Toll tax में राहत! किसे मिलेगी छूट और किसे देना होगा पैसा? जानें पूरी कहानी। 2025

ज़रा सोचिए… रात का समय है, आप अपने परिवार के साथ हाईवे पर गाड़ी चला रहे हैं। आगे चमचमाती रोशनी वाला एक टोल प्लाज़ा नज़र आता है। जैसे ही आपकी गाड़ी स्लो होती है, अचानक बूम बैरियर नीचे गिर जाता है और हाथ में मशीन लिए एक टोलकर्मी आपके सामने खड़ा हो जाता है। आप पैसे या FASTag से पेमेंट करते हैं और बैरियर उठता है। लेकिन इसी बीच एक और गाड़ी आकर रुकती है, उसमें बैठा इंसान कहता है—“मैं सेना का जवान हूँ, मुझे टोल नहीं देना।”

टोलकर्मी बहस करने लगता है, भीड़ इकट्ठा हो जाती है, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होता है और फिर पूरे देश में सवाल गूंजता है—आखिर Toll tax से किसे छूट मिलती है और किसे नहीं? टू-व्हीलर चलाने वाले क्यों कभी-कभी पैसे माँगे जाने की शिकायत करते हैं? और क्या सच में अगर 10 सेकंड से ज्यादा देरी हो जाए तो बिना पैसे दिए टोल पार किया जा सकता है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।!

यह सवाल आज हर उस भारतीय के मन में है, जो रोज़ाना टोल प्लाज़ा से गुजरता है। Toll tax हमारी ज़िंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन चुका है कि बिना इसके देश की सड़कें और हाईवे की कल्पना भी मुश्किल है। लेकिन इसकी जटिलता और नियम इतने उलझे हुए हैं कि अक्सर लोग अपने अधिकार और छूट को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। हाल ही में सेना के एक जवान और टोलकर्मियों के बीच हुआ झगड़ा इस बहस को और गर्मा गया। लोगों ने पूछा—क्या सेना को सच में छूट मिलती है? और अगर हाँ, तो किन शर्तों पर?

दरअसल, टोल टैक्स केवल पैसों की वसूली का खेल नहीं है, बल्कि यह भारत की सड़क व्यवस्था और आर्थिक ढांचे की रीढ़ है। हाईवे बनाने, पुलों और सुरंगों की देखभाल करने, नई सड़कें खड़ी करने और पूरी यातायात व्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए सरकार को पैसे चाहिए। यही पैसा Toll tax से आता है। यानी आप जब भी टोल पर कुछ सौ रुपये चुकाते हैं, वह सिर्फ़ एक रकम नहीं होती—वह उस सड़क की मजबूती और भविष्य में बनने वाली नई सड़कों के लिए योगदान होती है।

भारत में Toll tax का पूरा सिस्टम नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी NHAI देखती है। यही संस्था तय करती है कि कौन-सी सड़क पर कितना टोल लगेगा, कौन-से वाहन को छूट मिलेगी और किस परिस्थिति में टोल माफ़ होगा। यहाँ तक कि यह भी NHAI ही तय करती है कि किसे स्थायी पास मिलेगा और कौन लोग दूरी के हिसाब से छूट ले सकते हैं। लेकिन फिर भी हर दिन टोल प्लाज़ा पर विवाद देखने को मिलते हैं। वजह है—लोगों की अधूरी जानकारी और गलतफहमियाँ।

अब सवाल यह है कि Toll tax कैसे तय होता है? दरअसल यह कई कारकों पर निर्भर करता है। पहला है—वाहन का प्रकार। बड़ी गाड़ियाँ जैसे बसें और ट्रक छोटे वाहनों की तुलना में सड़क पर ज़्यादा दबाव डालती हैं, और उनकी वजह से सड़कों की हालत जल्दी खराब होती है। इसलिए उनसे ज़्यादा टोल वसूला जाता है। दूसरा है—लोड क्षमता। जो वाहन ज्यादा भार उठाते हैं, वे सड़कों को ज़्यादा नुकसान पहुँचाते हैं, इसलिए उन्हें भी ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं। तीसरा है—पैसेंजर कार यूनिट यानी PCU। जितने ज्यादा यात्री एक वाहन ले जा सकता है, उसके हिसाब से भी टोल तय किया जाता है।

यहाँ एक बड़ा भ्रम टू-व्हीलर को लेकर है। सोशल मीडिया पर अक्सर वीडियो आते हैं कि बाइक सवारों से भी टोल माँगा गया। जबकि हकीकत यह है कि भारत सरकार ने साफ नियम बना रखे हैं कि नेशनल हाईवे पर किसी भी टू-व्हीलर से टोल नहीं लिया जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि हर हाईवे NHAI के अधीन नहीं होता। जैसे यमुना एक्सप्रेसवे, जो दिल्ली-आगरा को जोड़ता है, वह YEIDA यानी Yamuna Expressway Industrial Development Authority के तहत आता है। ऐसे स्टेट हाईवे पर स्थानीय नियम लागू होते हैं और वहीं से भ्रम फैलता है।

अब आते हैं उस संवेदनशील सवाल पर जो हर देशवासी के दिल से जुड़ा है—सेना को छूट क्यों और कैसे? 1901 का Indian Road Tax Act कहता है कि ड्यूटी पर तैनात किसी भी सैनिक या सरकारी वाहन को Toll tax नहीं देना होगा। यानी अगर कोई जवान अपनी यूनिट की जीप या ट्रक में है और वह आधिकारिक ड्यूटी पर है, तो उससे पैसे नहीं लिए जा सकते।

यहाँ तक कि अगर सेना का पूरा काफ़िला गुजर रहा है, तो उसे भी टोल से छूट है। लेकिन अगर वही जवान छुट्टी पर घर जा रहा है, प्राइवेट कार में बैठा है या पर्सनल बाइक चला रहा है, तो उसे आम नागरिक की तरह टोल देना होगा। यही नियम है, जिसे लेकर अक्सर टोल प्लाज़ा पर गलतफहमियाँ और झगड़े होते हैं।

लोगों के बीच एक और मशहूर धारणा है—अगर टोल प्लाज़ा पर 10 सेकंड से ज्यादा देर हो जाए, तो टोल फ्री हो जाता है। यह आधा सच और आधा भ्रम है। सुप्रीम कोर्ट ने टोल प्लाज़ा पर लगने वाले लंबे जाम पर चिंता जताई थी और कहा था कि अगर लोगों को मिनटों तक रोका जाता है, तो यह अनुचित है। लेकिन 10 सेकंड का नियम कभी आधिकारिक तौर पर लागू नहीं हुआ। हाँ, NHAI ने यह ज़रूर कहा है कि वाहन को जितना जल्दी हो सके, टोल से पार कराया जाए और अगर भीड़ या गड़बड़ी से बहुत देर हो जाती है, तो लोगों को राहत दी जा सकती है।

हाल ही में सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है—GNSS आधारित टोल सिस्टम। इस सिस्टम के तहत अब FASTag के साथ-साथ सैटेलाइट से जुड़ा ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा। इसका फायदा यह होगा कि आपको रोज़ाना अपनी गाड़ी लेकर हाईवे पर जाना हो तो पहले 20 किलोमीटर तक टोल नहीं लगेगा। यानी जो लोग हाईवे के पास रहते हैं और रोज़ाना थोड़ी दूरी तय करते हैं, उन्हें राहत मिलेगी। 20 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करने पर ही Toll tax देना होगा। यही नहीं, अगर आपका घर टोल प्लाज़ा के नज़दीक है, यानी 20 किलोमीटर के भीतर, तो आपको भी टोल से छूट मिलेगी। लेकिन इसके लिए आधार कार्ड या स्थानीय पहचान दिखानी होगी।

टोल प्लाज़ा पर नियमों का पालन करना बेहद ज़रूरी है। अगर आपने FASTag नहीं लगाया है, तो आपको दुगुना जुर्माना भरना पड़ सकता है। कई राज्यों में तो इसका चालान भी काटा जाता है। अगर आपके GNSS सिस्टम में छेड़छाड़ पाई गई या आपने बिना पैसे दिए टोल पार करने की कोशिश की, तो सीधी कानूनी कार्रवाई होती है। टोलकर्मियों से बदसलूकी करना, झगड़ा करना या बूम बैरियर तोड़ना भी आपके खिलाफ केस दर्ज करवा सकता है। यानी टोल सिर्फ़ पैसे देने का मामला नहीं, बल्कि यह कानून और अनुशासन का हिस्सा है।

अब ज़रा सोचिए, टोल प्लाज़ा से हर दिन कितनी कमाई होती होगी? सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि जून 2025 तक देश में 1087 टोल प्लाज़ा काम कर रहे हैं। इनमें से 457 सिर्फ़ पिछले पाँच सालों में बने हैं। और इन सभी टोल प्लाज़ा से रोज़ाना औसतन 168 करोड़ रुपये वसूले जाते हैं। सालाना हिसाब लगाएँ तो यह रकम 61 हज़ार करोड़ से भी ज्यादा बैठती है। सोचिए, यही पैसा देश की नई सड़कों, पुलों और सुरंगों के निर्माण में लगता है।

Toll tax की यह कहानी हमें यही सिखाती है कि यह बोझ नहीं, बल्कि हमारे सफ़र को आसान बनाने की कीमत है। हाँ, इसमें पारदर्शिता और व्यवस्था लाने की ज़रूरत है ताकि आम आदमी को पता रहे कि उसका पैसा कहाँ और कैसे इस्तेमाल हो रहा है। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि लोग अपने अधिकार जानें—कब छूट है, कब नहीं, कौन-सा नियम लागू है और किस हालत में टोलकर्मी पैसे माँग सकता है।

क्योंकि टोल प्लाज़ा सिर्फ़ बैरियर और मशीनों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का प्रतीक है कि हमारी मेहनत से कमाया हुआ पैसा हमारी ही सड़कें बेहतर बनाने में लगेगा। और अगर इस भरोसे पर सवाल उठेंगे, तो सड़कें चाहे जितनी चौड़ी हों, दिलों के बीच का रास्ता हमेशा तंग ही लगेगा।

Conclusion

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