ज़रा सोचिए… आपने अपनी ज़िंदगी की सारी बचत एक फ्लैट खरीदने में लगा दी। सपनों का घर, बच्चों के लिए कमरा, बालकनी में शाम की चाय का सपना… लेकिन जैसे ही बिल्डर Bankrupt घोषित हुआ, सब कुछ ठहर गया। साइट पर काम बंद, ऑफिस बंद, और जवाब देने वाला कोई नहीं।
बैंक EMI चल रही है, किराया भी देना पड़ रहा है, और ऊपर से कोई कानूनी रास्ता भी नहीं दिखता। कोर्ट में केस फंसे हैं, और जब उम्मीद की एक किरण नजर आती है, तो एक नया अड़चन सामने आ जाता है — ईडी यानी Enforcement Directorate। जिसने मनी लॉन्ड्रिंग के नाम पर बिल्डर की सारी संपत्तियां जब्त कर लीं। अब वो फ्लैट, वो जमीन, वो टावर — सब सील। और आप? बस इंतज़ार करते रह गए।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि लाखों भारतीयों की है जो अपने घर के लिए सालों से जूझ रहे हैं। लेकिन अब ये कहानी बदलने जा रही है। क्योंकि एक ऐसा फैसला आया है जिसने उस दीवार को तोड़ दिया है जो इतने सालों से इनसॉल्वेंसी और ईडी के बीच खड़ी थी। अब अगर कोई कंपनी Bankrupt होती है, तो उसकी जब्त संपत्ति बेचकर उसका पैसा Investors, बैंकों और सबसे अहम — होमबायर्स को वापस मिलेगा। और इसमें ईडी बीच में नहीं आएगी।
यह सुनने में एक कानूनी घोषणा लगती है, लेकिन असल में यह उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की सुबह है जिनके सपनों के घर अधूरे रह गए थे। जब ईडी और IBBI यानी Insolvency and Bankruptcy Board of India एक साथ आए, तो उन्होंने सिर्फ एक सर्कुलर जारी नहीं किया — उन्होंने उस सिस्टम को हिला दिया जो अब तक लोगों को न्याय से दूर रखता था।
अब तक की व्यवस्था में एक बड़ी दिक्कत थी। जब किसी कंपनी पर मनी लॉन्ड्रिंग का शक होता था, तो ईडी उसके सारे एसेट्स फ्रीज कर देती थी। जमीन, बैंक बैलेंस, बिल्डिंग, सब कुछ। दूसरी तरफ अगर वही कंपनी IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code के तहत दिवालिया प्रक्रिया में चली जाती, तो रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल कुछ भी नहीं कर पाता। क्योंकि संपत्ति “जब्त” थी। अदालतों में दोनों कानूनों की टक्कर होती — PMLA कहता “यह अपराध से जुड़ी संपत्ति है”, और IBC कहता “यह Investors और खरीदारों का पैसा है।”
परिणाम क्या होता? वर्षों तक अदालतों में सुनवाई, बीच में प्रोजेक्ट रुके, और आम जनता फंसी रह जाती। किसी को अपना फ्लैट नहीं मिलता, बैंक को कर्ज़ वापस नहीं मिलता, और Investors की पूंजी डूब जाती। कई बड़े बिल्डर केस जैसे अमरपाली, युनिटेक, सुपरटेक और डीएसआर जैसी कंपनियों में यही स्थिति थी — बिल्डर जेल में, संपत्ति सील, और खरीदार बस “कानूनी प्रक्रिया चल रही है” सुनकर थक चुके थे।
लेकिन अब यह दौर खत्म होने जा रहा है। अक्टूबर 2025 में हुई बैठकों के बाद, नवंबर की शुरुआत में एक नया SOP यानी Standard Operating Procedure जारी हुआ। इस नई व्यवस्था के अनुसार, अब अगर किसी दिवालिया कंपनी की संपत्ति ईडी ने जब्त की है, तो रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल PMLA कोर्ट से उसकी रिलीज के लिए आवेदन कर सकता है। यानी अब कानूनी रूप से वह संपत्ति बेची जा सकेगी ताकि उससे पैसा वसूला जा सके।
यह केवल एक कागज़ी बदलाव नहीं, बल्कि सिस्टम का पुनर्जन्म है। अब तक जो प्रोजेक्ट वर्षों से ठप थे, अब उनमें फिर से जान फूंकी जा सकेगी। अगर कोई कंपनी जैसे XYZ Builders पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस चल रहा है, तो भी उसकी अधूरी प्रॉपर्टीज अब बेची जा सकती हैं और उससे मिलने वाला पैसा सीधे उन लोगों को दिया जाएगा जिनका हक़ बनता है — बैंक, Investor और होमबायर्स।
लेकिन यह सब इतनी आसानी से नहीं हुआ। इसके लिए ईडी और IBBI दोनों के बीच महीनों की बातचीत और कई कानूनी राय ली गईं। क्योंकि दोनों एजेंसियों के कानूनों में टकराव था। PMLA कहता है कि अपराध से जुड़ी संपत्ति सरकार की है, जबकि IBC कहता है कि दिवालिया कंपनी की संपत्ति उसके हितधारकों की है। इस टकराव ने पिछले कई सालों में सैकड़ों केसों को अटका रखा था।
नई व्यवस्था में सबसे खास बात यह है कि ईडी और IBBI ने अब मिलकर एक “विश्वास आधारित” तंत्र तैयार किया है। जब किसी कंपनी की संपत्ति रिलीज होगी, तो रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को एक अंडरटेकिंग देनी होगी — कि वह संपत्ति केवल क्रेडिटर्स यानी कर्ज़दाताओं और हितधारकों के हित में उपयोग की जाएगी, न कि उस कंपनी के प्रमोटर्स या आरोपियों के लिए। इसका मतलब यह है कि अब कोई भी आरोपी व्यक्ति या कंपनी अपनी संपत्ति वापस नहीं पा सकेगी, लेकिन खरीदार और बैंक अपना हक़ पा सकेंगे।
ईडी इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगी ताकि पारदर्शिता बनी रहे। यानी अगर किसी कंपनी की संपत्ति बेची गई, तो हर रुपये का हिसाब रहेगा — कौन खरीदा, कितना दाम मिला, किसे भुगतान किया गया, और कौन-सा प्रोजेक्ट पूरा हुआ। यह पूरी प्रक्रिया ऑडिट और रिपोर्टिंग के तहत रहेगी ताकि कोई गड़बड़ी न हो।
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा होगा बैंकों को। देश में ऐसे सैकड़ों IBC केस लंबित हैं जिनमें बैंकों के हज़ारों करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। अब जब इन कंपनियों की संपत्ति खुल सकेगी, तो बैंकों को अपने कर्ज की वसूली में आसानी होगी। इससे उनके बैलेंस शीट सुधरेंगे और नए लोन देने की क्षमता भी बढ़ेगी।
दूसरा सबसे बड़ा लाभ मिलेगा होमबायर्स को। हजारों ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो आधे बने रह गए क्योंकि बिल्डर पर ईडी ने कार्रवाई कर दी थी। अब जब ये संपत्तियां बेची जा सकेंगी, तो नए Investor या डेवलपर आकर उन प्रोजेक्ट्स को पूरा कर पाएंगे। मतलब, वो लोग जो सालों से “पजेशन लेटर” का इंतज़ार कर रहे थे, अब आखिरकार अपने घर में शिफ्ट हो पाएंगे।
तीसरा फायदा पूरे आर्थिक सिस्टम को होगा। अब IBC की 180 से 330 दिनों की समयसीमा का पालन आसान होगा। पहले इन मामलों में सालों लग जाते थे क्योंकि ईडी की मंजूरी का इंतज़ार करना पड़ता था। लेकिन अब यह प्रक्रिया फास्ट-ट्रैक मोड में होगी। कोर्ट केस कम होंगे, और न्यायिक व्यवस्था पर बोझ भी घटेगा।
ईडी का कहना है कि “PMLA की सख्ती और IBC की वैल्यू रिकवरी विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।” यह एक बहुत महत्वपूर्ण लाइन है — क्योंकि यह दिखाती है कि अब सरकार अपराध पर कार्रवाई भी करेगी और Investors का पैसा भी फंसेगा नहीं। पहले ऐसा नहीं था — अगर किसी कंपनी के मालिक पर घोटाले का आरोप लगा, तो पूरी कंपनी ठप हो जाती थी, भले ही उसमें हजारों ईमानदार खरीदार और कर्मचारी क्यों न हों। अब मामला उल्टा है — आरोपी सजा पाएगा, लेकिन जनता नहीं। यह वही सोच है जिसने भारत की दिवालियापन व्यवस्था को एक नया चेहरा दिया है।
अगर आप एक फ्लैट खरीदार हैं, तो यह बदलाव आपके लिए उम्मीद का सबसे बड़ा संकेत है। मान लीजिए कि आपने एक रियल एस्टेट कंपनी से फ्लैट बुक किया था। कंपनी दिवालिया हो गई, ईडी ने उसकी जमीन और प्रॉपर्टीज सील कर दीं। पहले आप बस इंतज़ार करते थे कि कभी कोर्ट फैसला करे, कभी सरकार दखल दे। लेकिन अब रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल सीधे अदालत में जाकर उस संपत्ति को रिलीज करवा सकता है, बेच सकता है, और आपको आपका पैसा या फ्लैट दिला सकता है।
यह परिवर्तन सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। क्योंकि भारत में “घर” केवल एक प्रॉपर्टी नहीं होता — यह एक सपना होता है। और उस सपने को लौटाना, शायद किसी भी सरकार या संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है।
इस नए सिस्टम से रियल एस्टेट मार्केट पर भी बड़ा असर पड़ेगा। अब Investors का भरोसा बढ़ेगा क्योंकि उन्हें पता है कि अगर कोई बिल्डर दिवालिया भी हुआ, तो उनका पैसा पूरी तरह नहीं डूबेगा। इससे फाइनेंस कंपनियां, बैंक और NBFCs भी रियल एस्टेट को और फंड देंगे। इसका मतलब है — नए प्रोजेक्ट्स, नई नौकरियां, और अर्थव्यवस्था में तेजी।
IBC और PMLA का यह संयोजन भारत की न्यायिक प्रणाली में एक मिसाल बन सकता है। यह दिखाता है कि सख्त कानून और Investment सुरक्षा एक साथ चल सकते हैं। पहले यह सोचना भी मुश्किल था कि मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जब्त की गई संपत्ति को किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन अब यह न केवल संभव है, बल्कि कानूनी रूप से संरक्षित भी है।
ईडी और IBBI की इस पहल से देश के कई पुराने विवाद भी खत्म होंगे। कई केस ऐसे थे जहाँ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश अलग-अलग थे। अब एक standard SOP होने से हर केस में समान दिशा मिलेगी। इससे न्यायिक भ्रम भी खत्म होगा।
अब सवाल है — क्या इस सिस्टम का दुरुपयोग हो सकता है? ईडी ने इसके लिए भी सुरक्षा कवच तैयार किया है। हर संपत्ति की रिलीज कोर्ट की मंजूरी से होगी, और रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल को हर कदम पर रिपोर्ट देना होगी। संपत्ति बेचे जाने के बाद पूरी प्रक्रिया का ऑडिट होगा और फंड्स के उपयोग की पुष्टि भी की जाएगी। अगर किसी स्तर पर कोई गड़बड़ी पाई गई, तो ईडी फिर से कार्रवाई कर सकेगी। यानी इस बार पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों साथ चलेंगे। न कोई बेगुनाह फंसेगा, न कोई अपराधी बचेगा। और सबसे बड़ी बात — जनता का पैसा जनता को वापस मिलेगा।
Conclusion
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