कल्पना कीजिए… आधी रात का वक्त है। व्हाइट हाउस की चमकती इमारतें बाहर से रोशन दिख रही हैं, लेकिन अंदर गलियारों में सन्नाटा पसरा है। कैपिटल हिल पर राजनीतिक बहसें थम चुकी हैं और घड़ी की सूइयाँ जैसे ही 12 बजकर 1 मिनट पर पहुंचीं, पूरी दुनिया ने महसूस किया कि अमेरिका की संघीय सरकार – जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहती है – रुक गई है।
हज़ारों दफ्तरों की लाइटें बुझ गईं, कर्मचारी अचानक अपने सिस्टम बंद करके घर चले गए, और लाखों लोगों के भविष्य पर अनिश्चितता की चादर पड़ गई। यह कोई फ़िल्म का दृश्य नहीं है, बल्कि अमेरिका की राजनीति का वह अध्याय है जिसे कहा जाता है – Government Shutdown। यही वह क्षण है, जब पूरी दुनिया सवाल पूछती है – कैसे दुनिया की सबसे अमीर और ताकतवर सरकार खुद को बंद कर सकती है? और इसके पीछे कौन-सा खेल छुपा है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
1 अक्टूबर 2025 का यह दिन इतिहास में दर्ज हो गया। नया महीना शुरू होते ही अमेरिकी जनता को खुशियों की जगह चिंता का तोहफा मिला। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेट्स के बीच महीनों से खींचतान चल रही थी। असली मुद्दा था – फंडिंग बिल। हर साल अमेरिकी सरकार को नए fiscal year के लिए बजट पास करना होता है।
यह सिर्फ कागज़ का दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि उसी से तय होता है कि सेना को पैसा मिलेगा या नहीं, स्वास्थ्य सेवाएँ चलेंगी या नहीं, कर्मचारियों को वेतन मिलेगा या नहीं। इस बार रिपब्लिकन पार्टी एक बिल लेकर आई, लेकिन सीनेट में वोटिंग के दौरान डेमोक्रेट्स ने इसे रोक दिया। 55 वोट मिले, लेकिन ज़रूरी थे 60। और नतीजा यह हुआ कि आधी रात होते ही अमेरिका की सरकार ने काम करना बंद कर दिया।
अब सवाल उठता है – डेमोक्रेट्स ने ऐसा क्यों किया? असल में असली टकराव “हेल्थकेयर सब्सिडी” को लेकर था। यह वही योजना थी जिसे बराक ओबामा ने अपने कार्यकाल में लागू किया था और जिसे लोग “ओबामाकेयर” कहते हैं। डेमोक्रेट्स चाहते थे कि यह योजना जारी रहे, ताकि लाखों गरीब अमेरिकियों को स्वास्थ्य सेवाओं में राहत मिलती रहे। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पार्टी रिपब्लिकन का मानना था कि यह सरकारी पैसे की बर्बादी है और इसे खत्म होना चाहिए। जब इस मुद्दे पर सहमति नहीं बनी, तो पूरा सिस्टम ही रुक गया। यह हमें यह दिखाता है कि लोकतंत्र में राजनीति कभी-कभी जनता के जीवन से बड़ी हो जाती है।
अगर हम इतिहास की तरफ देखें, तो यह पहली बार नहीं है। अमेरिका 1977 से अब तक 20 से ज्यादा बार Shutdown झेल चुका है। कभी यह एक दिन का रहा, कभी कई हफ्तों तक। 2013 का Shutdown 16 दिन चला था और उस दौरान लगभग 8.5 लाख संघीय कर्मचारियों को बिना वेतन छुट्टी पर जाना पड़ा। सबसे लंबा Shutdown हुआ था 2018 से 19 में – पूरे 35 दिन तक। उस दौरान हवाई अड्डों पर सुरक्षा कर्मचारियों की कमी हो गई, किसान सरकारी मदद से वंचित रह गए और हज़ारों छोटे व्यवसाय चौपट हो गए। यह दिखाता है कि जब सरकार बंद होती है, तो इसका असर सिर्फ कागज़ों पर नहीं बल्कि हर घर पर पड़ता है।
इस बार के Shutdown में भी अनुमान लगाया जा रहा है कि करीब 7.5 लाख कर्मचारी प्रभावित होंगे। सोचिए, इतने लोग अचानक बिना वेतन घर बैठने को मजबूर हो जाएं, तो उनके परिवारों की स्थिति क्या होगी? बच्चों की स्कूल फीस कैसे भरेगी? मकान की ईएमआई कैसे जाएगी? हर दिन लगभग 400 मिलियन डॉलर की आर्थिक हानि होगी। यानी एक दिन की राजनीति पूरे देश को करोड़ों डॉलर का नुकसान दे सकती है।
लेकिन असली सवाल है – सरकारी Shutdown होता क्या है? आसान भाषा में कहें, तो यह वैसा ही है जैसे किसी घर में पैसे खत्म हो जाएं और बिल न भर पाने की वजह से बिजली-पानी कट जाए। अमेरिका में 1 अक्टूबर से नया वित्तीय वर्ष शुरू होता है। उससे पहले कांग्रेस यानी अमेरिकी संसद को फंडिंग बिल पास करना होता है। अगर समय पर यह बिल पास नहीं होता, तो सरकार के पास अपने विभागों और एजेंसियों को चलाने के लिए पैसा नहीं बचता। नतीजा – गैर-जरूरी सेवाएँ बंद कर दी जाती हैं। सेना, पुलिस और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी सेवाएँ चलती रहती हैं, लेकिन पार्क, रिसर्च प्रोजेक्ट्स, प्रशासनिक दफ्तर और बहुत सी अदालतें बंद हो जाती हैं।
पिछले Shutdown में इसकी झलक साफ दिखी थी। 2013 में जब 16 दिन तक सरकार बंद रही, तो FDA (Food and Drug Administration) ने खाने-पीने की चीजों और दवाओं की जाँच रोक दी। सोचिए, ऐसे समय में अगर कोई खराब दवा या खाना बाजार में पहुँच जाए, तो कितनी बड़ी त्रासदी हो सकती है। राष्ट्रीय पार्कों में ताले लग गए, टूरिज्म इंडस्ट्री को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। हज़ारों केस अदालतों में अटक गए। एयरपोर्ट्स पर लंबी लाइनों में खड़े लोग घंटों परेशान होते रहे।
इस बार भी एजेंसियों ने “Contingency Plans” बना लिए हैं। यानी किस एजेंसी में कितने लोग काम करेंगे और कौन-सी सेवाएँ बंद होंगी। ज़्यादातर नॉन-एसेंशियल विभागों जैसे टूरिज्म, रिसर्च, कल्चर और शिक्षा विभाग के काम प्रभावित होंगे। कई विश्वविद्यालयों के सरकारी रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर ताला लग जाएगा। NASA जैसी एजेंसियाँ भी अपने स्पेस प्रोग्राम्स को धीमा करने पर मजबूर होंगी।
अब सोचिए – दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अगर बंद हो जाए तो बाकी देशों पर क्या असर पड़ेगा? अमेरिका की आर्थिक मशीनरी रुकते ही डॉलर पर दबाव बढ़ेगा। निवेशक घबराकर अपने पैसे निकालने लगेंगे। वॉल स्ट्रीट के गिरने का असर सीधा भारत और एशिया की स्टॉक मार्केट पर पड़ेगा। रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होगा। आईटी इंडस्ट्री, जो अमेरिकी कंपनियों से करोड़ों डॉलर का कारोबार करती है, उसकी सर्विसेज अटक सकती हैं। मतलब यह कि Shutdown सिर्फ अमेरिका का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया में महसूस होता है।
विशेषज्ञ कहते हैं कि Shutdown केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह एक राजनीतिक हथियार है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स इसका इस्तेमाल एक-दूसरे पर दबाव बनाने के लिए करते हैं। लेकिन सवाल यह है – इस राजनीतिक खेल का खामियाजा किसे भुगतना पड़ता है? जवाब है – आम जनता। वो जनता जो हर महीने टैक्स देती है, उसी को अपने ही सरकार के बंद होने पर सबसे ज्यादा परेशान होना पड़ता है।
कई अमेरिकी परिवारों की कहानियाँ इस दर्द को बयान करती हैं। एक फेडरल कर्मचारी ने पिछले Shutdown में कहा था – “मैंने अपनी बेटी की कॉलेज फीस भरने के लिए कार बेचनी पड़ी।” एक और कर्मचारी ने बताया – “हर दिन ऑफिस जाना और पता चलना कि आज वेतन नहीं मिलेगा, किसी बुरे सपने जैसा था।” यही वो मानवीय पहलू है, जिसे सिर्फ आंकड़ों में नहीं समझा जा सकता।
तो क्या यह Shutdown हमेशा के लिए रहेगा? नहीं। यह तभी खत्म होगा जब अमेरिकी कांग्रेस नया फंडिंग बिल पास करेगी और राष्ट्रपति उस पर साइन करेंगे। राष्ट्रपति अकेले अपने आदेश से सरकार नहीं खोल सकते। इसका मतलब है कि यह सबकुछ राजनीतिक समझौते पर निर्भर करता है। सवाल यह है कि यह समझौता कब होगा? और तब तक जनता को कितनी मुश्किलें झेलनी होंगी?
यह पूरा घटनाक्रम हमें एक गहरी सीख देता है – लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन जब बहस समझौते में नहीं बदलती तो उसका खामियाजा जनता उठाती है। अमेरिका आज यही झेल रहा है। और शायद यही वजह है कि पूरी दुनिया इस घटना को सिर्फ एक अमेरिकी संकट नहीं, बल्कि एक वैश्विक चेतावनी की तरह देख रही है।
Conclusion
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