ज़रा सोचिए… सुबह के 6 बजे हैं, शहर की सड़कें अब भी आधी नींद में हैं। इंफोसिस के कैंपस में एक साधारण कपड़ों में लड़का साइकिल से आता है। हाथ में झाड़ू, आंखों में नींद, पर दिल में एक सपना — कुछ ऐसा करने का, जिससे ज़िंदगी बदल जाए। उस वक्त उसे यह नहीं पता था कि कुछ साल बाद वही लड़का अपनी कंपनी का सीईओ कहलाएगा, और दुनिया उसके नाम की तुलना कैनवा जैसे दिग्गज ब्रांड्स से करेगी। यह कहानी है Dadasaheb भगत की — एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने सफाई करने से शुरुआत की और डिज़ाइन की दुनिया में क्रांति ला दी।
महाराष्ट्र के बीड जिले का वह छोटा सा गांव, जहां Dadasaheb का बचपन बीता, सूखे और गरीबी की कहानी खुद कहता था। खेतों में पानी नहीं था, फसलें अक्सर बर्बाद हो जाती थीं। लोग दिनभर मेहनत करते, पर रात को खाली पेट सोते। यही माहौल था, जिसने एक छोटे बच्चे को यह सिखाया कि मेहनत ज़रूरी है — लेकिन समझदारी उससे भी ज़्यादा। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि दसवीं के बाद पढ़ाई रुक गई। पिता चाहते थे कि वह जल्दी नौकरी करे, ताकि घर चल सके। इसलिए उन्होंने ITI कोर्स किया, जो आम तौर पर फैक्ट्री या मशीन से जुड़ी ब्लू-कॉलर नौकरियों के लिए होता है।
ITI पूरा करने के बाद Dadasaheb पुणे पहुंचे। जेब में बस कुछ सौ रुपये और सिर पर उम्मीदों का बोझ। शुरुआत में उन्हें एक छोटी सी नौकरी मिली — महीने के चार हज़ार रुपये। लेकिन उनका सपना इतना छोटा नहीं था। एक दिन उन्हें पता चला कि इंफोसिस में एक ऑफिस बॉय की नौकरी है — 9,000 रुपये महीने। यह उनके लिए डबल सैलरी थी। बिना किसी देरी के उन्होंने वह नौकरी स्वीकार कर ली। लेकिन उन्हें क्या पता था, यही कदम उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित होगा।
इंफोसिस में उनका काम साधारण था — सफाई करना, फाइलें लाना, गेस्टहाउस में चाय देना, और कभी-कभी छोटे-मोटे ऑफिस के काम। लेकिन हर दिन जब वे उन एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठे लोगों को देखते, जो कंप्यूटर पर कुछ क्लिक करके काम पूरा कर लेते थे, तो उनके मन में सवाल उठता — “आखिर ऐसा क्या है जो मैं नहीं कर सकता?” वही सवाल उनकी ज़िंदगी का turning point बन गया।
उन्होंने धीरे-धीरे समझना शुरू किया कि असली ताकत दिमाग में होती है, हाथों में नहीं। एक दिन उन्होंने एक सीनियर से पूछा — “सर, ये लोग क्या काम करते हैं?” जवाब मिला, “ये सब ग्राफिक डिजाइन, कोडिंग और डिजिटल वर्क करते हैं।” तब किसी ने casually कहा — “अगर तुम्हें डिजाइनिंग आती, तो तुम भी कंप्यूटर पर काम कर सकते।” उस वाक्य ने Dadasaheb के भीतर कुछ जगा दिया।
उन्हें याद आया कि बचपन में वह मंदिर के पास रहने वाले एक पेंटर को देखा करते थे, जो दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें बनाता था। वे घंटों उसे रंग भरते हुए देखते रहते। वही छिपा हुआ हुनर, जो सालों से उनके भीतर सोया था, अब जाग उठा। उन्होंने तय किया कि चाहे जो हो, डिजाइन सीखनी ही है।
दिन में नौकरी और रात में पढ़ाई — यही उनकी नई दिनचर्या बन गई। वह दिनभर ऑफिस में झाड़ू लगाते और शाम को लोकल साइबर कैफे जाकर डिजाइनिंग सीखते। धीरे-धीरे उन्होंने CorelDRAW, Photoshop, Illustrator जैसे सॉफ्टवेयर में महारत हासिल की। वह हर दिन अपने पुराने दोस्तों की तरह कंप्यूटर के सामने बैठने का सपना देखते, और आखिरकार एक साल के भीतर उन्होंने वो कर दिखाया जो शायद किसी ने सोचा भी नहीं था — वह अब ऑफिस बॉय नहीं, बल्कि डिजाइनर बन चुके थे।
लेकिन यह तो बस शुरुआत थी। एक दिन उन्हें एहसास हुआ कि अगर वे किसी और के लिए काम कर सकते हैं, तो खुद के लिए क्यों नहीं? उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी और फ्रीलांसिंग शुरू की। शुरूआती दिन मुश्किल थे — क्लाइंट्स कम, पैसे कम, और भरोसा करने वाले लगभग कोई नहीं। कई बार उन्हें अपने गांव लौटने का मन करता, लेकिन फिर वही एक बात उन्हें रोक देती — “अगर अभी हार मान ली, तो सारी मेहनत बेकार।”

2019 में, जब धीरे-धीरे काम चलने लगा था, तभी दुनिया पर कोरोना की मार पड़ी। लॉकडाउन ने सब कुछ ठप कर दिया। ऑफिस बंद, क्लाइंट्स गायब, और बैंक अकाउंट में लगभग कुछ भी नहीं बचा। मजबूरी में उन्होंने पुणे छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया। बहुतों को लगा कि यह उनकी कहानी का अंत है — लेकिन असल में यह उनकी नई शुरुआत थी।
गांव में वापस आने के बाद उन्होंने सोचा, “अगर मैं शहर में रहकर सर्वाइव नहीं कर सका, तो क्यों न गांव से कुछ ऐसा शुरू करूं जो पूरे भारत में इस्तेमाल हो सके?” गांव में बिजली कटती थी, इंटरनेट कमजोर था, लेकिन Dadasaheb की हिम्मत नहीं टूटी। उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक गौशाला के पास पहाड़ी पर एक छोटा वर्कस्पेस बनाया, जहां मोबाइल सिग्नल थोड़े बेहतर मिलते थे। वहीं से ‘Design Templates’ का जन्म हुआ — एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म, जो छोटे व्यवसायों, छात्रों और डिज़ाइनर्स के लिए तैयार टेम्प्लेट उपलब्ध कराता है।
वे खुद कहते हैं — “हमारे पास fancy ऑफिस नहीं था, AC नहीं था, लेकिन आइडिया ठंडा नहीं था।” दिन में सूरज की रोशनी में काम होता, और रात में मोबाइल की फ्लैशलाइट से डिजाइन तैयार की जाती। धीरे-धीरे, यह छोटा स्टार्टअप बड़ा बनने लगा। सोशल मीडिया पर लोगों ने इस देसी कैनवा की तारीफ़ शुरू कर दी। Dadasaheb ने स्थानीय युवाओं को भी ट्रेनिंग देना शुरू किया — उन्हें डिजाइन सिखाया, डिजिटल स्किल्स सिखाए, और रोजगार के मौके दिए।
उनकी कहानी इतनी अनोखी थी कि मीडिया और उद्योग जगत का ध्यान उनकी ओर गया। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “Make in India” की बात की, तो Dadasaheb भगत का नाम भी उसी भावना का प्रतीक बन गया। उन्होंने साबित किया कि बड़ा बनने के लिए बड़े शहर या बड़ी डिग्री की ज़रूरत नहीं होती, बस बड़ा सोचने की ज़रूरत होती है।
2023 में, उन्हें मिला एक ऐसा मौका जिसने उनकी जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी — शार्क टैंक इंडिया। उन्होंने अपने स्टार्टअप “Design Templates” का पिच शो में प्रस्तुत किया। उनकी सादगी, ईमानदारी और जज़्बे ने शार्क्स को प्रभावित किया। हालांकि शुरुआत में वह नर्वस हो गए थे, लेकिन कुछ ही मिनटों में उन्होंने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने 1 करोड़ में अपनी कंपनी का 10% हिस्सा बेचकर एक डील पक्की की — और पार्टनर बने boAt के को-फाउंडर अमन गुप्ता।
शो के बाद, Design Templates का नाम पूरे भारत में फैल गया। लोग कहने लगे — “यह देसी कैनवा है।” लेकिन Dadasaheb इसके जवाब में हमेशा कहते हैं — “नहीं, यह इंडियन आइडिया है। हम किसी की कॉपी नहीं, अपनी कहानी हैं।”
आज उनकी कंपनी में दर्जनों डिजाइनर काम करते हैं, और हजारों लोग उनके प्लेटफ़ॉर्म से डिजाइन सीख रहे हैं। गांव के वही बच्चे, जो पहले खेती या मजदूरी करने पर मजबूर थे, अब लैपटॉप पर काम करते हैं और अपने सपनों को पिक्सल्स में बदल रहे हैं।
Dadasaheb का मानना है कि “अगर आप दूसरों की शक्ल देखकर काम करेंगे, तो आप कभी खुद की पहचान नहीं बना पाएंगे।” यही सोच उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह आज भी सादगी से रहते हैं, गांव में ही काम करते हैं, और अपने ऑफिस बॉय से CEO बनने के सफर को अपनी सबसे बड़ी डिग्री मानते हैं।
उन्होंने यह भी दिखाया कि ‘Innovation’ सिर्फ शहरों से नहीं, गांवों से भी निकल सकता है। बिजली के बिना, सिर्फ जुनून के सहारे, उन्होंने वह बना दिया जो बड़े-बड़े स्टार्टअप्स करोड़ों खर्च करके नहीं बना पाए।
उनकी कहानी हर उस युवा के लिए एक सबक है जो सोचता है कि “मेरे पास कुछ नहीं है।” क्योंकि Dadasaheb के पास भी कुछ नहीं था — बस एक सपना, एक सफर, और कभी न हार मानने वाला दिल। वह कहते हैं — “मैंने अपने जीवन में दो चीज़ें नहीं छोड़ीं — मेहनत और उम्मीद। क्योंकि यही दो चीज़ें किसी भी गरीब को अमीर बना सकती हैं।” आज जब कोई उनसे पूछता है कि वे CEO कैसे बने, तो वह मुस्कराकर कहते हैं — “मैंने सफाई से शुरुआत की थी, इसलिए समझ गया कि साफ सोच सबसे बड़ा हथियार है।”
Conclusion
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