ज़रा सोचिए… अमेरिका की चमकदार सड़कों पर एक भारतीय Teenager दिनभर स्कूल जाता, फिर शाम होते ही प्लेटें धोने निकलता। हाथों पर झाग, कपड़ों पर ग्रीस के धब्बे, और दिल में एक सपना — कि कभी न कभी ज़िंदगी कुछ और बनेगी। कोई नहीं जानता था कि वही लड़का, जो पाँच डॉलर प्रति घंटे कमाने के लिए जूठे बर्तन धोता था, एक दिन उसी होटल चेन का मालिक बन जाएगा। यह कहानी है Amol Kohli की — उस भारतीय मूल के युवक की जिसने संघर्ष, जिद और जुनून से अमेरिकी सपना सच कर दिखाया। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
साल 2003, अमेरिका का शहर मैसाचुसेट्स। हाई स्कूल का छात्र Amol Kohli अपने दोस्तों की तरह महंगे शौक नहीं पाल सकता था। परिवार की आमदनी सीमित थी, और अपनी पढ़ाई व छोटे-मोटे खर्च पूरे करने के लिए उसे काम करना पड़ता था। तब उन्होंने एक स्थानीय रेस्तरां ‘फ्रेंडलीज’ में पार्ट-टाइम जॉब की। यह वही जगह थी जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा — “कोई काम छोटा नहीं होता।” दिन में स्कूल, रात में जूठी प्लेटें — बस यही उनकी दिनचर्या थी। लेकिन इन प्लेटों के झाग में वह अपने आने वाले कल की चमक देख रहे थे।
Amol Kohli को जो काम मिलता, वह पूरे दिल से करते। कभी ग्राहक की टेबल साफ़ करते, तो कभी बर्तन धोते या फर्श पोछते। कई बार उनके दोस्त मज़ाक उड़ाते — “इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो?” लेकिन Amol Kohli के चेहरे पर मुस्कान रहती। वह जानते थे कि हर छोटे काम के पीछे कोई बड़ी सीख छिपी है। रेस्तरां की रसोई में खड़े होकर उन्होंने लोगों के behavior, management और मेहनत के असली मायने सीखे। यही वो नींव थी जिस पर उन्होंने अपना साम्राज्य खड़ा किया।
समय बीतता गया। स्कूल खत्म हुआ, फिर कॉलेज आया। Amol Kohli ने ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी से फाइनेंस और मार्केटिंग में डिग्री ली। पर असली शिक्षा उन्हें किताबों से नहीं, बल्कि उस रेस्तरां की किचन से मिली थी। उन्होंने वहाँ सिर्फ़ बर्तन नहीं धोए — बिजनेस के हर पहलू को समझा। बीमा कैसे लिया जाता है, कर्मचारियों की लागत क्या होती है, सप्लाई चेन कैसे चलती है — ये सब वो अपने अनुभव से सीख रहे थे। जहाँ बाकी लोग नौकरी करने का सपना देखते, वहाँ Amol Kohli मालिक बनने की तैयारी कर रहे थे।
वो अक्सर अपने मैनेजर से सवाल पूछते — “यहाँ कितना खर्च आता है? महीने की सेल कितनी होती है?” उनकी जिज्ञासा किसी को समझ नहीं आती थी। लेकिन भीतर ही भीतर अमोल ने ठान लिया था कि अगर ज़िंदगी मौका दे, तो वो इस बिजनेस को बदलकर रख देंगे।
कॉलेज के बाद Amol Kohli ने कॉर्पोरेट दुनिया में कदम रखा। उन्होंने Financial consulting कंपनियों और Investment institutions में काम किया, जहाँ उन्होंने समझा कि पूँजी कैसे जुटाई जाती है, और एक बिजनेस को कैसे बढ़ाया जाता है। लेकिन मन अब भी उस ‘फ्रेंडलीज’ की रसोई में अटका था — जहाँ से सब शुरू हुआ था। उन्हें लगता था कि वहाँ उन्होंने सिर्फ़ प्लेटें नहीं धोईं, बल्कि अपने सपनों को आकार दिया है।
दो दशक बाद, यानी करीब बीस साल के संघर्ष, अनुभव और धैर्य के बाद, 37 वर्षीय Amol Kohli कोहली ने इतिहास रच दिया। जिस ‘फ्रेंडलीज’ रेस्तरां में उन्होंने कभी पाँच डॉलर प्रति घंटे की मजदूरी पर काम किया था, आज वे उसी रेस्तरां चेन के मालिक बन चुके हैं। उनकी Investment कंपनी ने न सिर्फ़ ‘फ्रेंडलीज’ का अधिग्रहण किया, बल्कि उसकी पैरेंट कंपनी ‘ब्रिक्स होल्डिंग्स’ और उससे जुड़ी छह और लोकप्रिय रेस्टोरेंट चेन को भी खरीद लिया।
अब सोचिए, किस्मत का कितना अद्भुत खेल है। कभी जूठे बर्तन धोने वाला लड़का आज 250 रेस्टोरेंट्स का मालिक है। उनकी कंपनी के पास अब ‘क्लीन जूस’, ‘ऑरेंज लीफ’, ‘रेड मैंगो’, ‘स्मूदी फैक्ट्री प्लस किचन’, ‘सूपर सलाद’ और ‘हंबल डोनट’ जैसे प्रसिद्ध ब्रांड हैं। अमेरिका के कई राज्यों में फैला यह साम्राज्य अब Amol Kohli के नेतृत्व में नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
लेकिन ये सब कुछ यूँ ही नहीं हुआ। इस सफलता के पीछे अनगिनत नींदहीन रातें, असफल प्रयास और आत्म-संदेह के पल छिपे हैं। जब उनके दोस्त पार्टियों में जाते थे, Amol Kohli एक्सेल शीट्स पर नंबर्स गिन रहे होते। जब लोग छुट्टियाँ मनाते थे, वह सप्लाई लागत और इन्वेंटरी के चार्ट बना रहे होते। उनके लिए बिजनेस केवल पैसा कमाने का ज़रिया नहीं, बल्कि एक जुनून था — एक ऐसी यात्रा जो “डिशवॉशर” से “ओनर” तक पहुँची।
Amol Kohli ने कई बार कहा — “मैंने कभी खुद को गरीब नहीं समझा, बस एक शुरुआती स्तर पर मानता था।” यही सोच उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती थी। जहाँ लोग कठिनाइयों से डरते हैं, उन्होंने कठिनाइयों को अपनी ताकत बनाया। उनके मुताबिक, “हर प्लेट जो मैंने धोई, उसने मुझे सिखाया कि अगर आप किसी काम को ईमानदारी से करते हैं, तो वो कभी व्यर्थ नहीं जाता।”
‘फ्रेंडलीज’ की कहानी भी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं। यह रेस्तरां अमेरिका की पुरानी और प्रसिद्ध चेन में से एक है, जिसकी पहचान इसके आइसक्रीम और परिवारों के साथ बिताए पलों से होती है। लेकिन समय के साथ कंपनी संघर्ष में फँस गई, और उसकी कई शाखाएँ बंद हो गईं। Amol Kohli को यह मौका दिखा — उन्होंने समझा कि अगर सही नेतृत्व और नई रणनीति दी जाए, तो इस ब्रांड को फिर से जिंदा किया जा सकता है।
उन्होंने Investors का विश्वास जीता, अपनी टीम बनाई, और ब्रिक्स होल्डिंग्स को खरीदने का फैसला किया। यह सौदा करोड़ों डॉलर का था — लेकिन Amol Kohli के लिए इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण था वह भावनात्मक जुड़ाव जो उन्होंने इस ब्रांड से महसूस किया था। यह सिर्फ़ बिजनेस नहीं था, बल्कि उनका ‘देय कर्ज़’ था उस जगह का, जिसने उन्हें सिखाया कि मेहनत क्या होती है।
आज जब Amol Kohli किसी ‘फ्रेंडलीज’ रेस्टोरेंट में जाते हैं, तो वही प्लेटें अब किसी और के हाथ में होती हैं — लेकिन वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों को देखकर वे हमेशा मुस्कुरा देते हैं। क्योंकि उन्हें अपनी कहानी उनमें नज़र आती है। वह अक्सर अपने कर्मचारियों से कहते हैं — “मैं भी यहीं से शुरू हुआ था।” यही कारण है कि उनकी कंपनी में ‘एम्प्लॉई-फर्स्ट कल्चर’ सबसे अहम है।
Amol Kohli का मानना है कि किसी बिजनेस की रीढ़ उसके लोग होते हैं। इसलिए उन्होंने अपने सभी रेस्टोरेंट्स में कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बीमा, स्कॉलरशिप प्रोग्राम और करियर डेवलपमेंट ट्रेनिंग शुरू की। उन्होंने कहा — “अगर मैं यहाँ तक आ सकता हूँ, तो कोई भी आ सकता है।” यही संदेश आज उनकी सफलता की पहचान बन चुका है।
Amol Kohli की कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता की नहीं है, बल्कि यह उस भारतीय प्रवासी भावना की कहानी है जो हर कठिन परिस्थिति में उम्मीद ढूँढ लेती है। विदेश की ज़मीन पर जहाँ शुरुआत अक्सर संघर्ष से होती है, वहाँ Amol Kohli ने साबित किया कि “अगर हौसले बुलंद हों, तो ज़मीन भी झुक जाती है।”
उन्होंने न सिर्फ़ अपना साम्राज्य खड़ा किया, बल्कि यह भी दिखाया कि आप जहाँ से भी आए हों, वहाँ से आगे बढ़ने की गुंजाइश हमेशा होती है। कई भारतीय प्रवासियों के लिए वह अब प्रेरणा बन चुके हैं। लोग कहते हैं — “अगर अमोल कर सकता है, तो हम क्यों नहीं?”
आज उनके पास 250 से अधिक रेस्तरां हैं, हजारों कर्मचारी हैं, और सालाना करोड़ों डॉलर का टर्नओवर है। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि उन्हें सबसे ज़्यादा गर्व किस बात पर है, तो उनका जवाब था — “उस पहले दिन पर, जब मैंने बर्तन धोने के बाद पहली बार अपनी कमाई से माँ के लिए गिफ्ट खरीदा था।” यह जवाब बताता है कि सफलता का असली मतलब क्या है — केवल पैसा नहीं, बल्कि अपनी मेहनत से किसी का चेहरा खिलाना।
कई बार लोग उनसे पूछते हैं — “क्या आपने कभी सोचा था कि आप मालिक बनेंगे?” वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “नहीं, मैंने सिर्फ़ इतना सोचा था कि मैं अपने हर काम में बेस्ट दूँगा।” यही दृष्टिकोण उन्हें सफलता तक ले गया। क्योंकि ज़िंदगी में हर छोटा कदम, अगर सही दिशा में उठाया जाए, तो वह मंज़िल तक ज़रूर पहुँचाता है।
अमोल कोहली की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि मौके हमेशा आसमान से नहीं गिरते — कभी-कभी वो झाग से भरे सिंक के पास खड़े रहते हैं, बस आपको उन्हें पहचानना होता है। अगर उन्होंने तब उस काम को तुच्छ समझा होता, तो शायद आज यह कहानी लिखी ही नहीं जाती।
आज भी जब वह किसी नए उद्यमी से मिलते हैं, तो उन्हें वही सलाह देते हैं — “कभी भी शुरुआत से मत डरिए। अगर आप मेहनती हैं और सीखने के लिए तैयार हैं, तो ज़िंदगी आपको वहीं ले जाएगी, जहाँ आप जाना चाहते हैं।”
Conclusion
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