Trump H1B visa policy: Visa fee बढ़ी, लेकिन भारत की टैलेंट पावर बनी ट्रंप की मजबूरी – H1B वीजा में अब भी हैं मौके!

कल्पना कीजिए, आपने सालों तक मेहनत की… जी-तोड़ पढ़ाई, नौकरी के लिए इंटरव्यू, अमेरिका जाने का सपना—और जब आखिरकार वह मौका आया, तो किसी एक फैसले ने सब कुछ मुश्किल बना दिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं उस फैसले की, जिसने लाखों भारतीयों की उम्मीदों को झटका दे दिया है। एक ऐसा झटका जो सिर्फ पैसों से नहीं, एक सपने की उड़ान से जुड़ा है। अमेरिका जाना अब पहले जैसा नहीं रहेगा—क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक नए फैसले से Visa fee इतनी बढ़ गई है कि आम भारतीय परिवार को दो बार सोचना पड़ेगा—क्या अब भी यह सपना पूरा हो पाएगा? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

4 जुलाई 2025 को, जब पूरा अमेरिका स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, उसी दिन ट्रंप ने “One Big Beautiful Bill” नाम के एक कानून पर दस्तखत कर दिए। इस कानून में एक बेहद अहम प्रावधान था—वीज़ा इंटीग्रिटी फी। सुनने में भले यह शब्द जटिल लगे, लेकिन इसका सीधा मतलब है: अब अमेरिका का वीजा पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो जाएगा। खासकर भारत जैसे देशों से आने वालों के लिए, जो पहले से ही डॉलर की तुलना में कमजोर Currency के साथ जूझते हैं।

इस नई फीस का सीधा असर उन सभी लोगों पर पड़ेगा जो अमेरिका में घूमने, पढ़ने, काम करने या बिजनेस के सिलसिले में जाना चाहते हैं। बी1/बी2 वीजा, यानी टूरिस्ट और बिजनेस वीजा… एफ या एम वीजा, यानी स्टूडेंट्स के लिए… एच1बी वर्क वीजा और जे-1 एक्सचेंज वीजा—ये सभी श्रेणियां अब इस वीजा इंटीग्रिटी फी के दायरे में आएंगी। सिर्फ डिप्लोमैटिक वीजा होल्डर्स को ही इस नई नीति से छूट मिलेगी।

अब तक बी1/बी2 वीजा के लिए भारतीयों को लगभग 185 डॉलर यानी करीब 16,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे। लेकिन नई इंटीग्रिटी फीस लागू होने के बाद ये खर्च बढ़कर 472 डॉलर यानी 40,000 रुपये से भी अधिक हो जाएगा। इस आंकड़े में 250 डॉलर की इंटीग्रिटी फीस, 24 डॉलर की I-94 फीस, और 13 डॉलर की ESTA फीस शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नई वीजा लागत एक औसत भारतीय परिवार के लिए बड़ा आर्थिक झटका है।

हैदराबाद ओवरसीज कंसल्टेंट्स के संजीव राय कहते हैं कि भारतीयों को अब बी1/बी2 वीजा के लिए, औसतन 37,500 से 40,000 रुपए खर्च करने होंगे। और ये आंकड़ा यहां नहीं रुकता—क्योंकि यह वीजा इंटीग्रिटी फीस हर साल महंगाई यानी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के अनुसार बढ़ेगी। यानी हर साल यह और भारी होती जाएगी।

अब आप सोचिए… एक स्टूडेंट जो पहले ही लाखों की ट्यूशन फीस और रहने-खाने का खर्च उठा रहा है, उसके लिए ये अतिरिक्त बोझ क्या मायने रखता है? यह सिर्फ फीस नहीं है, यह उसकी पहुंच को सीमित करने का तरीका बनता जा रहा है। खासकर उन छात्रों के लिए जो स्कॉलरशिप पर निर्भर होते हैं या जिनके परिवार सीमित संसाधनों के साथ उन्हें अमेरिका भेजते हैं।

और यही नहीं—इस फीस को रिफंड भी सिर्फ कुछ सख्त शर्तों पर मिलेगा। अगर कोई व्यक्ति अपने वीजा की अवधि समाप्त होने के 5 दिन के अंदर अमेरिका छोड़ देता है, और उसने न तो वीजा एक्सटेंशन मांगा हो, और न ही स्टेटस बदला हो—तो ही यह राशि रिफंड के लिए क्लेम की जा सकती है। अब सोचिए, क्या कोई छात्र या टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल इतनी जल्दी, इतने सटीक तरीके से अपनी वापसी प्लान कर सकता है? ये शर्तें सुनने में जितनी साधारण लगती हैं, असल में उतनी ही जटिल हैं।

अमेरिकी सरकार इस फीस को “सिक्योरिटी डिपॉजिट” कह रही है—जो नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए लगाया गया है। लेकिन असल में यह ऐसा बोझ है जिसे उठाना विकासशील देशों के नागरिकों के लिए दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि इससे Illegal immigration में कमी आएगी, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह वैध यात्रा को भी मुश्किल बना देगा।

2026 से लागू होने वाली यह नई नीति अब वीजा प्रक्रिया को न केवल महंगा, बल्कि जटिल भी बना रही है। इसके चलते बहुत से भारतीय अब यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर रुख करने पर विचार कर रहे हैं—जहां Visa fee कम है और प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल। एडमिशन काउंसलर मानते हैं कि इससे अमेरिका में पढ़ाई के लिए अप्लिकेशन की संख्या में कमी आ सकती है, और कुछ प्रमुख यूनिवर्सिटी भी इस ट्रेंड को लेकर चिंतित हैं।

हालांकि अभी तक अमेरिका की ओर से इस फैसले की आधिकारिक पुष्टि तो नहीं हुई है, लेकिन “One Big Beautiful Bill” में इसका जिक्र होना ही इस बात का इशारा है कि नीति तैयार है—अब बस तारीख का ऐलान बाकी है। संभावना है कि यह नया शुल्क जनवरी 2026 से लागू होगा, और तब तक लाखों लोग जल्दबाज़ी में वीजा आवेदन करने की कोशिश करेंगे, जिससे अपॉइंटमेंट्स में भीड़ और वेटिंग टाइम कई गुना बढ़ सकता है।

अब सवाल उठता है—क्यों लाई गई ये फीस? क्या इसका कारण केवल नियमों का पालन करवाना है? या फिर यह अमेरिका की आर्थिक चुनौतियों का नया समाधान है? क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज लगातार बढ़ा है, और सरकार नए राजस्व स्रोतों की तलाश में है। ऐसे में विदेशी यात्रियों को टारगेट करना आसान भी है और राजनीतिक रूप से सुरक्षित भी—खासकर उस ट्रंप प्रशासन के लिए जो हमेशा “America First” की नीति को प्राथमिकता देता आया है।

लेकिन इस America First के नारे की कीमत जब एक भारतीय छात्र चुकाता है, एक टूरिस्ट चुकाता है, या कोई टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल अपने करियर के शुरुआती दिनों में भारी शुल्क चुकाकर अमेरिका पहुंचता है—तो यह नारा थोपा हुआ सा लगने लगता है। यह नीति उस वैश्विक स्वतंत्रता और अवसर की भावना के विपरीत जाती है, जिसके लिए अमेरिका को जाना जाता था।

आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत से हर साल लाखों लोग अमेरिका में पढ़ने, घूमने, काम करने या Investment के लिए जाते हैं। ऐसे में अगर वीजा की राह मुश्किल की जाती है, तो अमेरिका अपनी ही छवि को नुकसान पहुंचा रहा है—एक ऐसी छवि जिसे सालों में बनाया गया था कि “अमेरिका है सभी के लिए, जो मेहनत से कुछ करना चाहते हैं।”

और यही वजह है कि आज का यह फैसला सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि एक वैचारिक परिवर्तन का संकेत है। अमेरिका अब पहले जैसा welcoming देश नहीं रहा। और यह बदलाव धीरे-धीरे उन लोगों तक पहुंच रहा है जिनका सपना एक बेहतर कल था—अमेरिका के जरिए।

अगर आप अमेरिका जाने का प्लान कर रहे हैं, तो अब आपको न सिर्फ डॉक्युमेंट्स की तैयारी करनी होगी, बल्कि अपने बजट को भी दोबारा देखना होगा। आप किसी भी एजुकेशन कंसल्टेंट या वीजा एक्सपर्ट से पूछिए, वे आपको यही सलाह देंगे कि 2025 के अंत तक ही आवेदन कर लें, नहीं तो बाद में आपकी जेब पर दोहरी मार पड़ सकती है।

इस बदलाव का सबसे दुखद पहलू यही है कि यह उन लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा, जो नियमों का पालन करते हैं, जो वैध तरीके से अमेरिका जाना चाहते हैं। लेकिन सिस्टम उन्हें भी संदेह की नजर से देख रहा है—और इसी मानसिकता से जन्म लेती है ऐसी कठोर नीतियां।

आज यह कहानी केवल एक फीस की नहीं है। यह एक ऐसे सपने की है, जिसे दुनिया के कोने-कोने से लोग देखते हैं—अमेरिका जाकर कुछ बड़ा करने का। लेकिन जब उस सपने तक पहुंचने का रास्ता हर साल और महंगा, और मुश्किल होता जाए, तो यह सोचना लाज़मी है—क्या वो सपना अब भी वैसा ही है? या बस एक सुनहरी याद भर बनकर रह जाएगा?

Conclusion

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