Inspiring: Vikram Doraiswamy का दमदार बयान! रूस से दोस्ती पर भारत की आज़ाद विदेश नीति का शानदार बचाव। 2025

अगर आपसे कोई कहे—“अपनी दुकान बंद कर दो, क्योंकि मेरे दुश्मन को तुमसे फायदा हो रहा है…” तो क्या आप ऐसा कर देंगे? अब सोचिए, यही बात आज भारत से कही जा रही है। दुनिया के कुछ ताकतवर देश चाहते हैं कि भारत अपनी तेल की ज़रूरतों को नजरअंदाज कर दे… अपने उद्योग-धंधे ठप कर दे… सिर्फ इसलिए क्योंकि रूस से व्यापार करना उन्हें रास नहीं आ रहा।

लेकिन भारत का जवाब इतना दो-टूक और गर्व से भरा था कि पूरी दुनिया सुनती रह गई। ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त Vikram Doraiswamy ने एक इंटरव्यू में जो शब्द कहे—वो सिर्फ जवाब नहीं थे, बल्कि एक नये भारत की घोषणा थी… एक ऐसा भारत जो अब किसी का मोहरा नहीं बनेगा। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

Vikram Doraiswamy की आवाज़ में जब आत्मविश्वास झलका, तो उसमें सिर्फ कूटनीति नहीं थी… उसमें एक आत्मनिर्भर राष्ट्र की गूंज थी। उन्होंने कहा, “क्या आप हमसे चाहते हैं कि हम अपनी अर्थव्यवस्था पर ताला लगा दें?” सवाल छोटा था, लेकिन इसका असर बड़ा था। क्योंकि पहली बार भारत ने ये साफ कर दिया कि वो अब किसी के दबाव में आकर अपने राष्ट्रीय हितों की कुर्बानी नहीं देगा—चाहे सामने अमेरिका हो, यूरोप हो या कोई अंतरराष्ट्रीय गठबंधन।

दोरईस्वामी ने एक साधारण-सी लेकिन ताकतवर बात कही—“भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा Energy उपभोक्ता है। हम अपनी जरूरतों का 80% से ज्यादा Import करते हैं। आप हमसे क्या करवाना चाहते हैं? क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था को बंद कर दें?” ये वो वाक्य था जिसने पूरी बातचीत की दिशा तय कर दी। भारत आज सिर्फ एक विकासशील देश नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर एक निर्णायक आवाज बन चुका है—जो अपनी Energy security से समझौता नहीं करेगा।

भारत के इस रुख का विरोध करने वाले मुख्यतः यूरोपीय देश हैं, जिन्होंने हाल ही में रूस पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। और इन प्रतिबंधों की चपेट में भारत की वाडिनार रिफाइनरी भी आ गई, जिसमें रूस की कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी है। ये वही यूरोप है जो खुद रूस से रिफाइंड तेल और रेयर अर्थ Import करता है—लेकिन भारत को पाठ पढ़ाता है। दोरईस्वामी ने इसी दोहरे मापदंड को उजागर किया। उन्होंने कहा, “यूरोप के कई देश हमसे रिफाइंड ऑयल खरीदते हैं, लेकिन हमें यह बताया जाता है कि हम रूस से क्यों खरीद रहे हैं। क्या यह थोड़ा अजीब नहीं है?”

भारत की यह स्थिति सिर्फ ‘Energy’ की नहीं है, यह उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता, सैन्य रणनीति और स्वतंत्र विदेश नीति की पहचान है। दोरईस्वामी ने बताया कि जब पश्चिमी देश भारत को हथियार देने से मना कर देते थे, तब रूस ही था जिसने भारत का साथ दिया। और ये रिश्ता सिर्फ जरूरत नहीं था—यह भरोसे और रणनीतिक सहयोग पर बना हुआ रिश्ता था। जब भारत के पड़ोसी देश उन्हीं पश्चिमी देशों से हथियार लेकर भारत पर हमले की तैयारी करते थे, तब रूस भारत का सुरक्षा कवच बना।

इसलिए जब आज रूस-भारत के रिश्तों को लेकर सवाल उठते हैं, तो भारत का जवाब सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी होता है। और यही बात दोरईस्वामी ने मजबूती से दोहराई। उन्होंने साफ कहा कि रूस के साथ भारत की दोस्ती कोई तात्कालिक सौदा नहीं, बल्कि दशकों पुराना रणनीतिक जुड़ाव है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।

पश्चिमी देशों की तरफ से लगाए गए दबाव और नीतिगत हस्तक्षेपों को भारत अब सहजता से नहीं लेता। एक समय था जब भारत को दुनिया ‘संतुलन साधने वाला राष्ट्र’ मानती थी, लेकिन आज भारत ‘नीति निर्धारण करने वाला राष्ट्र’ बन चुका है। दोरईस्वामी ने जो बातें कहीं, वो भारत की नई विदेश नीति की परिभाषा थीं—जहां अब भावनाओं से नहीं, तर्क और राष्ट्रीय हितों से निर्णय लिया जाता है।

यह दिलचस्प है कि यूरोप एक तरफ भारत से अपेक्षा करता है कि वह रूस से तेल न खरीदे, लेकिन दूसरी ओर खुद वही यूरोपीय देश उन्हीं स्रोतों से अन्य वस्तुएं Import करते हैं—जैसे रेयर अर्थ मटेरियल्स। दोरईस्वामी ने इस पाखंड की ओर इशारा करते हुए कहा—“क्या हम भी आपसे वफादारी का टेस्ट मांग सकते हैं?” यह सवाल सीधा था और कटाक्ष भी उतना ही तीखा।

भारत आज अपने नागरिकों के हित में निर्णय ले रहा है। Energy कीमतों का संकट हो या वैश्विक सप्लाई चेन का दबाव—भारत ने हमेशा संतुलन बनाए रखा है। चाहे रूस से डिस्काउंटेड ऑयल खरीदना हो या घरेलू रिफाइनिंग कैपेसिटी को बढ़ाना—भारत का हर कदम रणनीतिक सोच से उठाया गया है। दोरईस्वामी ने बताया कि भारत आज दुनिया में क्रूड ऑयल का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर है—और यूरोप भी भारत से तेल खरीदता है। ऐसे में भारत को उपदेश देना दोहरी नीति नहीं तो और क्या है?

यह भी कहा जा रहा है कि भारत ‘रूस-भारत-चीन समझौते’ में शामिल है। लेकिन दोरईस्वामी ने इस बात को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ‘आरआईसी’ सिर्फ एक त्रिपक्षीय संवाद मंच था, न कि कोई सैन्य या आर्थिक गठबंधन। यह किसी भी तरह की साजिश का हिस्सा नहीं था, और पिछले लंबे समय से ऐसी कोई बैठक भी नहीं हुई है। भारत की स्पष्टता यहां भी दिखती है—जहां संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती।

भारत की विदेश नीति का संदेश आज दुनिया के लिए बिल्कुल साफ है—भारत अब किसी वैश्विक शक्ति गुट का मोहरा नहीं बनेगा। भारत अपने फैसले खुद करेगा, और उसकी प्राथमिकता हमेशा उसके नागरिकों का हित, Energy security, और आत्मनिर्भरता रहेगी। रूस के साथ भारत का रिश्ता इसीलिए बरकरार है क्योंकि वह विश्वास और साझेदारी पर आधारित है, न कि दबाव या डर पर।

सोचिए, अगर भारत अपने फैसले दूसरों की इच्छाओं के अनुसार लेने लगे, तो क्या वह 140 करोड़ लोगों की Energy ज़रूरतें पूरी कर पाएगा? क्या वह अपने उद्योगों को चालू रख पाएगा? क्या वह एक वैश्विक महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित कर पाएगा? जवाब है—नहीं। और इसलिए, भारत ने अब दो टूक कह दिया है—“हम कठपुतली नहीं हैं।”

आज जब दुनिया दो गुटों में बंटी हुई नज़र आती है—अमेरिका बनाम रूस, पश्चिम बनाम पूर्व—तब भारत का रास्ता सबसे अलग है। वह अपने ‘राष्ट्रहित’ के नक्शे पर चलता है, और उसी को अपना धर्म मानता है। दोरईस्वामी की बातें यही सिद्ध करती हैं कि भारत अब न दबेगा, न झुकेगा—बल्कि मजबूती से खड़ा रहेगा… अपने फैसलों, अपने सिद्धांतों और अपनी प्राथमिकताओं के साथ।

यही कारण है कि भारत जैसे-जैसे वैश्विक मंच पर अपनी जगह पुख्ता कर रहा है, वैसे-वैसे उसकी स्वतंत्र विदेश नीति भी पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन रही है। भारत न तो पश्चिम की कठपुतली बनेगा, न पूर्व का मोहरा। वह ‘भारत’ रहेगा—अपने रास्ते पर, अपने आत्मसम्मान के साथ।

दोरईस्वामी का यह इंटरव्यू सिर्फ एक जवाब नहीं था—यह उस आत्मनिर्भर भारत की घोषणा थी, जो अब किसी के इशारों पर नहीं, बल्कि अपने विवेक और राष्ट्रीय हित के अनुसार दुनिया से संवाद करता है। जो पहले सुनता था, अब बोलता है। जो पहले झुकता था, अब खड़ा होता है। तो अगली बार जब कोई कहे कि भारत को यह करना चाहिए या वो नहीं करना चाहिए—तो याद रखिए, भारत अब सलाह नहीं… साझेदारी चाहता है। और साझेदारी बराबरी की होती है—जहां कोई बड़ा या छोटा नहीं होता… जहां कोई कठपुतली नहीं होता।

Conclusion

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