Singh Brothers की विरासत: Ranbaxy से शुरुआत, 500 करोड़ की जंग और टूटते साम्राज्य की पूरी कहानी I

एक वक्त था जब दिल्ली के पावर कॉरिडोर से लेकर ग्लोबल फार्मा मार्केट तक दो भाइयों का नाम लिया जाता था। रैनबैक्सी, फोर्टिस, रेलिगेयर—ये सिर्फ कंपनियां नहीं थीं, ये ताकत के symbols थे। लेकिन आज वही भाई एक-दूसरे के खिलाफ FIR, आरोप, कोर्ट और पुलिस की फाइलों में उलझे हुए हैं। डर इस बात का है कि क्या पैसा और पावर इंसान को अपनों का दुश्मन बना देता है? जिज्ञासा ये है कि आखिर 500 करोड़ रुपये के इस नए विवाद के पीछे असली कहानी क्या है? और सवाल ये कि एक समय देश की हेल्थकेयर इंडस्ट्री पर राज करने वाले Singh Brothers यहां तक कैसे पहुंच गए?

शिविंदर सिंह और मालविंदर सिंह। ये नाम कभी success और ambition की मिसाल हुआ करते थे। लेकिन आज ये नाम legal battles, contempt of court, fraud allegations और insolvency की कहानियों से जुड़े हुए हैं। इस बार विवाद फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजन ढाल चैरिटेबल सोसायटी को लेकर है, जो कागजों में भले ही “चैरिटेबल” हो, लेकिन आरोपों के मुताबिक इसके अंदर 500 करोड़ रुपये की संपत्ति और सालाना 30 करोड़ रुपये की कमाई का खेल छिपा है।

इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया, जब मालविंदर सिंह की पत्नी जापना सिंह ने गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि शिविंदर सिंह और उनकी पत्नी अदिति सिंह ने कथित तौर पर, फर्जी दस्तावेजों और साजिश के जरिए उन्हें और अन्य सदस्यों को सोसायटी से बाहर कर दिया। आरोप है कि मार्च 2025 में एक ऐसी मीटिंग दिखाई गई, जो असल में हुई ही नहीं, और उसी के आधार पर सोसायटी का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया गया।

जापना सिंह का दावा है कि इस कथित फर्जीवाड़े के बाद अदिति सिंह की दादी, मां और भाई को सोसायटी का सदस्य बना दिया गया, ताकि पूरा नियंत्रण परिवार के एक धड़े के पास आ जाए। आरोप ये भी है कि इसका मकसद वसंत कुंज में स्थित फोर्टिस राजन ढाल अस्पताल की, 500 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी और उससे होने वाली सालाना 30 करोड़ रुपये की आमदनी पर कब्जा जमाना था।

यही वजह है कि मामला अब सिर्फ पारिवारिक विवाद नहीं, बल्कि आर्थिक अपराध शाखा तक पहुंच चुका है। लेकिन इस झगड़े को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। बहुत पीछे। उस दौर में, जब Singh Brothers सिर्फ झगड़ों के लिए नहीं, बल्कि सपनों के लिए जाने जाते थे।

रैनबैक्सी की कहानी 1937 में शुरू होती है। दो चचेरे भाई—रणबीर सिंह और गुरबक्स सिंह—ने दवाओं के डिस्ट्रिब्यूशन का एक छोटा सा कारोबार शुरू किया। रणबीर के नाम के पहले अक्षर और गुरबक्स के नाम के आखिरी अक्षर मिलाकर बना—Ranbaxy। 1952 में यह कंपनी भाई मोहन सिंह को बेच दी गई।

यहीं से रैनबैक्सी की असली उड़ान शुरू होती है। भाई मोहन सिंह के बेटे परविंदर सिंह ने रैनबैक्सी को एक छोटे भारतीय ब्रांड से ग्लोबल फार्मा कंपनी बना दिया। अमेरिका और यूरोप तक पहुंच, जेनेरिक दवाओं में बड़ा नाम, और अरबों की वैल्यूएशन। परविंदर सिंह भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के सबसे सम्मानित नामों में गिने जाने लगे। लेकिन 2000 में उनके निधन के बाद कहानी ने एक नया मोड़ लिया।

परविंदर सिंह के दोनों बेटे—मालविंदर सिंह और शिविंदर सिंह—ने कंपनी की कमान संभाली। शुरुआत में सब कुछ सही लग रहा था। दोनों भाई युवा थे, ambitious थे, और उनके पास एक मजबूत legacy थी। लेकिन शायद यहीं से वो फैसले शुरू हुए, जिन्होंने आगे चलकर इस साम्राज्य की नींव हिला दी।

2008 में Singh Brothers ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने रैनबैक्सी में अपनी हिस्सेदारी जापानी कंपनी दाइची सांक्यो को करीब 9,576 करोड़ रुपये में बेच दी। उस वक्त ये डील भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी डील्स में से एक थी। बाहर से देखने पर लगा कि दोनों भाइयों ने शानदार exit किया है। लेकिन असली कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, बल्कि यहीं से शुरू हुई।

इस डील से मिले पैसों का इस्तेमाल कैसे हुआ, यही आगे चलकर विवादों की जड़ बना। करीब 2,000 करोड़ रुपये कर्ज और टैक्स चुकाने में गए। लगभग 1,700 करोड़ रुपये रेलिगेयर एंटरप्राइजेज में लगाए गए, जो उनकी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी थी। करीब 2,230 करोड़ रुपये फोर्टिस हेल्थकेयर में झोंक दिए गए। बाकी पैसा अलग-अलग Investments और खर्चों में चला गया। 2010 आते-आते हालात इतने बिगड़ गए कि दोनों भाइयों को रेलिगेयर के बोर्ड से बाहर कर दिया गया। ये सिर्फ एक कॉर्पोरेट झटका नहीं था, बल्कि उनके कंट्रोल के कमजोर पड़ने का संकेत था। लेकिन असली तूफान अभी बाकी था।

2012 में दाइची सांक्यो ने सिंगापुर के इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में अपील दाखिल की। आरोप लगाया गया कि Singh Brothers ने रैनबैक्सी डील के वक्त अहम जानकारियां छिपाईं। खासकर यह कि अमेरिका की FDA रैनबैक्सी की दवाओं की क्वालिटी को लेकर जांच कर रही थी। डील के कुछ ही समय बाद अमेरिका ने रैनबैक्सी की कई दवाओं के Import पर रोक लगा दी।

यहीं से दोनों भाइयों की आर्थिक हालत पूरी तरह डगमगा गई। कुल देनदारी करीब 13,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें फोर्टिस में अपनी हिस्सेदारी बेचनी पड़ी। जिस हेल्थकेयर साम्राज्य को उन्होंने बड़े सपनों के साथ खड़ा किया था, वही हाथ से निकलने लगा।

आंकड़े चौंकाने वाले हैं। करीब 10 साल के भीतर Singh Brothers ने लगभग 22,500 करोड़ रुपये गंवा दिए। पैसा गया, कंट्रोल गया, और धीरे-धीरे भरोसा भी। 2018 में दरार खुलकर सामने आ गई। शिविंदर सिंह ने अपने बड़े भाई मालविंदर सिंह पर उत्पीड़न, जालसाजी और कुप्रबंधन के आरोप लगाए और खुद को उनसे अलग करने की घोषणा कर दी।

भाई-भाई की ये लड़ाई अब पब्लिक हो चुकी थी। Investor, कर्मचारी और बाजार—सब देख रहे थे कि कभी एक साथ खड़े ये भाई अब एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। 2019 में हालात और बिगड़े। वित्तीय घोटाले के आरोपों में दोनों भाइयों को गिरफ्तार किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने दाइची केस में अवमानना का दोषी पाया।

वो नाम, जो कभी boardrooms में सम्मान से लिया जाता था, अब अदालतों में लिया जाने लगा। पिछले साल शिविंदर मोहन सिंह ने IBC कानून के तहत NCLT में खुद को दिवालिया घोषित करने के लिए आवेदन किया। यानी जिस व्यक्ति ने कभी हजारों करोड़ का साम्राज्य संभाला था, वो अब आधिकारिक तौर पर कह रहा था कि उसके पास कर्ज चुकाने की क्षमता नहीं है।

और अब, इसी बिखरी हुई कहानी में एक नया अध्याय जुड़ा है—फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजन ढाल चैरिटेबल सोसायटी का विवाद। अक्टूबर 2025 में जापना सिंह ने EOW में शिकायत दर्ज कराई। आरोप बेहद गंभीर हैं—आपराधिक साजिश, फर्जी दस्तावेज, आपराधिक विश्वासघात। पुलिस के मुताबिक, शिकायत में कहा गया है कि रिकॉर्ड में हेराफेरी कर सोसायटी के असली मेंबर्स को हटाया गया, और नए मेंबर्स को अवैध तरीके से जोड़ा गया। मकसद सिर्फ एक—पूरी सोसायटी और उससे जुड़े अस्पताल पर कब्जा।

ये मामला सिर्फ 500 करोड़ की प्रॉपर्टी का नहीं है। ये उस मानसिकता की कहानी है, जहां कभी एक साथ खड़े लोग अब एक-दूसरे को गिराने पर आमादा हैं। जहां चैरिटी के नाम पर बनी संस्था भी सत्ता और पैसे की लड़ाई का मैदान बन जाती है। Singh Brothers की कहानी हमें एक कड़वा सबक देती है। पैसा, पावर और विरासत अगर सही फैसलों और पारदर्शिता के साथ न संभाली जाए, तो वही सबसे बड़ा बोझ बन जाती है। रैनबैक्सी से लेकर फोर्टिस तक, और अब एक चैरिटेबल सोसायटी तक—ये गिरावट अचानक नहीं आई। ये सालों के फैसलों, गलत Investments और अंदरूनी संघर्षों का नतीजा है।

Conclusion

सोचिए… कभी भारत के हेल्थकेयर साम्राज्य पर राज करने वाले दो भाई, आज 500 करोड़ रुपये की जंग में आमने-सामने हैं। डर ये है कि पैसा, परिवार और भरोसा—तीनों एक साथ कैसे टूट गए? और जिज्ञासा यही कि आखिर Singh Brothers की लड़ाई खत्म क्यों नहीं हो रही? रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर शिविंदर और मालविंदर सिंह इस बार फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजन ढाल चैरिटेबल सोसायटी को लेकर भिड़े हैं। मालविंदर की पत्नी जापना सिंह का आरोप है कि, शिविंदर और उनकी पत्नी ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए उन्हें सोसायटी से बाहर कर दिया I

और वसंत कुंज स्थित फोर्टिस राजन ढाल अस्पताल—करीब 500 करोड़ की संपत्ति और 30 करोड़ सालाना कमाई—पर कब्जा कर लिया। कभी रैनबैक्सी, फोर्टिस और रेलिगेयर के मालिक रहे ये भाई दाइची सांक्यो केस, कर्ज, गिरफ्तारी और दिवालिया होने तक पहुंचे।

यह कहानी सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक बिखरते साम्राज्य की दर्दनाक दास्तान है।  अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।

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