सोचिए… आप राशन की दुकान की लाइन में खड़े हैं। आपके आगे और पीछे खड़े लोग भी उसी दुकान से अनाज लेने आए हैं। सबके हाथ में एक छोटा सा कार्ड है। दिखने में सब एक जैसे लगते हैं, लेकिन जैसे ही दुकानदार कार्ड का रंग देखता है, पूरा व्यवहार बदल जाता है। किसी को सस्ता अनाज, किसी को मुफ्त राशन, और किसी को सिर्फ पहचान का काग़ज़। यहीं से एक डर पैदा होता है—क्या एक कार्ड का रंग तय करता है कि सरकार आपको किस नज़र से देखती है?
और जिज्ञासा ये कि आखिर आपके Ration card का रंग क्या-क्या बताता है आपकी ज़िंदगी के बारे में? राशन कार्ड सिर्फ एक सरकारी कागज़ नहीं है। ये भारत के करोड़ों लोगों के लिए survival का आधार है। National Food Security Act के तहत सरकार करोड़ों परिवारों को सस्ता या मुफ्त राशन देती है, ताकि कोई भूखा न सोए। लेकिन इस सिस्टम के अंदर एक ऐसा वर्गीकरण छुपा है, जो आपकी आर्थिक स्थिति, आपकी प्राथमिकता और आपके अधिकार तय करता है। और यही वर्गीकरण राशन कार्ड के रंग में दिखता है।
भारत में Ration card को पहचान पत्र की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है। कई जगह बैंक अकाउंट खुलवाने से लेकर सरकारी योजनाओं तक, राशन कार्ड मांगा जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके कार्ड का रंग सिर्फ डिजाइन नहीं, बल्कि एक संदेश है। एक ऐसा संदेश, जो सरकार और सिस्टम के बीच आपकी जगह तय करता है।
सरकार ने Ration card को अलग-अलग रंगों में इसलिए बांटा, ताकि जरूरतमंद और सक्षम लोगों के बीच फर्क किया जा सके। ये फर्क जरूरी भी था, क्योंकि संसाधन सीमित हैं और जरूरतें बहुत ज्यादा। लेकिन इस फर्क ने धीरे-धीरे रंगों को पहचान से ज्यादा “status” बना दिया।
सबसे पहले बात करते हैं गुलाबी या लाल Ration card की। कई राज्यों में इसे लाल कहा जाता है, कहीं गुलाबी। ये राशन कार्ड आमतौर पर गरीबी रेखा से ऊपर आने वाले परिवारों को दिया जाता है। यानी वो लोग, जो बहुत गरीब नहीं माने जाते, लेकिन पूरी तरह सक्षम भी नहीं होते। इस कार्ड के तहत व्यक्ति राशन ले सकता है, लेकिन पूरी तरह मुफ्त नहीं। उन्हें सामान्य दर या सब्सिडी वाली दर पर गेहूं, चावल और दूसरे जरूरी सामान मिलते हैं।
इस कार्ड का मतलब ये नहीं कि सरकार आपको गरीब नहीं मानती, बल्कि ये कि आपकी स्थिति “मध्यम” मानी जाती है। इस कार्ड के जरिए कई योजनाओं का रास्ता खुलता है। उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे लाभ कई बार इसी कार्ड के आधार पर मिलते हैं। यानी ये कार्ड बताता है कि आप सिस्टम के बीच में खड़े हैं—ना सबसे नीचे, ना सबसे ऊपर। लेकिन यहीं एक मनोवैज्ञानिक असर भी होता है। कई लोग खुद को BPL नहीं कहलाना चाहते, इसलिए गुलाबी या लाल कार्ड को “सम्मानजनक” मानते हैं। जबकि असल में फायदे की बात करें, तो ये कार्ड सीमित सुरक्षा देता है।
अब आते हैं पीले Ration card पर। ये कार्ड गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों को दिया जाता है। यही वो कार्ड है, जो सबसे ज्यादा मायने रखता है। इस कार्ड के तहत गेहूं, चावल, दाल, चीनी और कई जगह मिट्टी का तेल बेहद कम कीमत पर या मुफ्त मिलता है। यही वो कार्ड है, जो असली food security का प्रतीक बन चुका है।
पीले Ration card वाले परिवारों को ज्यादातर सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता दी जाती है। चाहे वो आवास योजना हो, पेंशन हो, छात्रवृत्ति हो या किसी आपातकालीन सहायता की बात। सरकार मानती है कि ये वर्ग सबसे ज्यादा vulnerable है। इसलिए इन तक मदद पहले पहुंचनी चाहिए। लेकिन इस कार्ड के साथ एक सामाजिक stigma भी जुड़ा है। कई लोग पीला कार्ड दिखाने में हिचकिचाते हैं। उन्हें लगता है कि इससे उनकी गरीबी उजागर हो जाएगी। यही विडंबना है—जो कार्ड सबसे ज्यादा सुरक्षा देता है, वही सबसे ज्यादा शर्म का कारण भी बन जाता है।
अब बात करते हैं सफेद Ration card की। सफेद कार्ड आमतौर पर उन लोगों को दिया जाता है, जो आर्थिक रूप से सक्षम माने जाते हैं। ये वे लोग होते हैं, जो सरकारी अनाज पर निर्भर नहीं हैं। इनके लिए राशन कार्ड अनाज लेने का जरिया नहीं, बल्कि पहचान और पते का प्रमाण होता है। सफेद राशन कार्ड से आपको मुफ्त या सस्ता राशन नहीं मिलता। लेकिन इसका इस्तेमाल कई जगह address proof या identity proof के तौर पर किया जाता है। कई सरकारी प्रक्रियाओं में सफेद राशन कार्ड स्वीकार किया जाता है। यानी ये कार्ड ये बताता है कि सरकार आपको self-sufficient मानती है।
लेकिन यहां भी एक सच्चाई छुपी है। कई लोग ऐसे हैं, जो वास्तव में सक्षम नहीं हैं, लेकिन कागजों में उनकी income ज्यादा दिखा दी गई है, इसलिए उन्हें सफेद कार्ड मिल गया। और फिर वो सरकारी मदद से बाहर हो जाते हैं। यही वजह है कि Ration card का रंग कई बार ground reality से मेल नहीं खाता।
कुछ राज्यों में एक और कैटेगरी देखने को मिलती है—अंत्योदय या विशेष कार्ड। ये कार्ड सबसे गरीब, बेसहारा और कमजोर वर्ग के लिए होता है। बुजुर्ग, विकलांग, विधवा, या ऐसे परिवार जिनके पास income का कोई स्थायी साधन नहीं। इस कार्ड के तहत बेहद कम कीमत पर ज्यादा मात्रा में राशन मिलता है। ये कार्ड सरकार की आखिरी सुरक्षा रेखा जैसा है।
Ration card के रंग का असर सिर्फ राशन तक सीमित नहीं है। ये रंग तय करता है कि आपको किस योजना में priority मिलेगी, किस scheme में आप eligible होंगे, और कहां आपका नाम सबसे पहले आएगा। कई बार disaster relief, मुफ्त गैस सिलेंडर, या special cash transfer में भी राशन कार्ड की कैटेगरी देखी जाती है।
अब सवाल ये है कि सरकार ये रंग तय कैसे करती है? इसके पीछे income criteria, परिवार की स्थिति, घर का प्रकार, बिजली का कनेक्शन, वाहन, और कई socio-economic indicators देखे जाते हैं। लेकिन ground level पर ये प्रक्रिया हमेशा perfect नहीं होती। कई जगह गलत सर्वे, अधूरी जानकारी या भ्रष्टाचार की वजह से गलत कार्ड जारी हो जाते हैं।
यही वजह है कि कई लोग सालों तक गलत कैटेगरी में फंसे रहते हैं। कोई गरीब होकर भी सफेद कार्ड रखता है, तो कोई सक्षम होकर भी पीले कार्ड का फायदा उठाता है। इस असंतुलन का असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है। आज के डिजिटल दौर में सरकार “One Nation One Ration Card” जैसे सुधार लेकर आई है।
इसका मकसद ये है कि आप देश के किसी भी हिस्से में जाकर अपने Ration card का इस्तेमाल कर सकें। लेकिन रंग की कैटेगरी अब भी बनी हुई है। यानी portability बढ़ी है, लेकिन वर्गीकरण वही है। राशन कार्ड का रंग आपको ये भी बताता है कि सरकार आपकी ज़िंदगी को किस lens से देख रही है। क्या आप welfare beneficiary हैं? क्या आप support system का हिस्सा हैं? या क्या आप self-reliant माने जाते हैं? ये सब एक छोटे से कार्ड में छुपा होता है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल उठता है। क्या किसी इंसान की पूरी ज़िंदगी, उसकी जरूरतें और उसकी जद्दोजहद सिर्फ एक रंग से तय की जा सकती है? क्या गरीबी और संपन्नता इतनी साफ रेखा में बंटी होती है? हकीकत ये है कि ज़िंदगी grey होती है, लेकिन सिस्टम उसे रंगों में बांट देता है। बहुत से परिवार ऐसे हैं, जो साल के कुछ महीनों में सक्षम होते हैं और कुछ महीनों में गरीब। किसान, दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यापारी—इनकी आय स्थिर नहीं होती। लेकिन राशन कार्ड का रंग स्थिर होता है। यही वजह है कि कई बार ये सिस्टम लोगों की वास्तविक हालत को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता।
फिर भी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि राशन कार्ड भारत की सबसे बड़ी social security schemes में से एक का आधार है। करोड़ों लोग आज भी इसी कार्ड की वजह से दो वक्त की रोटी खा पा रहे हैं। महामारी के दौरान, लॉकडाउन में, जब सब कुछ बंद था, तब यही कार्ड लोगों के लिए जीवनरेखा बना।
इसलिए अपने राशन कार्ड को हल्के में मत लीजिए। उसका रंग सिर्फ कागज नहीं, आपकी eligibility, आपके अधिकार और आपकी प्राथमिकता का संकेत है। अगर आपको लगता है कि आपका कार्ड आपकी मौजूदा आर्थिक स्थिति को सही तरीके से नहीं दिखाता, तो उसे अपडेट कराना जरूरी है। क्योंकि गलत रंग सिर्फ पहचान की गलती नहीं, बल्कि हक़ की चोरी भी हो सकती है।
आखिर में यही समझना जरूरी है कि राशन कार्ड का रंग आपको define नहीं करता, लेकिन सिस्टम में आपकी जगह जरूर तय करता है। और जब तक सिस्टम रंगों में सोचता रहेगा, तब तक हमें ये जानना जरूरी है कि हमारा रंग क्या कह रहा है। क्योंकि कभी-कभी, एक छोटे से कार्ड का रंग ही तय करता है कि आपकी थाली भरी होगी… या खाली।
Conclusion
सोचिए… आपके हाथ में एक छोटा सा राशन कार्ड, लेकिन अगर उसका रंग बदल जाए तो मुफ्त राशन, सस्ती अनाज योजना या सरकारी मदद—सब बदल सकता है। डर यही है कि कहीं आप अपने हक से वंचित तो नहीं? और जिज्ञासा ये कि राशन कार्ड का रंग आखिर बताता क्या है?
असल में राशन कार्ड सिर्फ पहचान नहीं, आपकी आर्थिक कैटेगरी का आईना है। पीला कार्ड गरीबी रेखा से नीचे वालों को मिलता है, जिसमें गेहूं, चावल, दाल, चीनी और मिट्टी तेल बेहद सस्ते दाम पर मिलते हैं और सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता भी। गुलाबी या लाल कार्ड गरीबी रेखा से ऊपर वालों के लिए होता है, जहां सामान्य दर पर राशन और उज्ज्वला, आवास जैसी योजनाओं का लाभ मिलता है।
वहीं सफेद कार्ड आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों को दिया जाता है, जो राशन पर निर्भर नहीं होते, लेकिन इसे पहचान और कुछ योजनाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है। मतलब साफ है—कार्ड का रंग, आपके हक की चाबी है। अगर हमारे आर्टिकल ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे शेयर करना न भूलें, ताकि यह महत्वपूर्ण जानकारी और लोगों तक पहुँच सके। आपके सुझाव और सवाल हमारे लिए बेहद अहम हैं, इसलिए उन्हें कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएं हमें बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
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