Piyush Pandey — वो शब्द जिसने बदल दी भारत की आवाज़ और रच दी विज्ञापन की अमर कहानी। 2025

ज़रा सोचिए… एक ऐसा इंसान, जिसके लिखे शब्दों ने करोड़ों लोगों की सोच बदल दी। जिसने देश को सिर्फ़ एक नारा नहीं, बल्कि एक नई पहचान दी — “अबकी बार, मोदी सरकार।” जिसकी आवाज़ हर टीवी स्क्रीन पर, हर रेडियो पर, और हर भारतीय के दिल में गूंजती रही। लेकिन आज वो आवाज़ खामोश हो गई है। भारत के एड गुरु, रचनात्मकता के बादशाह, और भावनाओं को ब्रांड में बदलने वाले जादूगर — Piyush Pandey अब हमारे बीच नहीं रहे।

सुबह का वक्त था, मुंबई का आसमान धुंधला था, और शहर की सड़कों पर सामान्य सी हलचल चल रही थी। लेकिन ओगिल्वी के ऑफिस में, जहां से भारत के सबसे यादगार विज्ञापन निकले, एक सन्नाटा पसरा था। क्योंकि उस सुबह, 5:50 पर, एक ऐसा इंसान चला गया जिसने भारत को सिखाया कि “advertisement सिर्फ़ बेचना नहीं होता, advertisement वो एहसास है जो दिल में उतरता है।”

पीयूष पांडे… एक ऐसा नाम जो आज भी ‘फेविकोल का जोड़े रखो’ सुनते ही मुस्कान ला देता है। ‘कैडबरी का कुछ खास है’ गुनगुनाने पर दिल मीठा कर देता है। और ‘हर खुशी में रंग लाए एशियन पेंट्स’ सुनते ही घर की दीवारों तक को यादें रंग देती हैं। लेकिन उनके जीवन की कहानी सिर्फ़ क्रिएटिविटी की नहीं — यह कहानी है एक ऐसे इंसान की, जिसने अपनी सादगी, अपने देसी टच और अपनी संवेदनशीलता से भारत की आत्मा को विज्ञापन में बदल दिया।

जयपुर की गलियों से निकलकर ओगिल्वी के ग्लोबल क्रिएटिव हेड तक का सफर — सुनने में यह एक पेशेवर यात्रा लगती है, लेकिन असल में यह कहानी है एक इंसान की जो शब्दों से दुनिया बदलना चाहता था। बचपन में जब बाकी बच्चे क्रिकेट खेलते थे, तब पीयूष बल्ले और गेंद के बीच “स्ट्रेट ड्राइव” की जगह “स्ट्रेट बात” खोजते थे। शायद इसी जुनून ने उन्हें राजस्थान की रणजी टीम तक पहुंचाया। लेकिन खेल के मैदान से आगे उनका खेल अलग था — शब्दों का खेल, भावनाओं का खेल, और इंसानों के दिल जीतने का खेल।

1982 — यह वो साल था जब उन्होंने ओगिल्वी एंड माथर जॉइन की। एक छोटे से कॉपीराइटर की हैसियत से शुरुआत की, और धीरे-धीरे भारत के विज्ञापन इतिहास के सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचे। उन्होंने कभी किताबों से नहीं सीखा कि “कैसे बेचा जाए”, उन्होंने लोगों से सीखा कि “कैसे छुआ जाए।” उनका कहना था — “अगर आपका विज्ञापन किसी गांव की औरत या किसी रिक्शेवाले को समझ नहीं आया, तो फिर वो विज्ञापन है ही नहीं।”

उनके बनाए कैंपेन सिर्फ़ ब्रांड प्रमोशन नहीं थे, वो लोगों की यादें बन गए। ‘फेविकोल’ का अंडे वाला विज्ञापन — जिसमें अंडा नहीं टूटता क्योंकि कुर्सी फेविकोल से चिपकी होती है — यह सिर्फ़ हास्य नहीं, भारत की जिद का प्रतीक था। ‘कैडबरी डेयरी मिल्क’ के मैदान में डांस करती लड़की — यह सिर्फ़ चॉकलेट नहीं, खुशी की आज़ादी थी। और ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ — वो गीत जिसने भारत के हर कोने की आवाज़ को एक सुर में पिरोया — वह पीयूष पांडे की कलम का चमत्कार था।

उन्होंने कहा था, “India is not a country you sell to; it’s a country you speak to.” और उन्होंने वही किया — वो बोले भारत की भाषा में, भारत की धड़कन में। 2014 में, जब देश राजनीति के सबसे अहम मोड़ पर खड़ा था, पीयूष पांडे ने लिखा — “अबकी बार, मोदी सरकार।” सिर्फ़ पाँच शब्द। पर इन पाँच शब्दों ने इतिहास बदल दिया। ये नारा चुनावी रणनीति से ज्यादा एक जनभावना बन गया। चाहे कोई राजनीतिक मत रखे या न रखे, यह undeniable था कि यह नारा advertising history का turning point बन गया।

लेकिन पीयूष पांडे को अगर आप सिर्फ़ “मोदी नारे” या “फेविकोल एड” से पहचानें — तो यह उनके प्रति अन्याय होगा। क्योंकि उनकी असली पहचान थी उनकी इंसानियत। वे ऐसे व्यक्ति थे, जो ऑफिस में सबसे junior copywriter से लेकर global CEO तक सभी से एक ही सम्मान से बात करते थे। वो कहते थे, “रचनात्मकता hierarchy नहीं जानती। एक अच्छा आइडिया किसी से भी आ सकता है।”

उनकी बहन, गायिका इला अरुण, हमेशा कहती थीं कि “पीयूष सबसे खुशमिजाज और शरारती इंसान थे।” घर में माहौल चाहे कितना भी गंभीर हो, वे अपनी trademark हंसी से सबको हंसा देते थे। उनका कहना था — “अगर आप हंस सकते हैं, तो आप सोच सकते हैं। और अगर आप सोच सकते हैं, तो आप कुछ बड़ा बना सकते हैं।”

उनकी ज़िंदगी में क्रिकेट का जुनून कभी खत्म नहीं हुआ। जब उनसे पूछा गया कि “अगर आप एडवर्टाइजिंग में नहीं होते, तो क्या करते?”, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा — “शायद अब भी विकेटकीपिंग कर रहा होता।” यह वही विनम्रता थी जिसने उन्हें आम भारतीय के और करीब ला दिया।

2004 में, जब वो Cannes Lions के जूरी प्रेसिडेंट बने — वो पल भारतीय विज्ञापन जगत के लिए इतिहास था। पहली बार कोई एशियाई उस कुर्सी पर बैठा था, जहां अब तक सिर्फ़ यूरोप और अमेरिका के लोग बैठे थे। उन्होंने साबित किया कि creativity की भाषा global होती है, लेकिन उसकी जड़ें लोकल होती हैं।

उनकी जिंदगी में पुरस्कारों की कमी नहीं थी। Padma Shri (2016), London International Awards Legend Award (2024), और सैकड़ों ग्लोबल ऑनर्स — लेकिन उन्होंने कभी इनको गर्व से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पहना। उन्होंने कहा था — “Awards दीवार पर अच्छे लगते हैं, लेकिन असली satisfaction तब है जब कोई कहे ‘आपका ad देखकर मुझे हंसी आई या आंखें भर आईं।’”

उनकी सोच हमेशा सरल थी। एक बार एक journalist ने पूछा — “आपको क्या लगता है, सबसे अच्छा Indian ad कौन-सा है?” उन्होंने बिना सोचे कहा — “‘Lijjat Papad’ का ad। क्योंकि वो असली इंडिया है — महिलाएं, हंसी, मेहनत और स्वाद।” वो simplicity, वो warmth, वही थी जो पीयूष पांडे की पहचान बन गई। उन्होंने साबित किया कि विज्ञापन सिर्फ़ कॉर्पोरेट बोर्डरूम का खेल नहीं — यह गली, मोहल्ले, गांव, और घर के emotion से जुड़ा है।

जब उनके निधन की खबर आई, सोशल मीडिया पर भावनाओं की बाढ़ आ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखा — “पीयूष पांडे जी की रचनात्मक प्रतिभा को सभी ने सराहा। उन्होंने विज्ञापन और संचार की दुनिया में अभूतपूर्व योगदान दिया।” गौतम अडानी ने कहा — “उन्होंने भारत के विज्ञापन को आत्मविश्वास और स्वदेशी पहचान दी।” आनंद महिंद्रा ने लिखा — “उनकी हंसी, उनकी energy, उनके ads से भी ज़्यादा याद आएगी।” और उदय कोटक ने याद किया कि कैसे 2003 में उनके बैंक का पहला ad campaign पीयूष ने बनाया था, जिसने ‘बैंकिंग को relatable बना दिया।’

इन सभी संदेशों में एक समान भाव था — gratitude। क्योंकि पीयूष पांडे ने सिर्फ़ विज्ञापन नहीं बनाए, उन्होंने इंसानों और ब्रांड्स के बीच एक रिश्ता बनाया। उन्होंने बताया कि communication सिर्फ़ ‘message’ नहीं होता, वो ‘connection’ होता है। अपने अंतिम वर्षों में भी वे ओगिल्वी से जुड़े रहे, एक mentor की भूमिका में। मुंबई के शिवाजी पार्क में अपनी पत्नी के साथ सादा जीवन जी रहे थे। जहां हर शाम वो कहते — “अच्छे ad वही होते हैं जो जिंदगी के असली पलों से निकलते हैं।”

उनका philosophy simple था — “Ad लोगों के लिए बनाओ, awards के लिए नहीं।” और शायद इसी वजह से आज भी ‘Fevicol’ का truck वाला ad याद है, decades बाद भी।कई बार लोग उनसे पूछते थे — “आपके ads इतने relatable क्यों लगते हैं?” वो हंसकर कहते — “क्योंकि मैं consumers से बात नहीं करता, मैं लोगों से करता हूं। और लोग सिर्फ़ price नहीं देखते, वो प्यार देखते हैं।” उनकी ये बात Indian marketing के हर नए professional के लिए एक सीख है — कि product से पहले दिल जीतना ज़रूरी है।

वो कहते थे — “Advertising का असली काम persuasion नहीं, participation है।” इसलिए उनके ads में हर कोई अपने आपको देखता था — एक गांव की औरत, एक शहर का clerk, एक teenager लड़की, या एक पिता जो बेटी के लिए Cadbury लाता है। पीयूष पांडे की ज़िंदगी में ‘glamour’ नहीं था, ‘grace’ थी। वो अपने success को कभी podium से नहीं मापते थे, बल्कि लोगों की मुस्कान से। उनका सबसे पसंदीदा quote था — “अगर आपके शब्द किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं, तो वही असली creativity है।”

और यही बात उनके हर campaign में झलकती थी। उनकी बहन इला अरुण ने कहा — “वो सिर्फ़ मेरे भाई नहीं, मेरे inspiration थे। उन्होंने सिखाया कि खुशी कोई concept नहीं, एक habit है।” आज जब हम उनकी legacy को देखते हैं, तो समझ आता है कि उन्होंने केवल slogans नहीं लिखे, उन्होंने भारत की आत्मा को शब्दों में गूंथा।

उनके बिना भारतीय advertising वैसी नहीं रहेगी, जैसी पहले थी। लेकिन उनकी philosophy, उनका हंसी-मज़ाक, और उनका emotional touch हमेशा हमारे साथ रहेगा। वो कहते थे — “जब लोग कहें ‘वाह! क्या ad है!’, तो वो नहीं, बल्कि ‘वाह! क्या ज़िंदगी है!’ महसूस होना चाहिए।” और सच में, उनकी ज़िंदगी एक बेहतरीन ad थी — जिसका concept था “humanity,” tagline थी “smile,” और brand था “India।”

Conclusion

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