EMI पर नहीं टूटेगा रिश्ता! तलाक के बाद घर और ज़िम्मेदारी को समझिए सही तरीके से I 2025

ज़रा सोचिए… आपने अपने जीवनसाथी के साथ मिलकर अपने सपनों का घर खरीदा। एक ऐसा घर जो आपकी मोहब्बत, आपकी मेहनत और आपके आने वाले कल की नींव था। हर ईंट में दोनों की उम्मीदें जुड़ी थीं, हर दीवार पर खुशियों का रंग चढ़ा था। लेकिन अचानक एक दिन सब बिखर गया। रिश्ता टूटा, साथ छूटा, और अब सवाल उठा—उस घर का क्या होगा? और उससे भी बड़ा सवाल, उस घर की EMI कौन भरेगा?

बैंक तो भावना नहीं समझता, लेकिन ज़िंदगी का गणित बड़ा जटिल होता है। तलाक के बाद जहां दिल बंटते हैं, वहीं कागज़ों पर जिम्मेदारियाँ जस की तस रह जाती हैं। घर खरीदना किसी भी कपल के लिए एक सपना होता है।

वो दिन याद करिए जब दोनों ने मिलकर घर की तलाश शुरू की थी — रियल एस्टेट एजेंट के साथ घूमना, हर लोकेशन पर अपने सपनों का नक्शा बनाना, और आख़िरकार एक फ्लैट देखकर कहना — “यही हमारा घर होगा।” उस वक्त, किसी ने नहीं सोचा था कि एक दिन ये सवाल उठेगा कि ‘अब EMI कौन भरेगा?’ उस वक़्त तो बस इतना सोचा गया था कि दोनों मिलकर ये लोन चुकाएंगे, एक साथ रहेंगे, एक साथ कमाएंगे, और एक साथ सपनों को सजाएंगे।

लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं चलती जैसी प्लानिंग होती है। कभी-कभी रिश्तों में ऐसी दरारें आ जाती हैं जिन्हें भरना नामुमकिन होता है। जब तलाक का फैसला होता है, तो सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि उसके साथ वो हर चीज़ बिखर जाती है जो कभी साथ मिलकर बनाई गई थी। और घर — जो कभी ‘हमारा घर’ था — अब विवाद का केंद्र बन जाता है। बैंक के लिए तो मामला साफ है — आपने लोन लिया, तो दोनों को-बॉरोअर हैं। लेकिन इंसानों के लिए ये भावनाओं, यादों और हक़ की जंग बन जाती है।

बैंक की नज़र में, पति-पत्नी दोनों बराबर ज़िम्मेदार होते हैं। जब दोनों ने मिलकर जॉइंट होम लोन लिया, तो बैंक ने ये नहीं पूछा था कि कौन ज़्यादा कमाता है, कौन ज़्यादा प्यार करता है या कौन ज़्यादा समझदार है। बैंक ने सिर्फ़ ये देखा कि दो लोग मिलकर Payment करेंगे, दो लोगों के सिग्नेचर हैं, दो लोगों की आमदनी से लोन सुरक्षित है।

और इसलिए, बैंक के लिए तलाक का कोई मतलब नहीं होता। कोर्ट में चाहे रिश्ता खत्म हो जाए, लेकिन बैंक के रिकॉर्ड में आप दोनों अब भी को-बॉरोअर हैं। अगर एक व्यक्ति EMI देना बंद कर देता है, तो बैंक बाकी की रकम दूसरे से वसूल करेगा। यही वो पल होता है जब इंसानी कानून और बैंकिंग कानून के बीच का फर्क सबसे ज़्यादा महसूस होता है।

अब सोचिए — अगर पति-पत्नी में से एक कहे कि वो अब उस घर में नहीं रहना चाहता, तो क्या उसका लोन से नाता खत्म हो जाएगा? जवाब है, नहीं। बैंक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किससे अलग हो चुके हैं। बैंक का रिश्ता आपके रिश्ते से नहीं, बल्कि आपके दस्तावेज़ों और सिग्नेचर से होता है। इसलिए जब तक लोन पूरा नहीं चुकता, दोनों के ऊपर जिम्मेदारी बनी रहती है। यहां तक कि अगर एक व्यक्ति ने पूरा लोन चुका दिया, तो भी घर की मालिकी उस व्यक्ति के नाम नहीं आती जब तक कि लीगल ट्रांसफर न हो।

यही वो स्थिति है जहां कानून और इंसाफ़ की व्याख्या शुरू होती है। अगर घर दोनों के नाम पर है, तो दोनों का बराबर हक़ है — चाहे एक व्यक्ति ने सारी EMI क्यों न भरी हो। और अगर सिर्फ़ एक व्यक्ति घर में रह रहा है, तो भी दूसरा व्यक्ति कानूनी तौर पर अपने हिस्से का दावा कर सकता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कोर्ट या आपसी समझौते से तय किया जाता है कि घर किसे मिलेगा और कौन लोन चुकाएगा। लेकिन सच ये है कि ऐसा समझौता करना आसान नहीं होता। क्योंकि यहां बात सिर्फ़ पैसे की नहीं होती, बात जुड़ी होती है आत्मसम्मान, भरोसे और बीते वक्त की।

अब एक और स्थिति लीजिए — अगर घर पति के नाम पर है, लेकिन लोन दोनों ने मिलकर लिया था। ऐसे में तलाक के बाद पत्नी कहती है कि उसने भी EMI भरी है, तो उसका भी हक़ बनता है। वहीं पति कहता है कि घर मेरा है क्योंकि टाइटल मेरे नाम पर है। ऐसे मामलों में कोर्ट ये देखता है कि किसने कितना योगदान दिया। अगर पत्नी ने EMI में हिस्सा नहीं दिया, तो उसका मालिकाना हक साबित करना मुश्किल होता है। लेकिन अगर उसने Payment में योगदान किया है, तो उसे भी हिस्सेदारी का अधिकार मिल सकता है। यहां दस्तावेज़ और बैंक स्टेटमेंट्स सबसे बड़ी गवाही बनते हैं — जो बताते हैं कि असल में किसने लोन चुकाया।

अब मान लीजिए कि पति ने पूरा लोन भरा लेकिन घर पत्नी के नाम पर है। कानून साफ कहता है कि प्रॉपर्टी का मालिक वही है जिसके नाम पर टाइटल डीड रजिस्टर्ड है। यानी घर पत्नी का माना जाएगा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगर पति ये साबित कर दे कि उसने ही पैसे दिए थे, उसने ही EMI चुकाई थी, तो वह कोर्ट में अपने हिस्से का दावा कर सकता है। वहीं अगर पत्नी ने कोई आर्थिक योगदान नहीं दिया, तो कोर्ट उसे 100% मालिक नहीं मानता। हालांकि, पति को अपने दावे के समर्थन में पुख्ता सबूत देने पड़ते हैं।

इस पूरे मसले का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि घर की कीमत से ज़्यादा भावनात्मक बोझ बढ़ जाता है। तलाक के बाद जो एक साथ कमाया गया घर था, वही अब दो लोगों के बीच दीवार बन जाता है। कभी वही दीवार हँसी की गूंज से भरती थी, अब वही दीवार कोर्ट के नोटिस और वकीलों की बहस सुनती है। कई बार ये विवाद सालों तक चलता है — न बैंक को Payment मिलता है, न घर का मालिक तय होता है। और बीच में लोन का ब्याज बढ़ता रहता है, जैसे किसी टूटे हुए रिश्ते की पेनल्टी।

अगर दोनों पक्ष आपसी सहमति से फैसला करें, तो एक रास्ता होता है — लोन ट्रांसफर। यानी अगर पत्नी या पति में से कोई एक पूरा लोन अपने नाम पर लेना चाहता है, तो बैंक की अनुमति से ऐसा किया जा सकता है। लेकिन बैंक यहां भी आसानी से नहीं मानता।

वह पहले नए बॉरोअर की इनकम, क्रेडिट स्कोर और रीपेमेंट क्षमता की जांच करता है। अगर बैंक को यकीन होता है कि नया व्यक्ति अकेले EMI चुका सकता है, तब जाकर लोन ट्रांसफर की अनुमति दी जाती है। लेकिन अगर बैंक को ज़रा भी रिस्क दिखे, तो वह ऐसा करने से इनकार कर देता है। यानी आपसी सहमति होने के बावजूद बैंक का ‘हाँ’ या ‘ना’ ही असली फैसला तय करता है।

अब सोचिए — अगर तलाक के बाद दोनों में से कोई भी लोन भरने से इनकार कर दे, तो क्या होता है? बैंक ऐसे में प्रॉपर्टी को जब्त कर सकता है। यानी वह घर जो कभी सपनों का था, अब बैंक की नीलामी में बिक सकता है। यह वो स्थिति होती है जब दोनों पक्ष न सिर्फ़ घर बल्कि अपनी वित्तीय साख भी खो देते हैं। उनका CIBIL स्कोर गिर जाता है, और भविष्य में लोन लेना लगभग असंभव हो जाता है। एक रिश्ता खत्म होता है, लेकिन उसकी गूंज सालों तक आपके क्रेडिट रिपोर्ट में गूंजती रहती है।

इस पूरी कहानी में एक और संवेदनशील पहलू है — महिलाओं की सुरक्षा। कई बार महिलाएँ घर की Co-borrower होती हैं लेकिन वे घर में Investment नहीं कर पातीं। अगर तलाक हो जाता है और पति EMI भरना बंद कर देता है, तो बैंक पत्नी से भी पैसा वसूल सकता है। और अगर पत्नी नहीं चुका पाती, तो घर नीलाम हो सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि महिलाएँ ऐसे जॉइंट लोन में अपनी स्थिति और जिम्मेदारी अच्छी तरह समझकर ही कदम बढ़ाएँ। हर दस्तावेज़ पर साइन करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि आपका अधिकार कहाँ तक है और आपकी जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है।

कई कपल्स इस स्थिति से बचने के लिए प्री-मैरिटल या पोस्ट-मैरिटल फाइनेंशियल एग्रीमेंट करते हैं — जिसमें साफ लिखा होता है कि तलाक की स्थिति में घर, लोन और EMI की जिम्मेदारी कैसे बाँटी जाएगी। भारत में यह चलन अभी नया है, लेकिन धीरे-धीरे लोग इसकी अहमियत समझ रहे हैं। क्योंकि अदालतों में ऐसे मामलों का निपटारा लंबा चलता है, जबकि पहले से की गई कानूनी तैयारी बाद में बड़ी राहत देती है।

अगर पति-पत्नी दोनों में आपसी समझ बनी रहे, तो एक विकल्प ये भी होता है कि घर बेच दिया जाए और उससे मिले पैसे से लोन क्लियर कर दिया जाए। बचे हुए पैसे को दोनों के हिस्से के हिसाब से बाँटा जा सकता है। यह रास्ता सबसे प्रैक्टिकल और शांतिपूर्ण होता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि दोनों पक्ष में अब भी बातचीत की गुंजाइश बची हो।

वास्तविक जीवन में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ घर की EMI ने तलाक के बाद ज़िंदगी को और मुश्किल बना दिया। दिल्ली की सीमा और रोहित की कहानी लीजिए — दोनों ने मिलकर घर लिया, जॉइंट लोन लिया, लेकिन तीन साल बाद रिश्ता टूट गया। रोहित ने EMI देना बंद कर दिया, बैंक ने सीमा से वसूली शुरू की।

अंततः सीमा को अपना गहना बेचकर EMI चुकानी पड़ी, क्योंकि बैंक के लिए ‘को-बॉरोअर’ शब्द का मतलब था बराबर जिम्मेदारी, चाहे भावनाएँ कुछ भी कहें। वहीं मुंबई में एक और केस में पति ने पूरा लोन चुका दिया, लेकिन घर पत्नी के नाम पर था। कोर्ट ने कहा — “भले ही पत्नी ने EMI नहीं भरी, लेकिन अगर वह साबित कर दे कि घर का नाम उसके नाम पर पति की मर्ज़ी से हुआ था, तो पति पूरा हक़ नहीं मांग सकता।” इस तरह के फैसले दिखाते हैं कि हर केस का हल अलग होता है, कोई एक फॉर्मूला सब पर लागू नहीं होता।

इस कहानी का असली सबक यही है — जब भी कोई कपल घर खरीदने का फैसला करे, तो सिर्फ़ प्यार और सपनों से नहीं, बल्कि समझदारी और कानून की जानकारी से भी काम ले। जॉइंट लोन लेते वक्त हर जिम्मेदारी को लिखित में तय करें। यह तय करें कि अगर किसी कारण से रिश्ता टूटे तो EMI कौन भरेगा, घर किसके नाम रहेगा, और कौन-सी शर्तें लागू होंगी। इन बातों पर पहले बात करना मुश्किल ज़रूर है, लेकिन बाद में यह बहुत बड़ा संकट टाल सकता है।

बैंकिंग विशेषज्ञ कहते हैं — “Loan is a financial relationship, not an emotional one.” यानी बैंक को आपकी कहानी नहीं चाहिए, उसे सिर्फ़ Payment चाहिए। चाहे आप साथ हों या अलग, बैंक का कैलेंडर हर महीने EMI की तारीख़ देखता है, आपकी वैवाहिक स्थिति नहीं।

Conclusion

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