GPS Spoofing की छुपी सच्चाई — “इसे हल्के में मत लो!” आसमान में छिपा वो ख़तरा जिसकी आहट अब सबको सुनाई दे रही है I 2025

सोचिए आप एक फ्लाइट में बैठे हैं। खिड़की के बाहर बादल हैं, अंदर सब कुछ सामान्य लगता है। पायलट के सामने स्क्रीन पर रास्ता साफ दिख रहा है। लेकिन उसी पल, किसी अनजान जगह से कोई आपके विमान को झूठा रास्ता दिखा रहा है। विमान कहीं और है, लेकिन सिस्टम बता रहा है कि वह बिल्कुल सही दिशा में है। यही GPS Spoofing है। और यही वो डर है जिसने हाल के दिनों में भारत की हवाई सुरक्षा को लेकर सबको बेचैन कर दिया है।

पिछले कुछ समय से दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े हवाई अड्डों के आसपास उड़ानों के साथ कुछ अजीब होने लगा। पायलट्स को अचानक नेविगेशन सिस्टम में गड़बड़ी दिखने लगी। स्क्रीन पर लोकेशन बदल जाती थी, ऊंचाई और दिशा को लेकर confusion पैदा होता था। शुरुआत में यह सब technical glitch जैसा लगा, लेकिन जब पैटर्न सामने आया, तब समझ में आया कि मामला कहीं ज्यादा गंभीर है।

फिर सरकार ने भी संसद में माना कि करीब 800 उड़ानें GPS Spoofing से प्रभावित हुई हैं। 800 उड़ानें। यह सिर्फ़ एक नंबर नहीं है। इसके पीछे हज़ारों यात्री, सैकड़ों पायलट्स और एक पूरा एविएशन सिस्टम जुड़ा हुआ है। लेकिन इस पूरे शोर के बीच एक आवाज़ लगातार चेतावनी देती रही—“इसे हल्के में मत लो।” यह आवाज़ थी साइबर सिक्योरिटी फॉरेंसिक एक्सपर्ट अंकुर चंद्रकांत की।

अंकुर चंद्रकांत कोई फिल्मी किरदार नहीं हैं, न ही सोशल मीडिया पर सनसनी फैलाने वाले इन्फ्लुएंसर। वह एक ऐसे एक्सपर्ट हैं, जिन्होंने साइबर हमलों, डिजिटल फॉरेंसिक और नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े खतरों को सालों तक करीब से देखा है। जब उन्होंने GPS Spoofing को लेकर अलर्ट किया, तो उनका मकसद डर फैलाना नहीं था, बल्कि खतरे को समय रहते पहचानना था।

उनका साफ कहना है—“इसे लाइटली नहीं लेना चाहिए। यह कोई मामूली टेक्निकल प्रॉब्लम नहीं है।” और जब अब सरकार खुद मान रही है कि सैकड़ों फ्लाइट्स प्रभावित हुई हैं, तो उनकी चेतावनी और भी ज्यादा वजनदार हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर GPS Spoofing इतना खतरनाक क्यों है?

GPS Spoofing का मतलब होता है किसी सिस्टम को नकली GPS सिग्नल भेजना, ताकि उसे लगे कि वह किसी और जगह है। GPS सिस्टम सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल पर काम करता है। अगर कोई attacker ज्यादा ताकतवर नकली सिग्नल भेज दे, तो रिसीवर असली और नकली में फर्क नहीं कर पाता। ज़मीन पर यह किसी कार या ड्रोन को भटका सकता है, लेकिन आसमान में यह सीधे जानलेवा बन सकता है।

कल्पना कीजिए, एक पायलट लैंडिंग की तैयारी कर रहा है। रनवे सामने होना चाहिए, लेकिन GPS उसे कुछ मीटर इधर-उधर दिखा रहा है। इंस्ट्रूमेंट्स पर भरोसा करना पायलट की ट्रेनिंग का हिस्सा होता है। अगर वही इंस्ट्रूमेंट्स झूठ बोलने लगें, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि GPS Spoofing को सिर्फ साइबर अटैक नहीं, बल्कि एविएशन सेफ्टी का सीधा दुश्मन माना जाता है।

अंकुर चंद्रकांत की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ accidental हादसों को लेकर नहीं है। उनकी चिंता कहीं ज्यादा गहरी है। उनका कहना है कि इस तकनीक को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। और निशाने पर हो सकते हैं देश के सबसे महत्वपूर्ण लोग। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि बड़े बिज़नेसमैन, पॉलिटिशियन, साइंटिस्ट और तमाम नामचीन हस्तियां एयर ट्रैवल करती हैं। अगर कोई हमलावर किसी खास फ्लाइट को टारगेट करना चाहे, तो GPS Spoofing उसके लिए एक बेहद खतरनाक टूल बन सकता है। यह सिर्फ़ फ्लाइट को भटकाने का मामला नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन जाता है।

सोचिए, अगर किसी हाई-प्रोफाइल व्यक्ति को ले जा रही फ्लाइट को जानबूझकर भ्रमित किया जाए। भले ही अंतिम क्षणों में बैकअप सिस्टम काम कर जाए, लेकिन सिर्फ इतना ही काफी है कि पायलट और सिस्टम पर दबाव बनाया जा सके। इसी वजह से इस खतरे को “इनविज़िबल अटैक” कहा जाता है। यह दिखता नहीं है, आवाज़ नहीं करता, लेकिन असर गहरा छोड़ सकता है।

राहत की बात यह रही कि भारत के हवाई अड्डों और विमानों में अभी भी पुराने और भरोसेमंद नेविगेशन सिस्टम मौजूद हैं। VOR, DME जैसे सिस्टम दशकों पुराने हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे GPS पर पूरी तरह निर्भर नहीं हैं। जब GPS में गड़बड़ी आई, तब यही बैकअप सिस्टम वह दीवार बने जिसने किसी बड़े हादसे को रोक लिया।

यह एक तरह से चेतावनी भी थी और राहत भी। चेतावनी इसलिए कि खतरा असली है, और राहत इसलिए कि अभी हमारे पास सुरक्षा की परतें मौजूद हैं। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। क्या हम हमेशा पुराने सिस्टम के भरोसे रह सकते हैं? आज का एविएशन सिस्टम तेजी से डिजिटल हो रहा है। ऑटोमेशन बढ़ रहा है। सैटेलाइट नेविगेशन पर निर्भरता बढ़ रही है। यही वजह है कि GPS Spoofing जैसे हमले भविष्य में और ज्यादा असरदार हो सकते हैं। साइबर एक्सपर्ट्स लगातार कह रहे हैं कि अब एंटी-स्पूफिंग और एंटी-जैमर तकनीकों पर तेजी से काम करने की जरूरत है।

यह सिर्फ़ तकनीक का सवाल नहीं है, यह mindset का सवाल है। जब तक हम किसी खतरे को “छोटा” समझते रहेंगे, तब तक उसका समाधान भी अधूरा रहेगा। अंकुर चंद्रकांत की चेतावनी इसी mindset को झकझोरती है। वह कहते हैं कि जब तक कुछ बड़ा नहीं होता, तब तक हम जागते नहीं। लेकिन एविएशन जैसे सेक्टर में “कुछ बड़ा” होने का मतलब बहुत भारी कीमत चुकाना हो सकता है।

यह भी समझना जरूरी है कि GPS Spoofing कोई साइंस फिक्शन नहीं है। दुनिया के कई हिस्सों में इसके उदाहरण सामने आ चुके हैं। समुद्री जहाजों को गलत लोकेशन दिखाना, ड्रोन को भटकाना, यहां तक कि मिलिट्री सिस्टम्स को confuse करना—यह सब हो चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह खतरा सिविल एविएशन तक पहुंच चुका है।

भारत जैसे देश में, जहां हर दिन हजारों फ्लाइट्स उड़ान भरती हैं, यह खतरा और भी बड़ा हो जाता है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे एयरस्पेस पहले से ही दुनिया के सबसे व्यस्त इलाकों में गिने जाते हैं। यहां slightest confusion भी chain reaction पैदा कर सकता है। इस पूरे मामले में सोशल मीडिया की भूमिका भी दिलचस्प है। अंकुर चंद्रकांत का अलर्ट एक समय पर वायरल हो गया। कुछ लोगों ने इसे overreaction कहा, कुछ ने डर फैलाने का आरोप लगाया। लेकिन अब जब आधिकारिक तौर पर प्रभावित उड़ानों की संख्या सामने आई है, तो वही अलर्ट एक तरह से भविष्यवाणी जैसा लगने लगा है।

यही डिजिटल दौर की विडंबना है। एक्सपर्ट जब बोलते हैं, तो उनकी बात को “वायरल रील” समझ लिया जाता है। लेकिन खतरा जब सच साबित होता है, तब समझ आता है कि चेतावनी कितनी जरूरी थी। GPS Spoofing के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अब सवाल यह है कि आगे क्या? क्या हम सिर्फ इस बात से संतुष्ट हो जाएंगे कि अभी कोई हादसा नहीं हुआ? या फिर इसे एक wake-up call की तरह लेंगे? साइबर एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब सरकार, एविएशन अथॉरिटीज और टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स को मिलकर काम करना होगा।

एंटी-स्पूफिंग सिस्टम, मल्टी-सोर्स नेविगेशन, बेहतर मॉनिटरिंग और रियल-टाइम अलर्ट—ये सब अब luxury नहीं, जरूरत बन चुके हैं। पायलट्स की ट्रेनिंग में भी ऐसे scenarios को और गहराई से शामिल करना होगा, ताकि वे सिर्फ इंस्ट्रूमेंट्स पर नहीं, बल्कि पूरे situational awareness पर भरोसा कर सकें। यह भी समझना जरूरी है कि GPS Spoofing सिर्फ एविएशन का मुद्दा नहीं है। यह स्मार्ट सिटीज़, सेल्फ-ड्राइविंग व्हीकल्स, ड्रोन डिलीवरी और भविष्य की पूरी टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम से जुड़ा खतरा है। आज विमान प्रभावित हो रहे हैं, कल शायद सड़क पर चलती गाड़ियां हों।

आज आसमान में उड़ती फ्लाइट्स सिर्फ मशीन नहीं हैं, वे भरोसे पर उड़ती हैं। यात्रियों का भरोसा, पायलट का भरोसा और सिस्टम का भरोसा। GPS Spoofing इसी भरोसे को तोड़ने की कोशिश करता है—चुपचाप, बिना शोर के। शायद यही वजह है कि यह खतरा सबसे ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि जो दिखता नहीं, वही सबसे ज्यादा डराता है। और जो समय रहते समझ लिया जाए, वही सबसे बड़ी तबाही को रोक सकता है।

Conclusion

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