ज़रा सोचिए… एक तरफ वह सपना जो भारत के लाखों छात्रों और Professionals की आँखों में चमकता है—अमेरिका जाना, सिलिकॉन वैली जैसी जगहों पर नौकरी पाना, डॉलर में वेतन कमाना और फिर अपने परिवार को एक नई ऊँचाई तक ले जाना। यह सपना सिर्फ़ कागज़ पर नहीं, बल्कि हकीकत में भी हर साल हजारों भारतीय परिवारों को नई उम्मीद देता रहा है। लेकिन अचानक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक फैसला आता है और पूरा गणित बिगड़ जाता है।
वह कहते हैं कि अब H-1B वीज़ा की फीस लगभग 1,500 डॉलर से बढ़ाकर 1 लाख अमेरिकी डॉलर कर दी जाएगी। यह सुनते ही जैसे उन परिवारों की सांसें थम जाती हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई और करियर पर लाखों रुपये खर्च करके सिर्फ इसी उम्मीद में Investment किया था कि, एक दिन अमेरिका की धरती पर उन्हें सफलता मिलेगी। और यह फैसला ऐसे समय पर आता है जब दुनिया पहले से ही अमेरिका की टैरिफ पॉलिसियों और आर्थिक फैसलों से हिली हुई है।
ऐसे में चीन चुप नहीं बैठता। वह तुरंत एक नई चाल चलता है और दुनिया के सामने एक नया वीज़ा प्रोग्राम पेश करता है—K Visa। सवाल यह उठता है कि क्या चीन वास्तव में इस मौके का इस्तेमाल करके अमेरिका को चुनौती देना चाहता है? क्या बीजिंग अब सिलिकॉन वैली 2.0 बनने की तैयारी कर रहा है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
H-1B वीज़ा का इतिहास देखें तो 1990 में अमेरिकी कांग्रेस ने इसे पेश किया था। इसका मकसद था उन नौकरियों के लिए Foreign professionals को बुलाना जिनमें Special skills की जरूरत होती थी—चाहे वह इंजीनियरिंग हो, रिसर्च हो या कंप्यूटर साइंस। धीरे-धीरे यह वीज़ा भारतीय आईटी Professionals के लिए जीवन की सबसे बड़ी सीढ़ी बन गया।
Infosys, TCS, Wipro, HCL जैसी भारतीय कंपनियाँ हजारों इंजीनियरों को अमेरिका भेजती रहीं। भारतीय छात्रों के लिए भी यह वीज़ा बेहद अहम रहा, क्योंकि मास्टर्स या पीएचडी करने के बाद उन्हें नौकरी पाने का यही सबसे आसान रास्ता था। लेकिन आज जब फीस 1 लाख डॉलर कर दी गई है, तो यह सिस्टम पूरी तरह बदल जाएगा। अब सिर्फ वही उम्मीदवार चुने जाएंगे जो अमेरिकी कंपनियों के लिए बिल्कुल अनिवार्य हों।
ट्रंप सरकार का तर्क है कि यह फैसला “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा है। उनका कहना है कि अमेरिका की नौकरियाँ पहले अमेरिकियों को मिलनी चाहिए और विदेशी टैलेंट सिर्फ वहीं बुलाया जाएगा जहाँ उसकी सख्त जरूरत है। इस फैसले से सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर होगा, क्योंकि हर साल जारी होने वाले H-1B वीज़ा का लगभग 77% भारतीय Professionals के पास जाता है। यानी यह एक तरह से भारत के आईटी सेक्टर और छात्रों के सपनों पर सीधा प्रहार है।
लेकिन जहां अमेरिका सख्ती दिखा रहा है, वहीं चीन ने ठीक उल्टा कदम उठाया है। चीन की स्टेट काउंसिल ने घोषणा की कि 1 अक्टूबर 2025 से K वीज़ा प्रोग्राम लागू होगा। यह वीज़ा खासतौर पर A I, बायोटेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी, डेटा साइंस और बिजनेस एनालिटिक्स जैसे भविष्य के क्षेत्रों के लिए बनाया गया है। चीन चाहता है कि दुनिया भर के सबसे होनहार वैज्ञानिक और तकनीकी प्रोफेशनल बीजिंग, शंघाई और शेनझेन में आकर रिसर्च करें, स्टार्टअप्स शुरू करें और उसकी डिजिटल इकोनॉमी को और मजबूत बनाएं।
K वीज़ा का लचीलापन इसे खास बनाता है। इसमें H-1B जैसी लॉटरी नहीं होगी। न ही स्पॉन्सरशिप का झंझट रहेगा। कोई भी योग्य उम्मीदवार सीधे आवेदन कर सकता है। इसमें मल्टीपल एंट्री और लंबे समय तक रहने की सुविधा भी होगी। इसका मतलब यह है कि अगर आपके पास STEM यानि science, technology, engineering and mathematics में डिग्री है और रिसर्च या इंडस्ट्री का अनुभव है, तो आप आसानी से चीन जा सकते हैं। यह संदेश साफ है—अमेरिका अगर दरवाज़ा बंद कर रहा है तो चीन उसे खोल रहा है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या विदेशी पेशेवर चीन में जाना चाहेंगे? चीन की छवि हमेशा से राजनीतिक सख्ती, सेंसरशिप और पारदर्शिता की कमी वाली रही है। वहाँ Intellectual Property यानी बौद्धिक संपदा की सुरक्षा पर सवाल उठते रहे हैं। कई विदेशी कंपनियाँ शिकायत कर चुकी हैं कि उनकी तकनीक और इनोवेशन को चीन ने अपने तरीके से इस्तेमाल किया। इसके अलावा भाषा, संस्कृति और राजनीतिक माहौल भी Foreign professionals के लिए कठिनाइयाँ पैदा करते हैं।
यही वजह है कि 2004 में चीन ने ग्रीन कार्ड पॉलिसी शुरू की थी, लेकिन 14 साल में सिर्फ 12,000 कार्ड जारी किए गए। इसके उलट, अमेरिका हर साल लाखों प्रवासियों को स्थायी निवास का अवसर देता है। कोविड महामारी के दौरान तो चीन से प्रवासियों का पलायन भी हुआ। ऐसे में K वीज़ा की राह आसान दिखती जरूर है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर सवाल बने हुए हैं।
भारत के लिए यह एक बड़ा मोड़ हो सकता है। अगर अमेरिका का रास्ता महँगा और कठिन हो रहा है, तो भारत के युवाओं के सामने चीन का विकल्प आ सकता है। लेकिन यह विकल्प आसान नहीं है। चीन में ऑपरेशनल कॉस्ट ज्यादा है, वहाँ के नियम-कानून जटिल हैं और राजनीतिक माहौल अस्थिर रहता है। भारतीय पेशेवर अमेरिका की तरह वहाँ सहज महसूस नहीं कर पाएंगे। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल K वीज़ा H-1B का सीधा विकल्प नहीं बन सकता। लेकिन लंबी अवधि में अगर चीन पारदर्शिता और करियर ग्रोथ पर ध्यान देता है, तो यह अमेरिका के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।
H-1B और K वीज़ा की तुलना करें तो फर्क साफ दिखता है। H-1B में लॉटरी सिस्टम है, Employer की स्पॉन्सरशिप जरूरी है और अब लागत भी बहुत ज्यादा हो गई है। K वीज़ा में लचीलापन है, रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप दोनों के लिए दरवाजे खुले हैं। लेकिन K वीज़ा की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। क्या चीन Intellectual Property की रक्षा करेगा? क्या वह विदेशी प्रोफेशनल्स को ग्रांट्स, हाउसिंग और स्पष्ट करियर पाथ देगा? क्या प्रोसेसिंग अमेरिका और यूरोप से तेज होगी? यह सब सवाल फिलहाल अनुत्तरित हैं।
यहाँ चीन की मंशा साफ नज़र आती है। अमेरिका ने जब दरवाजे बंद किए, चीन ने दुनिया को मैसेज दिया—“अगर अमेरिका तुम्हें नहीं चाहता, तो हमारे पास आओ।” यह सिर्फ वीज़ा पॉलिसी नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक रणनीति है। चीन जानता है कि 21वीं सदी की असली ताकत टेक्नोलॉजी और इनोवेशन हैं। अगर वह ग्लोबल टैलेंट को खींच लेता है, तो आने वाले दशकों में उसकी अर्थव्यवस्था और मज़बूत होगी। सिलिकॉन वैली जैसी छवि बनाने की उसकी कोशिश तेज होगी।
भारत इस स्थिति में दोहरी चुनौती का सामना करेगा। पहले से ही लाखों भारतीय छात्र अमेरिका पर निर्भर थे। अब अगर वह रास्ता बंद होता है और चीन नया रास्ता खोलता है, तो भारतीय टैलेंट का झुकाव बदल सकता है। ब्रेन ड्रेन अब अमेरिका से चीन की ओर शिफ्ट हो सकता है। भारत को अब यह सोचना होगा कि वह अपने टैलेंट को कैसे रोके। क्या भारत ऐसी नीतियाँ बनाएगा कि उसके युवाओं को अपने देश में ही अवसर मिलें? क्या भारत स्टार्टअप इकोसिस्टम, रिसर्च और टेक्नोलॉजी में इतना Investment करेगा कि उसके युवाओं को बाहर जाने की जरूरत न पड़े?
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय तेज़ी से आगे बढ़ रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5G, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ग्रीन एनर्जी—हर क्षेत्र में वह खुद को साबित कर रहा है। लेकिन अभी भी वह अमेरिका से पीछे है। सिलिकॉन वैली में लगभग 70% कर्मचारी विदेशी मूल के होते हैं। चीन में यह संख्या बेहद कम है। यही कारण है कि वह लगातार अपनी नीतियाँ बदल रहा है। K वीज़ा उसी का हिस्सा है।
अंततः यह कहानी सिर्फ वीज़ा पॉलिसी की नहीं है। यह कहानी दुनिया के बदलते पावर बैलेंस की है। अमेरिका जब दरवाजे बंद कर रहा है, चीन उन्हें खोल रहा है। भारत के लिए यह फैसला करना मुश्किल होगा कि उसके युवाओं का भविष्य किस ओर जाएगा। क्या भारतीय छात्र अब बीजिंग की राह चुनेंगे? क्या चीन सचमुच सिलिकॉन वैली 2.0 बन पाएगा? या फिर यह भी एक असफल प्रयोग साबित होगा?
Conclusion
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