एक छोटा सा घर। छत पर घूमता हुआ एक सीलिंग फैन। और उसी पंखे की कीमत तय करती है किसी परिवार की इज़्ज़त, किसी पिता का अंतिम संस्कार। डर इस बात का है कि क्या गरीबी इंसान से उसका सम्मान भी छीन लेती है। जिज्ञासा इस बात की है कि उसी घर की एक डेढ़ साल की बच्ची, जिसकी मां ने 170 रुपये में पंखा बेचकर पिता का अंतिम संस्कार किया था… वही बच्ची एक दिन 157 करोड़ की कंपनी की मालिक कैसे बन जाती है। यह सिर्फ success story नहीं है, यह survival, self-belief और destiny को दोबारा लिखने की कहानी है। और इस कहानी का नाम है Seema बंसल।
ग्वालियर की एक साधारण सी लड़की। पिता का साया डेढ़ साल की उम्र में ही सिर से उठ गया। घर में चार बच्चे। मां अकेली। हालात इतने खराब कि अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं। Seema खुद बताती हैं कि उनकी मां ने घर का एकमात्र ceiling fan 170 रुपये में बेच दिया, ताकि पिता का अंतिम संस्कार हो सके। सोचिए उस पल को… जहां पंखे की ठंडी हवा से ज्यादा जरूरी था सम्मानजनक विदाई। यह वो शुरुआत थी, जहां जिंदगी ने पहली बार उन्हें परखा।

Seema का बचपन आसान नहीं था। पिता के जाने के बाद उनकी मां ने संगीत सिखाकर घर चलाया। चार बच्चों को English medium स्कूल में पढ़ाना आसान नहीं था। फीस बढ़ती गई, खर्च बढ़ते गए। अंततः Seema को सरकारी स्कूल में डालना पड़ा। वहां का माहौल अलग था। भाषा अलग। दोस्त नहीं। सीमा छह महीने तक स्कूल ही नहीं गईं। शायद उन्हें लगा कि वे पीछे छूट गई हैं। लेकिन जब वे लौटीं, तो अपनी क्लास में टॉप किया। यह सिर्फ result नहीं था, यह एक संकेत था—हार मानना उनके खून में नहीं है।
कहते हैं जिनका मंजिल है आसमां, उन्हें रास्ता खुद बनाना होता है। Seema ने यही किया। बड़े होते-होते जिम्मेदारी का एहसास जल्दी हो गया। उन्होंने समझ लिया कि जिंदगी में कोई shortcut नहीं होगा। हर चीज़ खुद कमानी होगी।
समय बदला। Seema अपने भाई के साथ मुंबई आ गईं। उम्मीद थी कि मौसी के साथ रहकर कुछ स्थिरता मिलेगी। लेकिन वहां से साफ कह दिया गया—खुद काम ढूंढो। रहने के लिए जो मिला, वह एक टिन की झोपड़ी थी। गर्मियों में वह झोपड़ी भट्टी बन जाती थी। लेकिन यही भट्टी एक नई कहानी गढ़ रही थी।
Seema ने छोटे-मोटे काम किए। Survival mode में थीं। फिर एक दिन उन्हें एक IT company में नौकरी मिल गई। यह पहला बड़ा मोड़ था। Corporate दुनिया का दरवाजा खुला। मेहनत, discipline और adaptability ने उन्हें आगे बढ़ाया। कुछ ही समय में उन्हें London office में काम करने का मौका मिला। यह सपना था, लेकिन उन्होंने बिना हिचक “हाँ” कहा।
London… एक नया देश, नई संस्कृति, नई चुनौतियां। लेकिन Seema ने खुद को साबित किया। Corporate exposure मिला, global business culture समझ में आया। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक शख्स से हुई, जिनसे बाद में उन्होंने शादी कर ली। जिंदगी अब एक नए ट्रैक पर थी।
उनके पति अमेरिका चले गए। Wall Street, Empire State Building, तीन फ्लोर का ऑफिस, Bank of America जैसी नौकरी—यह सब किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है। Green card मिल गया। Business चल पड़ा। आर्थिक स्थिरता आ गई। ऐसा लगा कि अब जिंदगी ने पूरी तरह करवट ले ली है। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। एक दिन बिजनेस में भारी नुकसान हुआ। इतना बड़ा कि सब कुछ चला गया। ऑफिस, स्टेटस, comfort—सब। और फिर वापसी भारत की। यह वह पल था जहां बहुत लोग टूट जाते हैं। लेकिन Seema बंसल की कहानी टूटने की नहीं, फिर से बनने की है।
भारत लौटकर वे अपने देवर के साथ रहने लगीं। पति ने एक और बिजनेस में निवेश किया। Seema बेरोजगार थीं। उसी दौरान London में जो packaging catalog उनके घर आता था, वह उनके दिमाग में घूमने लगा। उन्होंने सोचा—क्यों न packaging business शुरू किया जाए। उन्हें इस इंडस्ट्री का कोई अनुभव नहीं था। यह largely male-dominated industry थी। लेकिन शायद उन्हें experience से ज्यादा विश्वास की जरूरत थी।
यहीं से शुरू हुई DCG Packs, जो बाद में DCG Tech Limited के रूप में विकसित हुई। शुरुआत एक छोटे desk से। कोई बड़ा office नहीं। कोई बड़ी टीम नहीं। Seema खुद driver भी थीं, salesperson भी, accountant भी और manager भी। हर छोटा-बड़ा काम उन्होंने खुद किया।
Packaging industry अपने आप में complex है। यह सिर्फ डिब्बा या कागज नहीं, बल्कि supply chain का अहम हिस्सा है। E-commerce के बढ़ते दौर में smart, sustainable और technology-driven packaging की मांग बढ़ी है। India में packaging market की growth rate लगातार बढ़ रही है। Estimates के मुताबिक Indian packaging industry 2020 के बाद double digit growth देख रही है, खासकर FMCG और online retail की वजह से।
Seema ने इसी opportunity को पहचाना। उन्होंने टिकाऊ और customized packaging solutions पर ध्यान दिया। धीरे-धीरे clients जुड़े। Quality और commitment ने reputation बनाई। आज उनकी कंपनी 50,000 से ज्यादा ग्राहकों को service देती है। भारत ही नहीं, UAE तक operations फैले हुए हैं।
157 करोड़ की कंपनी बनाना overnight संभव नहीं था। यह सालों की consistency, failure से सीख और strategic expansion का परिणाम है। Seema ने सिर्फ product नहीं बेचा, trust बेचा। Small businesses से लेकर large enterprises तक, उन्होंने scalable solutions दिए।
उनकी leadership style भी खास रही। उन्होंने खुद ground level से काम किया था, इसलिए हर employee की भूमिका समझती थीं। Financial discipline रखा। Expansion सोच-समझकर किया। Debt trap से बचने की कोशिश की। Market trends को समझा।
Packaging industry में innovation जरूरी है। Eco-friendly materials, biodegradable options, customized branding—ये सब modern demand का हिस्सा हैं। Seema की कंपनी ने technology integration पर भी ध्यान दिया। इससे operational efficiency बढ़ी और margin बेहतर हुआ।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे powerful हिस्सा पैसा नहीं है। वह mindset है। वह moment है जब एक मां ने पंखा बेचकर सम्मान बचाया, और एक बेटी ने उस सम्मान को करोड़ों में बदल दिया।
आज Seema बंसल सिर्फ entrepreneur नहीं, inspiration हैं। वे अक्सर कहती हैं कि जिंदगी में setbacks permanent नहीं होते। अगर foundation मजबूत हो—मेहनत, ईमानदारी और self-belief—तो हर गिरावट temporary है।
भारत में women entrepreneurship तेजी से बढ़ रही है, लेकिन challenges अभी भी हैं। Funding, societal bias, network gap—ये सब hurdles हैं। Seema की कहानी इन hurdles के बावजूद खड़े होने की कहानी है। उन्होंने prove किया कि background नहीं, belief मायने रखता है।
आज जब वे DCG Tech Limited की founder और Executive Director के रूप में बैठती हैं, तो शायद उन्हें वह ceiling fan याद आता होगा। वह पंखा जिसने एक दिन परिवार की असहायता का प्रतीक बनकर घर छोड़ा था। और आज उनकी कंपनी हजारों packaging solutions के जरिए लाखों घरों तक पहुंच रही है।
यह कहानी हमें बताती है कि गरीबी स्थायी पहचान नहीं होती। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, destiny rewrite की जा सकती है। लेकिन इसके लिए comfort zone छोड़ना पड़ता है, risk लेना पड़ता है, और गिरकर उठना पड़ता है।
जब कोई कहता है कि “मेरे पास resources नहीं हैं,” तो Seema बंसल की कहानी जवाब बनकर खड़ी हो जाती है। उनके पास भी resources नहीं थे। उनके पास सिर्फ जिम्मेदारी थी। और जिम्मेदारी ने उन्हें मजबूत बना दिया।
आज 157 करोड़ सिर्फ एक आंकड़ा है। असली मूल्य उस सफर का है। उस दर्द का है। उस resilience का है। और उस विश्वास का है जिसने एक छोटे desk से शुरू होकर international presence तक का रास्ता तय किया। शायद इसीलिए कहा जाता है—जिनका मंजिल है आसमां, उन्हें रास्ता खुद बनाना होता है। Seema बंसल ने रास्ता भी खुद बनाया, और मंजिल भी खुद चुनी। और यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है।
Conclusion
डेढ़ साल की बच्ची, पिता का साया उठ चुका है, और घर में इतने पैसे नहीं कि अंतिम संस्कार हो सके। डर ये कि अब जिंदगी कैसे चलेगी… और जिज्ञासा ये कि क्या ऐसे हालात से कोई करोड़ों की मालकिन बन सकता है? ग्वालियर की Seema Bansal की कहानी यहीं से शुरू होती है—जब उनकी मां ने घर का सीलिंग फैन 170 रुपये में बेचकर अंतिम संस्कार किया।
मुश्किलों में बीता बचपन, सरकारी स्कूल, अकेलापन… लेकिन हौसला नहीं टूटा। मुंबई की झोपड़ी से लेकर लंदन की नौकरी, फिर शादी, अमेरिका का सपना… और अचानक सबकुछ खत्म। बिजनेस में भारी नुकसान, ग्रीन कार्ड, ऑफिस—सब चला गया। भारत लौटकर, बिना पैसे और बिना अनुभव, एक छोटे से डेस्क से पैकेजिंग बिजनेस की शुरुआत हुई। आज वही कंपनी 157 करोड़ की है—DCG Tech Limited।
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