सोचिए… सुबह अलार्म नहीं बजता, बॉस का फोन नहीं आता, मीटिंग्स नहीं होतीं, टारगेट नहीं होते… और फिर भी हर महीने अकाउंट में सैलरी आ जाती है। साल दर साल। बिना ऑफिस गए। बिना काम किए। अब ज़रा यहीं रुकिए। डर यहीं से पैदा होता है। क्योंकि सवाल उठता है—अगर कोई इंसान ऐसी ज़िंदगी में भी खुश नहीं है, तो फिर संतुष्टि आखिर होती कहां है?
और जिज्ञासा ये कि जब दुनिया नौकरी बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब एक शख्स “फ्री सैलरी” मिलने के बावजूद कोर्ट क्यों चला गया? ये कहानी है Ian Clifford की। एक आम कर्मचारी, लेकिन एक बिल्कुल असाधारण केस। ऐसी कहानी, जिसे सुनकर पहले आपको लगेगा कि ये सपना है, फिर लगेगा कि ये लालच है, और अंत में समझ आएगा कि ये सिस्टम, अधिकार और इंसानी सोच के टकराव की कहानी है।
सबसे पहले आपको बता दें कि Ian Clifford, IBM जैसी दिग्गज टेक कंपनी में काम करता था। वही IBM, जिसका नाम सुनते ही stability, corporate ethics और employee-friendly policies दिमाग में आती हैं। साल 2008 में Ian Clifford बीमार पड़े। बीमारी मामूली नहीं थी। इतनी गंभीर थी कि उन्हें long-term sick leave पर जाना पड़ा। शुरुआत में सबको लगा कि कुछ महीनों में वो ठीक होकर वापस आ जाएंगे। लेकिन महीने साल में बदलते चले गए।
एक साल बीता। दो साल बीते। फिर पांच साल। इयान अब भी sick leave पर थे। आमतौर पर ऐसे मामलों में कंपनियां या तो employee को medically unfit घोषित कर देती हैं, या फिर service terminate कर देती हैं। लेकिन IBM ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने इयान को नौकरी से नहीं निकाला। यहीं से कहानी normal नहीं रही।
2008 से 2013 तक, यानी पूरे पांच साल, Ian Clifford काम पर नहीं लौटे। इसी बीच उनकी बीमारी को गंभीर और स्थायी माना गया। IBM ने एक वक्त पर उनकी सैलरी रोक दी। कंपनी का तर्क था कि sick pay की एक सीमा होती है। इयान को ये बात मंजूर नहीं थी। उन्होंने कहा—अगर मैं employee हूं, तो मेरे अधिकार हैं। और यहीं से पहला कानूनी मोड़ आया।
Ian Clifford ने IBM के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी। मामला कोर्ट की ओर बढ़ा। अब IBM एक अजीब स्थिति में थी। एक तरफ employee की बीमारी और disability, दूसरी तरफ corporate policies और legal risk। आखिरकार 2013 में दोनों के बीच एक समझौता हुआ।
और यही समझौता इस पूरी कहानी का सबसे shocking हिस्सा है। IBM ने कहा—ठीक है। आप काम नहीं कर सकते, ये हम मानते हैं। लेकिन हम आपको नौकरी से नहीं निकालेंगे। इतना ही नहीं, हम आपको 65 साल की उम्र तक आपकी सैलरी का 75% हिस्सा देते रहेंगे। बिना किसी काम के। बिना ऑफिस आए। बिना किसी जिम्मेदारी के। basically, “बैठे रहो और पैसा लेते रहो।”
अब ज़रा ठहरकर सोचिए। 65 साल तक assured income। दुनिया के ज्यादातर लोगों के लिए ये retirement से भी बेहतर डील है। और ये कोई सरकारी नौकरी नहीं, एक private multinational company है। उस वक्त Ian Clifford इस समझौते से खुश थे। उन्हें हर साल एक तय रकम मिलनी शुरू हो गई। वो इसे अपनी जीत मान रहे थे।
समय बीतता गया। साल दर साल IBM इयान को सैलरी देता रहा। उधर कंपनी के अंदर लोग बदलते रहे, CEOs बदले, policies बदलीं, लेकिन एक चीज़ constant रही—Ian Clifford का monthly payment। बिना काम। बिना contribution। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली twist आता है साल 2022 में। यानी समझौते के करीब 9 साल बाद।
2022 में Ian Clifford को अचानक एहसास हुआ कि उनके साथ “नाइंसाफी” हो रही है। वजह? उनकी सैलरी पिछले 9 सालों से एक जैसी थी। कोई increment नहीं। कोई inflation adjustment नहीं। महंगाई बढ़ती रही, लेकिन उनकी income same रही। इयान को लगा कि IBM उन्हें financially पीछे धकेल रही है। अब ज़रा इस स्थिति को समझिए। एक तरफ IBM, जो एक ऐसे employee को दशकों तक पैसा दे रही है, जो काम ही नहीं कर रहा। दूसरी तरफ employee, जो कह रहा है—“पैसे बढ़ाओ, वरना कोर्ट में मिलो।”
Ian Clifford ने एक बार फिर IBM को legal notice भेजा। इस बार मामला और गंभीर था। उन्होंने आरोप लगाया कि IBM उनके साथ disability discrimination कर रही है। उनका कहना था कि अगर वो disabled नहीं होते, तो उन्हें regular increments मिलते। लेकिन क्योंकि वो disabled हैं और sick leave पर हैं, इसलिए उनकी income को freeze कर दिया गया है।
इयान का तर्क था कि inflation के साथ उनकी income की real value घटती जा रही है। यानी कागज़ पर रकम वही है, लेकिन उसकी purchasing power कम हो चुकी है। उन्होंने कहा कि ये unfair treatment है और Equality Act के खिलाफ है। मामला Employment Tribunal तक पहुंचा। कोर्ट में सवाल बहुत सीधा था—क्या कोई कंपनी, जो किसी employee को बिना काम के दशकों तक सैलरी दे रही है, उसे हर साल increment देने के लिए भी बाध्य है?
IBM का पक्ष भी कम दिलचस्प नहीं था। कंपनी ने कहा—हमने Ian Clifford के साथ extraordinary generosity दिखाई है। हम उन्हें कोई काम करने के लिए मजबूर नहीं कर रहे। हम उन्हें नौकरी से नहीं निकाल रहे। हम उन्हें उनकी उम्र के 65 साल तक guaranteed payment दे रहे हैं। ये सुविधा किसी और employee को नहीं मिलती।
IBM ने साफ कहा कि increments performance से जुड़े होते हैं। जब कोई काम ही नहीं कर रहा, तो performance-based increment का सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा, IBM ने कहा कि ये payment एक तरह का negotiated settlement है, न कि normal salary structure। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुना। और फिर आया वो फैसला, जिसने इस कहानी को पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना दिया।
Employment Tribunal के जज ने Ian Clifford की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने बहुत साफ शब्दों में कहा—“बहुत हुआ, अब नहीं।” कोर्ट ने कहा कि इयान को जो benefit मिल रहा है, वो अपने आप में extraordinary है। एक ऐसा लाभ, जो किसी सामान्य कर्मचारी को कभी नहीं मिलता। कोर्ट ने माना कि इयान disabled हैं, और इसी वजह से उन्हें ये सुविधा दी गई। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कंपनी को बिना काम के automatic increments भी देने होंगे।
जज ने कहा कि IBM ने कोई भेदभाव नहीं किया है। बल्कि उल्टा, IBM ने इयान के साथ exceptional व्यवहार किया है। अगर इयान disabled नहीं होते, तो उन्हें शायद नौकरी से निकाल दिया जाता। लेकिन यहां उन्हें lifelong financial security दी जा रही है। कोर्ट ने ये भी कहा कि Equality का मतलब ये नहीं होता कि हर स्थिति में हर किसी को same benefit मिले। Equality का मतलब ये होता है कि unfair disadvantage न हो। और इस केस में, इयान को कोई disadvantage नहीं, बल्कि disproportionate advantage मिल रहा है। इस फैसले के बाद Ian Clifford की याचिका पूरी तरह खारिज कर दी गई।
अब इस कहानी को सिर्फ एक legal case की तरह मत देखिए। ये एक mirror है। हमारी सोच का। हमारी expectations का। और उस fine line का, जहां rights खत्म होते हैं और entitlement शुरू हो जाती है। अब इस कहानी को सिर्फ एक legal case की तरह मत देखिए। ये एक mirror है। हमारी सोच का। हमारी expectations का। और उस fine line का, जहां rights खत्म होते हैं और entitlement शुरू हो जाती है।
आज के दौर में, जब लाखों लोग job insecurity से जूझ रहे हैं, layoffs आम हो गए हैं, और लोग mental health के बावजूद काम करने को मजबूर हैं, वहां एक employee का 15 साल तक sick leave पर रहना, और फिर भी guaranteed income पाना अपने आप में चौंकाने वाला है। लेकिन उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि इंसान उस स्थिति में भी संतुष्ट नहीं हुआ। शायद क्योंकि expectations धीरे-धीरे बढ़ती जाती हैं। पहले नौकरी बची—खुशी। फिर सैलरी मिली—खुशी। फिर lifetime security मिली—खुशी। और फिर increment न मिलने का दुख।
इस केस ने corporate दुनिया को भी सोचने पर मजबूर किया। क्या employee welfare की कोई सीमा होनी चाहिए? क्या generosity future में legal liability बन सकती है? और क्या कंपनियों को extra humane होने से डरना चाहिए? वहीं दूसरी तरफ, ये केस employees के लिए भी एक सबक है। अधिकार मांगना गलत नहीं है।
लेकिन अधिकार और लालच के बीच फर्क समझना ज़रूरी है। हर benefit entitlement नहीं बन जाता। IBM बनाम Ian Clifford की ये कहानी किताबों में शायद “HR case study” के तौर पर पढ़ाई जाएगी। लेकिन आम इंसान के लिए ये जिंदगी का एक गहरा सवाल छोड़ जाती है—क्या हम कभी enough कहना सीख पाएंगे? क्योंकि अगर 15 साल की छुट्टी, बिना काम की सैलरी, और lifetime security भी किसी को संतुष्ट नहीं कर पाती… तो फिर असली समस्या शायद सिस्टम में नहीं, हमारी सोच में है।
Conclusion
अगर कोई कंपनी आपसे कहे—काम मत करो, घर बैठो और 65 साल तक सैलरी लेते रहो। सुनने में सपना लगता है, लेकिन डर तब पैदा होता है जब वही शख्स कह दे—पैसे क्यों नहीं बढ़ाए? कोर्ट में मिलते हैं। आखिर ऐसा कौन करता है? यह कहानी है IBM के कर्मचारी Ian Clifford की। साल 2008 में गंभीर बीमारी के बाद वे सिक लीव पर चले गए। नौकरी नहीं गई, बल्कि 2013 में IBM ने समझौता किया—65 साल की उम्र तक 75% सैलरी, बिना काम।
सालों तक सब ठीक चला, लेकिन 2022 में इयान को लगा कि महंगाई बढ़ रही है, सैलरी नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह डिसेबिलिटी डिस्क्रिमिनेशन है और फिर कोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने साफ कहा—कंपनी आपको जिंदगी भर बिना काम सैलरी दे रही है, यह अपने आप में असाधारण फायदा है। बढ़ोतरी की मांग जायज़ नहीं। याचिका खारिज हुई। यह कहानी सिर्फ नौकरी की नहीं, हक, उम्मीद और हद की भी है।
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