सोचिए एक पल के लिए… अंधेरी रात है, सीमा के पास एक गुप्त ऑपरेशन चल रहा है, बंद ट्रक में कुछ भारी लोहे की प्लेट्स रखी हैं, और अगला सीन बताता है कि अगर ये प्लेट्स गलत हाथों में चली गईं, तो पूरे देश की अर्थव्यवस्था हिल सकती है। हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म Dhurandhar का यही सीन लोगों के दिमाग में अटक गया है। थिएटर से बाहर निकलते ही लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या सच में भारत की करेंसी प्लेट्स चुराई जा सकती हैं? क्या असली नोट छापना वाकई फिल्म जितना आसान है? या फिर ये सिर्फ सिनेमा का रोमांच है, हकीकत नहीं?
आपको बता दें कि Dhurandhar बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त प्रदर्शन कर रही है। रणवीर सिंह, संजय दत्त और अक्षय खन्ना की दमदार एक्टिंग, तेज़ रफ्तार कहानी और देशभक्ति के तड़के ने दर्शकों को बांधकर रखा है। लेकिन फिल्म का सबसे ज़्यादा चर्चित सीन वही बन गया, जिसमें दिखाया जाता है कि पाकिस्तानी एजेंट भारत की करेंसी प्लेट्स चुरा लेते हैं। इस सीन ने फिल्म को अचानक एक अलग ही लेवल की गंभीरता दे दी। लोगों को लगा कि अगर ऐसा हो गया, तो देश का क्या होगा?
हालांकि यह याद रखना ज़रूरी है कि Dhurandhar एक फिल्म है, और फिल्में अक्सर सच्चाई को dramatize करती हैं। असल ज़िंदगी में भारत की करेंसी प्लेट्स चोरी होना लगभग असंभव है। इतना असंभव कि अगर ऐसा कभी हो जाए, तो यह सिर्फ एक क्राइम नहीं, बल्कि एक national emergency बन जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर भारत में नोट छपते कैसे हैं? कहां छपते हैं? और क्यों यह सिस्टम दुनिया के सबसे सुरक्षित सिस्टम्स में से एक माना जाता है?
भारत में करेंसी बनाना सिर्फ कागज और स्याही का खेल नहीं है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें economics, national security, technology और psychology—चारों का गहरा मेल है। हर नोट सिर्फ एक value नहीं दर्शाता, बल्कि सरकार और सिस्टम पर भरोसे का प्रतीक होता है। यही वजह है कि इसके पीछे की पूरी मशीनरी किसी किले से कम नहीं होती।
सबसे पहले बात करते हैं उस संस्था की, जो इस पूरे सिस्टम की दिमाग कहलाती है—भारतीय रिज़र्व बैंक। RBI तय करता है कि नोट कैसा दिखेगा, उसका रंग क्या होगा, साइज कितना होगा, उस पर कौन-सी तस्वीर होगी, और सबसे अहम—उसमें कौन-कौन से security features होंगे। कितने नोट छापने हैं, किस denomination में छापने हैं, और किस वक्त पुराने नोटों को circulation से बाहर करना है—यह सब फैसले RBI करता है। यानी policy और planning पूरी तरह RBI के हाथ में होती है।
लेकिन RBI खुद हर नोट नहीं छापता। यहां कहानी में आती है एक और बेहद अहम सरकारी संस्था—SPMCIL, यानी सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड। यह कंपनी भारत में सिक्के, पासपोर्ट, स्टाम्प पेपर, और कुछ नोट प्रिंटिंग प्रेस चलाती है। बाकी प्रेस सीधे RBI के नियंत्रण में होती हैं। आसान भाषा में समझें तो design और आदेश RBI देता है, और छपाई का काम high-security सरकारी प्रेसों में होता है। दोनों की साझा निगरानी रहती है, और कोई भी अकेला फैसला नहीं ले सकता।
अब सवाल आता है—भारत में नोट छपते कहां हैं? भारत में नोट छापने की चार प्रमुख जगहें हैं—देवास, नासिक, मैसूर और सालबोनी। ये चारों जगहें देश के सबसे सुरक्षित इलाकों में गिनी जाती हैं। यहां तक कि बड़े से बड़ा अधिकारी भी बिना कई लेवल की अनुमति के अंदर नहीं जा सकता। हर व्यक्ति की movement track होती है, हर entry और exit रिकॉर्ड होती है, और हर कोने पर 24×7 निगरानी रहती है।
इन जगहों की सुरक्षा ऐसी है कि फिल्मों में दिखाया गया “घुसकर प्लेट चुरा लेना” सिर्फ imagination हो सकता है। यहां multiple security layers होती हैं—armed guards, biometric access, surveillance systems, और strict protocols। कोई outsider तो दूर, अंदर काम करने वाले कर्मचारी भी सिर्फ उसी हिस्से में जा सकते हैं, जहां उनकी duty होती है। पूरे प्रेस का कोई भी कर्मचारी पूरा सिस्टम कभी नहीं देखता।
अब आते हैं उस सबसे दिलचस्प हिस्से पर—नोट असल में बनता कैसे है? फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि एक मशीन में कागज डाला और नोट बाहर आ गया। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा complex है। सबसे पहले design final होता है। इसमें रंग, patterns, महापुरुषों की तस्वीर, symbols और micro-details शामिल होती हैं। हर छोटा design element future में नकली नोट पकड़ने में मदद करता है।
इसके बाद आता है कागज। यह कोई आम कागज नहीं होता जो बाजार में मिलता है। यह खास तरह का security paper होता है, जिसमें special fibers, watermark और embedded threads होते हैं। यह कागज खुद में ही एक security feature होता है। इसे बिना सही technology के replicate करना लगभग नामुमकिन है।
फिर शुरू होती है printing की multi-stage process। सबसे पहले background printing होती है, जिसमें हल्के रंग और patterns डाले जाते हैं। इसके बाद main design print होता है, जिसमें तस्वीरें और symbols शामिल होते हैं। फिर आती है intaglio printing—यानी उभरी हुई छपाई, जिसे आप उंगलियों से महसूस कर सकते हैं। यही feature visually impaired लोगों के लिए भी मददगार होता है।
इसके बाद numbering की प्रक्रिया आती है। हर नोट का एक unique serial number होता है, जो पूरे सिस्टम में track किया जाता है। इसके बाद special inks इस्तेमाल की जाती हैं—कुछ ऐसी जो रोशनी बदलने पर रंग बदलती हैं, कुछ ऐसी जो सिर्फ UV light में दिखती हैं। हर layer के बाद quality check होता है। अगर slightest भी defect मिलता है, तो वह नोट destroy कर दिया जाता है।
जब printing पूरी हो जाती है, तो बड़े-बड़े sheets को काटकर individual notes बनाए जाते हैं। फिर counting, bundling और sealing होती है। हर bundle का record रखा जाता है। हर पैकेट का हिसाब होता है—कितने नोट, कौन-सी denomination, किस series के। इसके बाद ये नोट भारी सुरक्षा के बीच RBI के currency chests तक पहुंचाए जाते हैं।
यहां से भी कहानी खत्म नहीं होती। Currency chests से नोट धीरे-धीरे बैंकों तक पहुंचते हैं। हर movement logged होती है। कहीं भी leakage की गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती। यही वजह है कि अगर असली करेंसी प्लेट या design कभी compromise हो जाए, तो सरकार तुरंत पूरी series बदलने का फैसला ले सकती है।
अब वापस आते हैं Dhurandhar के उस सीन पर। फिल्म में जो दिखाया गया है, वह suspense और drama के लिए ज़रूरी हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में करेंसी प्लेट चोरी होना लगभग impossible है। क्योंकि plates कोई suitcase में रखी चीज़ नहीं होतीं, बल्कि tightly controlled assets होती हैं। और सबसे अहम बात—एक plate बदल जाने से भी पूरे सिस्टम पर असर नहीं पड़ता, क्योंकि security features multi-layered होते हैं।
फिल्मों में नकली नोटों का खेल अक्सर simplified दिखाया जाता है। लेकिन असल में नकली नोट बनाना और असली नोट जैसा circulate करना बेहद मुश्किल है। यही वजह है कि नकली नोटों के cases अक्सर low-quality copies तक सीमित रहते हैं, जो थोड़ी सी जांच में पकड़ में आ जाते हैं।
भारत का currency system इसलिए मजबूत है क्योंकि यह सिर्फ technology पर नहीं, बल्कि checks and balances पर टिका है। कोई एक व्यक्ति, एक संस्था या एक मशीन पूरे सिस्टम को control नहीं करती। यही decentralization इसे सुरक्षित बनाता है। Dhurandhar जैसी फिल्में हमें entertain करती हैं, लेकिन साथ ही curiosity भी जगाती हैं। और शायद यही अच्छा है। क्योंकि जब लोग सवाल पूछते हैं, तब उन्हें सिस्टम की असली ताकत का पता चलता है। भारत की करेंसी सिर्फ कागज नहीं है, यह एक भरोसा है—एक ऐसा भरोसा, जिसे तोड़ना फिल्मों में आसान लगता है, लेकिन असल जिंदगी में नामुमकिन।
अगली बार जब आप अपनी जेब से एक नोट निकालें, तो एक पल रुकिए। उस कागज को देखिए, उसकी texture को महसूस कीजिए। उसके पीछे सिर्फ एक छपाई नहीं, बल्कि देश की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, दशकों की planning और करोड़ों लोगों का भरोसा छुपा है। फिल्म खत्म हो जाती है, theater की lights जल जाती हैं, लेकिन असली कहानी वहीं शुरू होती है—जब हम समझते हैं कि fiction और reality के बीच फर्क कितना गहरा है। Dhurandhar ने नकली नोटों का खेल दिखाया, लेकिन असली नोट कैसे बनता है, यह जानना शायद उससे कहीं ज़्यादा रोमांचक है।
Conclusion
अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
GRT Business विभिन्न समाचार एजेंसियों, जनमत और सार्वजनिक स्रोतों से जानकारी लेकर आपके लिए सटीक और सत्यापित कंटेंट प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। हालांकि, किसी भी त्रुटि या विवाद के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। हमारा उद्देश्य आपके ज्ञान को बढ़ाना और आपको सही तथ्यों से अवगत कराना है।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारे GRT Business Youtube चैनल पर भी विजिट कर सकते हैं। धन्यवाद!”




