कल्पना कीजिए… आपके फोन की स्क्रीन पर अचानक एक नोटिफिकेशन आता है – “सिर्फ आज! 80% डिस्काउंट, अपना मनपसंद स्मार्टफोन आधे दाम में पाएं”। दिल तेजी से धड़कने लगता है। उंगलियां खुद-ब-खुद उस ऑफर पर क्लिक कर देती हैं। दिमाग कहता है – “ये मौका हाथ से निकल गया तो शायद जिंदगी भर पछताना पड़ेगा।” लेकिन क्या वाकई यह सब उतना सस्ता है जितना हमें दिखाया जाता है? या फिर यह कंपनियों की एक बारीक मनोवैज्ञानिक चाल है, जो हमें एक ऐसे जाल में फंसा देती है जहाँ से निकलना मुश्किल होता है? आज हम इसी रहस्यमयी और रोमांचक कहानी की परतें खोलेंगे।
देश में जब त्योहार आते हैं तो सिर्फ मंदिरों और बाजारों में भीड़ नहीं बढ़ती, बल्कि ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी धूम मच जाती है। Flipkart अपने Big Billion Days का ऐलान करता है, Amazon Great Indian Festival लेकर आता है, और इनके साथ Meesho, Myntra, Ajio, Tata Cliq जैसी कंपनियां भी करोड़ों रुपये के विज्ञापन और ऑफर लेकर मैदान में कूद पड़ती हैं। टीवी, सोशल मीडिया और अखबार हर तरफ एक ही संदेश – “खरीद लो, वरना पछताओगे।” यही वह समय होता है जब ग्राहक और कंपनियों के बीच एक अनदेखा खेल शुरू होता है।
ग्राहकों को लगता है कि उन्हें जीवन की सबसे बड़ी डील मिल रही है। 50% छूट, 70% ऑफ, 80% तक का डिस्काउंट – सुनने में तो जादू जैसा लगता है। लेकिन सच्चाई कहीं ज्यादा दिलचस्प और खतरनाक है। ई-कॉमर्स कंपनियां अक्सर किसी प्रोडक्ट का MRP (Maximum Retail Price) बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती हैं।
फिर उसी पर 50% का डिस्काउंट दिखाकर यह भ्रम पैदा करती हैं कि ग्राहक को भारी मुनाफा हो रहा है। उदाहरण के लिए, अगर एक स्मार्टफोन की असली कीमत 30,000 है, तो उसे 50,000 का MRP दिखाकर 50% ऑफ में 25,000 में बेच दिया जाता है। ग्राहक खुश कि उसने 25,000 बचा लिए, लेकिन असल में उसने सिर्फ 5,000 की बचत की। इस ट्रिक को ही कहते हैं – Fake Discount।
त्योहारों के मौसम में खरीदारी की Psychology भी कंपनियों के पक्ष में काम करती है। दीपावली हो या दशहरा, ईद हो या होली – हर परिवार में यह परंपरा है कि इन दिनों कुछ नया खरीदा ही जाए। यही वजह है कि कंपनियां “Limited Time Offer”, “Flash Sale”, “Only Today” जैसे नारे देकर हमारे दिमाग पर दबाव डालती हैं। ग्राहक डर जाता है कि कहीं यह ऑफर निकल न जाए और वह मौका हमेशा के लिए खो दे। इसे कहते हैं – Fear of Missing Out (FOMO)।
इतिहास गवाह है कि भारत में त्योहारी खरीदारी हमेशा से बड़े पैमाने पर होती रही है। पहले लोग बाजारों में जाते थे, मिठाइयाँ और कपड़े खरीदते थे। लेकिन अब यह परंपरा स्मार्टफोन और लैपटॉप की स्क्रीन पर शिफ्ट हो गई है। आज शॉपिंग का असली मेला मॉल्स में नहीं बल्कि ऑनलाइन ऐप्स पर लगता है। और यही बदलाव ई-कॉमर्स कंपनियों ने बखूबी समझ लिया है।
कंपनियों की एक और बड़ी रणनीति होती है – स्टॉक क्लियरेंस। जब किसी प्रोडक्ट का नया वर्जन आने वाला होता है तो पुराने मॉडल्स का स्टॉक सस्ते दामों में बेच दिया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर सैमसंग का नया गैलेक्सी फोन लॉन्च होने वाला है, तो पुराने मॉडल्स पर 40 से 50% डिस्काउंट दिखाया जाता है। ग्राहक को लगता है कि यह बंपर ऑफर है, लेकिन कंपनी के लिए यह पुराने माल से छुटकारा पाने का तरीका है।
और सिर्फ प्रोडक्ट बेचने के लिए ही यह खेल नहीं खेला जाता। असली सोना तो डेटा है। जब आप डिस्काउंट के लालच में अकाउंट बनाते हैं, ईमेल और फोन नंबर डालते हैं, तब कंपनियों को आपका Shopping Pattern, Spending Habits, Location जैसी जानकारी मिल जाती है। आगे चलकर यही डेटा विज्ञापन बेचने और टारगेट मार्केटिंग में करोड़ों का मुनाफा दिलाता है। यानी आपके फोन पर जो अगले दिन नई-नई ऑफर्स की नोटिफिकेशन आती है, वह आपके पिछले क्लिक का ही नतीजा होती है।
यहाँ तक कि कई बार कंपनियों को असली मुनाफा डिस्काउंटेड प्रोडक्ट से नहीं बल्कि उन अतिरिक्त खरीदारी से होता है, जो ग्राहक अनजाने में कर लेता है। सोचिए, आप सिर्फ एक हेडफोन खरीदने गए थे, लेकिन सेल में देखकर आपने पावर बैंक, मोबाइल कवर और एक टी-शर्ट भी खरीद ली। आपको लगा आपने सस्ते में सौदा किया, लेकिन कंपनी की रणनीति पूरी तरह सफल रही।
ऑफलाइन दुकानों और ऑनलाइन कंपनियों के खर्च में भी बड़ा फर्क है। एक रिटेल दुकान को किराया, बिजली, स्टाफ का वेतन और कई तरह के टैक्स भरने पड़ते हैं। जबकि ई-कॉमर्स कंपनियां सिर्फ वेयरहाउस और डिलीवरी नेटवर्क पर खर्च करती हैं। यानी उनका Operational Cost बहुत कम होता है। यही कारण है कि वे कभी-कभी वाकई ऑफलाइन दुकानों से सस्ता सामान बेच पाती हैं।
इसके अलावा, ई-कॉमर्स कंपनियां सीधे मैन्युफैक्चरर्स से थोक में सामान खरीदती हैं। Bulk Orders की वजह से उन्हें भारी डिस्काउंट मिलता है। बीच के डीलर और रिटेलर का रोल खत्म हो जाता है, जिससे लागत और घट जाती है। यही बचत कंपनियां आंशिक रूप से ग्राहकों तक डिस्काउंट के रूप में पहुँचा देती हैं।
लेकिन हर कहानी का एक अंधेरा पहलू भी होता है। ऑनलाइन फेस्टिवल सेल के नाम पर Frauds भी खूब होते हैं। नकली वेबसाइट्स असली जैसी दिखती हैं और ग्राहकों को लुभाती हैं। हजारों लोग फेक लिंक पर क्लिक करके पैसे गंवा देते हैं। कई बार यह भी होता है कि जो सामान ऑनलाइन 50% छूट पर 40,000 का दिखाया जा रहा है, वही ऑफलाइन दुकान पर असल में 30,000 का मिल रहा होता है।
तो सवाल यह है कि आखिर ग्राहक क्या करें? समझदारी यही है कि डिस्काउंट देखकर तुरंत खरीदारी में कूद न पड़ें। किसी भी प्रोडक्ट को खरीदने से पहले कम से कम तीन-चार अलग-अलग वेबसाइट्स पर उसकी कीमत चेक करें। और फिर उसी प्रोडक्ट को नजदीकी दुकानों पर जाकर भी देख लें। कई बार ऑफलाइन दुकानदार भी सेल के दौरान शानदार ऑफर देते हैं। असली समझदारी यही है – “जहाँ सस्ता, वहीं से खरीदो।”
अब अगर बात करें मौजूदा सीजन की, तो अभी Flipkart Big Billion Days 2025 और Amazon Great Indian Festival दोनों चल रहे हैं। फ्लिपकार्ट पर 23 सितंबर से लेकर 20 अक्टूबर तक स्मार्टफोन, टीवी, लैपटॉप, फ्रिज और वॉशिंग मशीन पर 50 से 70% छूट बताई जा रही है। Axis और ICICI बैंक कार्ड पर अतिरिक्त 10% डिस्काउंट मिल रहा है। Amazon भी इसी तरह की बैंक ऑफर्स, नो-कॉस्ट EMI और कैशबैक देकर ग्राहकों को आकर्षित कर रहा है। Meesho, Myntra और Ajio फैशन और होम डेकोर पर भारी छूट का दावा कर रहे हैं।
कंपनियों का असली मकसद सिर्फ उत्पाद बेचना नहीं है, बल्कि ग्राहकों की लाइफस्टाइल और आदतों को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़ना है। हर खरीदारी के साथ आपका भरोसा इन ऐप्स पर बढ़ता जाता है और आप धीरे-धीरे इनके स्थायी ग्राहक बन जाते हैं।
त्योहारों की रौनक, रंग-बिरंगी लाइट्स और नए सामान की चाह – यह सब हमारी भावनाओं को छूता है। कंपनियां इन्हीं भावनाओं को समझती हैं और हमें वह दिखाती हैं जो हम देखना चाहते हैं। लेकिन सच यही है – हर डिस्काउंट सौदा फायदे का नहीं होता। कभी-कभी सबसे बड़ा फायदा कंपनियों को ही होता है, ग्राहक को नहीं।
Conclusion
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