Tariff War में भी नहीं झुका भारत! ट्रंप के 5% आदेश के बाद भी मज़बूती से खड़ा हिंदुस्तान I

रात का वो वक्त था जब वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में हलचल थी। पत्रकारों को अचानक बुलाया गया, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दफ्तर से एक नया मेमो जारी हुआ। बाहर ठंडी हवाएं चल रही थीं, लेकिन इस कागज के टुकड़े ने हज़ारों भारतीय परिवारों की नींद उड़ा दी। ये कोई सामान्य प्रशासनिक नोटिस नहीं था, बल्कि एक ऐसा फैसला था जो सीधे भारत के लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित करने वाला था। जब भारी-भरकम Tariff और व्यापारिक धमकियों से भारत को झुकाया नहीं जा सका, तो ट्रंप ने एक नया रास्ता चुना—भारतीय छात्रों पर वार।

इस मेमो में लिखा था कि अब अमेरिकी विश्वविद्यालय अपने Graduate कोर्स में सिर्फ 15% अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ही जगह दे पाएंगे, और किसी एक देश से सिर्फ 5% छात्र ही। सुनने में ये नियम साधारण लगता है, लेकिन इसका असर गहरा है। क्योंकि इस 5% की दीवार से सबसे पहले टकराने वाले होंगे—भारतीय छात्र। वो छात्र जो सालों से अमेरिका के नामी विश्वविद्यालयों में पढ़ने का सपना देखते हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई, अपने माता-पिता की उम्मीदें, और अपने भविष्य का रास्ता इसी शिक्षा से जोड़ा है।

ट्रंप प्रशासन ने इस नियम को “अकादमिक एक्सीलेंस के लिए समझौता” का नाम दिया। लेकिन वास्तव में ये समझौता नहीं, बल्कि सज़ा जैसा था। सज़ा एक ऐसे देश के लिए जो अमेरिका के टैरिफ प्रेशर के सामने झुकने को तैयार नहीं था। भारत ने हाल ही में अमेरिकी दबाव में भी अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया। तेल रूस से खरीदा, व्यापार में अपने हितों की रक्षा की, और “दोनों के फायदे वाली डील” की बात पर अड़ा रहा। शायद इसी “अड़ियल रुख़” का बदला अब छात्रों के ज़रिए निकाला जा रहा था।

कल्पना कीजिए—हजारों भारतीय छात्र, जो GRE, TOEFL, या SAT की तैयारी में दिन-रात लगे हुए हैं, अचानक ये खबर सुनते हैं कि अब विश्वविद्यालय उनकी आवेदन पर दो बार सोचेंगे। कि अब उनके देश के लिए सिर्फ़ “5% स्लॉट” बचे हैं। किसी की आँखों में अमेरिका का सपना था—अब वही सपना धुंधला पड़ गया। वॉशिंगटन से आई ये खबर सिर्फ़ एक नीतिगत बदलाव नहीं थी, बल्कि उसमें छिपा था एक राजनीतिक संदेश—“हमारी शर्तों पर झुको, वरना हमारे दरवाजे धीरे-धीरे बंद हो जाएंगे।”

ट्रंप की टीम ने नौ बड़े विश्वविद्यालयों को मेमो भेजा—जिनमें कुछ ऐसे संस्थान भी थे जो भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा माने जाते हैं। इस मेमो में 10 बिंदु थे, जो दिखने में शिक्षा सुधार से जुड़े लगते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा था नियंत्रण का एक नया खेल। कहा गया कि विश्वविद्यालय तभी फेडरल फंडिंग यानी सरकारी मदद पाएंगे जब वे इन शर्तों का पालन करेंगे।

एक राजनीतिक संदेश

पहली शर्त—किसी भी देश से आने वाले छात्रों की संख्या 5% से अधिक नहीं होगी।

दूसरी—विदेशी छात्रों की “अमेरिकी और वेस्टर्न वैल्यूज़” के साथ तालमेल की जांच होगी।

तीसरी—विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके विभाग “रूढ़िवादी विचारों को नीचा न दिखाएं।”

यह आखिरी बिंदु ट्रंप की राजनीतिक सोच को बयां करता है—उन्होंने कई बार कहा था कि अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ “लिबरल माइंडसेट” को बढ़ावा देती हैं और पारंपरिक अमेरिकी मूल्यों को कमजोर करती हैं। अब इस मेमो के ज़रिए उन्होंने अपने वैचारिक एजेंडे को भी शिक्षा प्रणाली में उतार दिया।

लेकिन असली झटका उन परिवारों को लगा जो पिछले कई वर्षों से अमेरिका को अपने बच्चों के भविष्य का केंद्र मानते रहे। अमेरिका की यूनिवर्सिटीज़ में भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी अब तक 20% तक पहुँच चुकी थी। हर साल लगभग 2.6 लाख भारतीय छात्र अमेरिका में पढ़ने जाते हैं, और शिक्षा के नाम पर अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा अमेरिका भेजते हैं। ये सिर्फ़ पढ़ाई नहीं, बल्कि एक “सॉफ्ट पावर एक्सचेंज” भी था—जहां भारतीय दिमाग़ और अमेरिकी संस्थान, दोनों को फायदा होता था।

अब इस नए फ़रमान के बाद ये रास्ता सिकुड़ने लगा है। जिन कॉलेजों में भारतीय छात्रों का दबदबा था—जैसे NYU, Carnegie Mellon, Stanford या Purdue—उन्हें अब हर एडमिशन सीज़न में अपने कोटा को काटना पड़ेगा। कितनी अजीब बात है—एक तरफ़ अमेरिका में टेक्नोलॉजी कंपनियाँ भारतीय प्रतिभाओं पर निर्भर हैं, और दूसरी तरफ़ उसी देश का राष्ट्रपति उनके आने के रास्ते पर दीवार खड़ी कर रहा है।

लेकिन ट्रंप का यह कदम अचानक नहीं था। इसके पीछे महीनों की रणनीति थी। जब उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगाया, तो भारत ने जवाबी कदमों में अपने रुख़ को नहीं बदला। भारत ने कहा—“हम व्यापार में बराबरी चाहते हैं, झुकना नहीं।” और जब व्यापार से दबाव नहीं बना, तो शिक्षा का रास्ता चुना गया। क्योंकि ट्रंप समझते हैं कि भारत के युवा ही उसकी असली ताकत हैं, और अगर उनके सपनों में डर पैदा कर दो, तो शायद नीति भी बदल जाएगी। मेमो में आगे जो बातें लिखी थीं, उन्होंने शिक्षा जगत में तूफान ला दिया।

विश्वविद्यालयों को आदेश दिया गया कि वे हर छात्र का प्रवेश डेटा सार्वजनिक करें—उनके GPA, टेस्ट स्कोर, जाति, लिंग और राष्ट्रीयता के आधार पर। यह पारदर्शिता के नाम पर निगरानी थी। कहा गया कि अब हर छात्र को अनिवार्य रूप से SAT देना होगा, ताकि कोई भी “स्थानीय या विदेशी छात्र” विशेष लाभ न पा सके।

फिर लिखा गया—पाँच साल तक ट्यूशन फीस को फ्रीज करना होगा। यानी जो विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों से ज्यादा फीस लेकर अपने प्रोजेक्ट्स चला रहे थे, उनकी कमाई रुक जाएगी। और सबसे विवादास्पद बिंदु—जिन संस्थानों के पास प्रति छात्र 20 लाख डॉलर से अधिक का एंडोमेंट है, उन्हें “हार्ड साइंस” विषयों में छात्रों की ट्यूशन फीस माफ करनी होगी। यानी अब पैसा सिर्फ़ कुछ कोर्सेज़ में ही लगाया जाएगा, और विदेशी छात्रों के लिए रास्ता और कठिन होगा।

इन सारे नियमों का असर सबसे ज्यादा भारतीय छात्रों पर पड़ेगा, क्योंकि वे न केवल सबसे बड़ी विदेशी छात्र कम्युनिटी हैं, बल्कि तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में उनका दबदबा भी सबसे अधिक है। एक भारतीय छात्रा ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा—

“मैंने चार साल मेहनत की थी MIT में दाखिला पाने के लिए। अब डर है कि मेरा देश का कोटा भर चुका होगा, और मुझे सिर्फ़ इसलिए रिजेक्ट कर दिया जाएगा कि मैं इंडिया से हूं।” कई विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर भी इन शर्तों से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि ये शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा पर राजनीतिक नियंत्रण है। एक अमेरिकी डीन ने टिप्पणी की—“अगर हम तय करने लगें कि कौन-सा देश 5% से ज़्यादा छात्र नहीं भेज सकता, तो फिर हम वैश्विक विश्वविद्यालय नहीं, राष्ट्रीय अकादमी बन जाएंगे।”

लेकिन ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट किया कि जो भी विश्वविद्यालय इस “समझौते” पर हस्ताक्षर करेगा, उसे फंडिंग रिवॉर्ड मिलेगी। और जो मानेगा नहीं, उसके सरकारी फंड रोक दिए जाएंगे। यह सीधा दबाव था—या तो झुको, या फिर बजट गंवाओ।

भारत के लिए यह एक चेतावनी थी। पिछले एक दशक से भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका “ड्रीम डेस्टिनेशन” रहा है। हर साल लगभग 8 अरब डॉलर की रकम भारतीय परिवार अमेरिकी शिक्षा पर खर्च करते हैं। लेकिन अब यह सपना महंगा ही नहीं, बल्कि अनिश्चित भी हो गया है।

भारत में Education experts का कहना है कि यह समय है जब भारत को अपने ही विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर पर ले जाना चाहिए। अगर अमेरिका इस तरह के राजनीतिक निर्णय लेता रहा, तो “ब्रेन ड्रेन” को रोकना और “ब्रेन गेन” शुरू करना जरूरी होगा।

दिलचस्प यह है कि ट्रंप के इस कदम से अमेरिका की खुद की अर्थव्यवस्था को भी चोट लग सकती है। क्योंकि विदेशी छात्रों से मिलने वाली फीस अमेरिकी विश्वविद्यालयों की कुल आय का 15 से 20% हिस्सा होती है। और इसमें भारतीय छात्रों का योगदान सबसे बड़ा है। अगर यह वर्ग कम होता है, तो विश्वविद्यालयों के लिए फंडिंग और रिसर्च बजट पर असर पड़ेगा।

लेकिन शायद ट्रंप को इसका कोई अफसोस नहीं। उनके लिए यह राजनीतिक संदेश देने का मौका था। चुनावी मंचों पर वे बार-बार कहते आए हैं कि “अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अमेरिकियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।” यह वही सोच है जिसने H-1B वीज़ा फीस को कई गुना बढ़ाया, और अब शिक्षा के दरवाजे भी आधे बंद कर दिए।

भारतीय छात्रों के माता-पिता में गुस्सा है। कई लोग कह रहे हैं कि “हमारा बच्चा काबिल है, लेकिन ट्रंप की पॉलिटिक्स उसके रास्ते में दीवार बन रही है।” कुछ ने तो अपने बच्चों को यूरोप या ऑस्ट्रेलिया भेजने का फैसला कर लिया है।

भारत सरकार ने भी इस पर अप्रत्यक्ष प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने कहा—“भारत अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करेगा। हमें उम्मीद है कि अमेरिका शिक्षा को राजनीतिक हथियार नहीं बनाएगा।” लेकिन ट्रंप का प्रशासन इस वक्त किसी सुनने के मूड में नहीं है। उनका ध्यान सिर्फ एक बात पर है—“अमेरिका फर्स्ट।” और अगर उस रास्ते में भारतीय छात्र भी आते हैं, तो शायद उन्हें फर्क नहीं पड़ता।

यह फैसला अमेरिका-भारत रिश्तों में एक नया मोड़ है। जहां कभी शिक्षा और टेक्नोलॉजी ने दोनों देशों को जोड़ा था, अब वही पुल कमजोर पड़ता दिख रहा है। ट्रंप के समर्थक कहते हैं कि यह कदम अमेरिका की शिक्षा प्रणाली को “शुद्ध” करेगा, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह “आधुनिक युग का अकादमिक भेदभाव” है।

भारत में भी अब एक नई बहस छिड़ गई है—क्या हमें विदेशों पर इतना निर्भर रहना चाहिए? क्या भारत को अब अपने IITs, IIMs और निजी विश्वविद्यालयों को विश्व स्तर पर पहुंचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ताकि हमारे छात्रों को दुनिया में कहीं और दरवाजा बंद न मिले?

Conclusion

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