरने का खतरा भी है। चाहे startup founder हो या एक छोटा shopkeeper, चाहे farmer हो या urban working class, हर किसी की जिंदगी uncertainty के साथ चलती है। ऐसे में उन लोगों को पकड़कर खड़ा करना जरूरी है जो फिसल जाते हैं। यही welfare का असली अर्थ है—गरीब को सहारा देना, उसे खड़ा होने का मौका देना, उसे ऊपर चढ़ने की सीढ़ी देना।

लेकिन असली खतरा तब पैदा होता है जब “मदद” politics बन जाती है, और “सुविधा” vote bank strategy। जब schemes इस आधार पर नहीं बनतीं कि किसे सच में जरूरत है, बल्कि इस आधार पर बनती हैं कि किसे खुश करने से फायदा मिलेगा। जब subsidies जरूरतमंद का हक बनकर नहीं आतीं, बल्कि हर किसी के लिए “free gift” बन जाती हैं। यही वो जगह है जहां welfare, freebie में बदल जाता है। और यही वो जगह है जहां देश की आर्थिक सेहत खतरे में पड़ने लगती है।

सान्याल ने एक बहुत दिलचस्प बात कही—development अपने आप सभी तक नहीं पहुंचता। Growth trickle down जरूर होती है, लेकिन equal नहीं। कुछ लोग ऊपर चढ़ जाते हैं, कुछ बीच में अटक जाते हैं और कुछ नीचे ही रह जाते हैं। इसलिए “assisted trickle down” जरूरी है। यानी सरकारों को ऐसे strong और well designed welfare models बनाने चाहिए, जो उन लोगों की मदद करें जो अपनी कोशिश के बावजूद ऊपर नहीं चढ़ पा रहे हैं। उन्हें पढ़ाई, health care, nutrition, रोजगार training, और genuine financial support मिलना चाहिए। ये देश को मजबूत करता है। ये welfare है। ये investment है।

लेकिन जब किसी भी तरह की सुविधा universal free कर दी जाती है, बिना यह देखे कि किसे जरूरत है और किसे नहीं… तब वो system के लिए खतरा बन जाती है। उदाहरण के तौर पर, महिलाओं के लिए universal free bus travel योजना को उन्होंने सवालों के घेरे में रखा।

उनका तर्क ये था—अगर आप आर्थिक जरूरत के आधार पर योजना बनाते हैं तो वो welfare है। लेकिन अगर सिर्फ gender के आधार पर universal free दे दिया जाए, तो उससे गरीब महिला को मदद मिलेगी, लेकिन same condition वाला गरीब पुरुष मदद से वंचित रह जाएगा। ऐसे में योजना welfare नहीं रहती, political optics बन जाती है। और जब योजनाएँ optics driven हो जाती हैं, तो उनकी कीमत country की economy अदा करती है।

पर असली डर freebies नहीं… पेंशन के पहाड़ जैसा बोझ है। पुरानी ultra generous pension schemes का ghost आज भी कई देशों की economy के सिर पर खड़ा है। और यही खतरा भारत के लिए भी सान्याल ने इंगित किया। उन्होंने बहुत categorically कहा—Old Pension Scheme जैसी योजनाएँ आने वाली पीढ़ियों पर वित्तीय बम की तरह हैं। आज जो “हक” के नाम पर attractive लगता है, वो कल देश की सरकारों को आर्थिक दीवार से टकरा सकता है। आज जो कर्मचारी secure लगते हैं, वही future में सबसे बड़े shock के शिकार हो सकते हैं।

सान्याल ने ये भी समझाया कि भारत की working age population अभी तो मजबूत है, लेकिन हमेशा नहीं रहेगी। अगले 20 से 25 सालों में demographic structure बदलना शुरू हो जाएगा। आज जो लोग काम कर रहे हैं, कल वही pension लेंगे। अगर system ऐसा होगा जिसमें current workers की कमाई से pensioners को पैसा दिया जाएगा, तो आने वाले समय में ये model collapse कर सकता है। क्योंकि उस समय काम करने वालों की संख्या घटेगी और pension लेने वालों की संख्या बढ़ेगी। ऐसे में सवाल उठता है—जब देने वाले कम और लेने वाले ज्यादा होंगे, तब ये system जिंदा कैसे रहेगा?

अगर ये सिर्फ भारत का डर होता, तो शायद इस पर debate का flavor अलग होता। लेकिन दुनिया ने पहले ही इसके परिणाम देख लिए हैं। यूरोप में कई देशों की economy पेंशन burden में दब चुकी है। कई देशों ने retirement age 70 और 75 तक बढ़ानी पड़ी। कहीं protests हुए, कहीं सड़कें भर गईं, कहीं system हिल गई। फ्रांस में तो हालात ऐसे बताए गए कि काम करने वालों से ज्यादा pension लेने वाले हैं। ये mathematical disaster है। जब equation गलत हो जाती है, तो भावुकता उसे बचा नहीं सकती।

सान्याल ने साफ कहा—जो आज young government employees Old Pension Scheme को लेकर उत्साहित हैं, उन्हें बहुत सावधान रहना चाहिए। वो 35 से 40 साल तक tax देंगे, काम करेंगे, contribute करेंगे… लेकिन ये guarantee नहीं है कि जब उनकी बारी आएगी, तब system में पैसा बचेगा भी या नहीं। अगर structure ही unsustainable है, तो ये सिर्फ political narrative है… economic truth नहीं। और truth हमेशा अंत में जीतता है, चाहे वो कितना भी कठोर क्यों न हो।

अब असली सवाल पर लौटते हैं—free बिजली, free bus, free ration, free pension, free schemes… सुनने में सब अच्छा लगता है। लेकिन एक कठोर fact है—इस दुनिया में कुछ भी सच में free नहीं होता। अगर बिजली free है, तो उसका bill कोई taxpayer भर रहा है। अगर bus free है, तो transport corporation का घाटा कोई सरकार उठा रही है… और सरकार का पैसा कहां से आता है? जनता के टैक्स से। अगर pension ultra luxurious है, तो वो आने वाली generation की कमाई से जाएगी। “Free” शब्द जितना चमकदार दिखता है, उसकी shadow उतनी ही लंबी और dark होती है।

इसका यह मतलब नहीं कि देश को welfare नहीं चाहिए। सान्याल भी बार बार ये कहते हैं कि welfare जरूरी है। गरीब को support मिलना चाहिए। कमजोर को सहारा मिलना चाहिए। गिरने वाले को हाथ मिलना चाहिए। लेकिन welfare सोच समझकर, लक्ष्य आधारित, जिम्मेदारी के साथ और economic discipline के दायरे में होना चाहिए।

ये मदद होनी चाहिए, dependency नहीं। ये सीढ़ी होनी चाहिए, permanent crutch नहीं। आज के नेता popularity के लिए instant applause चाहते हैं। Free schemes तत्काल तालियां दिलाती हैं, slogans दिलाती हैं, headlines दिलाती हैं। लेकिन देश की economy headlines से नहीं चलती, hard numbers से चलती है। Budget सिर्फ political paragraph नहीं… future का blueprint होता है। और अगर blueprint hollow होगा, तो building collapse होना तय है।

अगर किसी देश को मजबूत बनाना है, तो ज़िम्मेदारी वाली राजनीति चाहिए। योजनाएँ ऐसी होनी चाहिए, जो temporary happiness के बजाय long term stability दें। शिक्षा, healthcare, infrastructure, employment, innovation—यही वो sectors हैं जो देश को rich बनाते हैं।

Free schemes देश को temporarily खुश कर सकती हैं, पर sustainable progress नहीं दे सकतीं। और इसलिए ये सवाल सिर्फ सरकारों से नहीं… हम सब से भी है। क्या हम उस politics का समर्थन करेंगे जो हमें free देकर dependency बनाती है? या उस vision का हिस्सा बनेंगे जो हमें empower करता है, capable बनाता है, strong बनाता है? हमें ये समझना होगा कि “मुफ्त” का लालच जितना मीठा लगता है, उसका बाद का taste कभी कभी बहुत कड़वा निकलता है।

Conclusion

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