ज़रा सोचिए… वो दिन जब आप किसी कंपनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू देते हैं, दिल में उम्मीदें लिए, और फिर रिजेक्शन लेटर हाथ में आ जाता है। उस वक्त लगता है कि शायद किस्मत ने दरवाज़ा बंद कर दिया है। लेकिन क्या हो अगर सालों बाद, वही कंपनी आपको बुलाकर कहे—“अब ये दरवाज़ा सिर्फ़ तुम्हारे लिए खुला है”?
यही कहानी है Ragini Das की—एक ऐसी महिला की जिसने कभी गूगल का रिजेक्शन झेला, और आज उसी गूगल की “हेड ऑफ स्टार्टअप्स इंडिया” बन गई हैं। ये कहानी सिर्फ़ एक नौकरी की नहीं, बल्कि उस इंसान की है जिसने साबित कर दिया कि “रिजेक्शन एंड नहीं होता, बस कहानी का इंटरवल होता है।” आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
आपको बता दें कि Ragini Das का जन्म एक आम भारतीय परिवार में हुआ था। चेन्नई के चेट्टीनाड विद्याश्रम में पढ़ाई करने वाली इस लड़की के सपने कभी आम नहीं थे। जहां बाकी बच्चे बोर्ड एग्ज़ाम और कॉलेज की तैयारी में व्यस्त थे, वहीं रागिनी के मन में एक सवाल हमेशा गूंजता रहता था—“मैं कुछ अलग क्यों नहीं कर सकती?”
उनकी जिज्ञासा, उनकी ऊर्जा, और उनका आत्मविश्वास उन्हें हमेशा भीड़ से अलग बनाता था। इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने इंग्लैंड की Lancaster University में बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री लेने का फैसला किया। विदेश में पढ़ाई ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया। वहां उन्होंने देखा कि कैसे महिलाएं अपनी पहचान खुद गढ़ती हैं, और शायद वहीं से उनके भीतर यह बीज पड़ा कि एक दिन वो भी कुछ ऐसा करेंगी जो दूसरी महिलाओं को रास्ता दिखाएगा।
भारत लौटने के बाद रागिनी ने अपने करियर की शुरुआत की खोज शुरू की। साल था 2013—और दो बड़ी कंपनियों ने उनका ध्यान खींचा—Google और Zomato। उन्होंने दोनों में आवेदन दिया। Google का इंटरव्यू बहुत अच्छा गया, लेकिन आखिरी राउंड में नाम नहीं आया। वहीं Zomato ने उन्हें मौका दे दिया। ये फैसला शायद उस वक्त मामूली लगा हो, लेकिन यही से रागिनी की कहानी ने एक नया मोड़ लिया। उन्होंने Zomato में Sales और Growth के डिपार्टमेंट में काम शुरू किया।
छह साल… छह सालों में रागिनी ने वो सब सीखा जो किसी भी प्रोफेशनल के करियर की नींव बन सकता है। उन्होंने भारत से बाहर जाकर Zomato के इंटरनेशनल एक्सपेंशन पर काम किया, टीम बनाई, नए शहरों में लॉन्च किए, और ये समझा कि एक ब्रांड को जमीनी स्तर से खड़ा करने का मतलब क्या होता है। लेकिन इसके साथ उन्होंने ये भी महसूस किया कि कॉर्पोरेट दुनिया में महिलाओं के लिए कितनी चुनौतियाँ हैं। कितनी बार उनके विचारों को कम आंका जाता है, कितनी बार उनके आत्मविश्वास को टेस्ट किया जाता है। शायद यही अनुभव था जिसने उनके अंदर एक आग जलाई—कि एक दिन वो ऐसा प्लेटफॉर्म बनाएंगी जहां महिलाएं एक-दूसरे का सहारा बनेंगी, न कि Competitive।
साल 2020 आया—और इसी साल दुनिया ने रागिनी दास के नए रूप को देखा। उन्होंने अपने दोस्त और को-फाउंडर के साथ लॉन्च किया Leap club—एक ऐसा सोशल-प्रोफेशनल नेटवर्क जो खास तौर पर महिलाओं के लिए बनाया गया था। इसका मकसद था, महिलाओं को सिर्फ़ “नौकरी ढूंढने” का नहीं, बल्कि “नेतृत्व करने” का मौका देना। ये प्लेटफॉर्म बना—और हजारों महिलाएं उससे जुड़ गईं। स्टार्टअप, कॉरपोरेट, क्रिएटिव इंडस्ट्री—हर जगह से महिलाएं आकर इस क्लब का हिस्सा बनीं। रागिनी ने लिखा था—“Leap club ने मुझे एक उद्देश्य दिया, इसने मुझे पहचान दी।”
लेकिन एक स्टार्टअप चलाना उतना आसान नहीं जितना लगता है। फंडिंग, टीम मैनेजमेंट, ग्रोथ स्ट्रेटेजी, और लगातार बदलते डिजिटल लैंडस्केप—इन सबका सामना करते हुए रागिनी ने वो जज़्बा दिखाया जो एक असली लीडर में होता है। उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन हार नहीं मानी। फिर भी, जून 2024 में उन्होंने एक मुश्किल फैसला लिया—Leap club को बंद करने का। उनके लिए ये सिर्फ़ बिज़नेस बंद करना नहीं था, बल्कि एक अध्याय को खत्म करके नया पन्ना खोलना था।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा—“कभी-कभी रुकना जरूरी होता है ताकि हम फिर से अपने अंदर की आवाज़ सुन सकें।” Leap club के बाद उन्होंने खुद को समय दिया—यात्रा की, अपने डॉग के साथ वक्त बिताया, और अपने जीवन को नए सिरे से समझने की कोशिश की। ये वही वक्त था जब उन्हें एहसास हुआ कि उनका अनुभव, उनकी समझ, और उनका विज़न अब सिर्फ़ उनके लिए नहीं—बल्कि आने वाले सैकड़ों स्टार्टअप्स के लिए काम आ सकता है।
अगस्त 2024 में रागिनी को गूगल से कॉल आया। और इस बार, कहानी उलट गई। अब गूगल उन्हें रिजेक्ट नहीं कर रहा था, बल्कि बुला रहा था। और वो भी एक बेहद खास रोल के लिए—Head of Google for Startups India। ये वही कंपनी थी जिसने 2013 में उन्हें नहीं चुना था, और अब उसी ने उनके कंधों पर भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की ज़िम्मेदारी रख दी थी।
जब उन्होंने LinkedIn पर ये खबर साझा की, तो उन्होंने सिर्फ़ एक लाइन लिखी— “जहां से चले थे, वहीं पहुंच गए।” बस इस एक लाइन में 11 साल की मेहनत, संघर्ष, रिजेक्शन, और सफलता का पूरा सफर छिपा था।
गूगल में उनका नया रोल सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि एक मिशन है। अब वो भारत के उभरते स्टार्टअप्स को सही संसाधन, नेटवर्क, और गाइडेंस से जोड़ने का काम करेंगी। उनका लक्ष्य है—स्टार्टअप फाउंडर्स को ऐसे प्लेटफॉर्म से जोड़ना जहां वो सीख सकें, बढ़ सकें, और दुनिया के सामने अपनी पहचान बना सकें।
आज भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा है। हजारों युवा, नए-नए आइडियाज़ के साथ देश की तस्वीर बदल रहे हैं। और अब इस इकोसिस्टम की कमान एक ऐसी महिला के हाथ में है जिसने खुद उस रास्ते पर चलकर देखा है—जहां न फंडिंग आसान होती है, न एक्सपोजर, न भरोसा। रागिनी समझती हैं कि एक नए फाउंडर को किन चीज़ों की जरूरत होती है, क्योंकि वो खुद वहां से गुज़री हैं।
रागिनी दास की कहानी हमें ये सिखाती है कि करियर में हर रिजेक्शन के पीछे एक “रीडायरेक्शन” होता है। जब गूगल ने उन्हें रिजेक्ट किया था, तो शायद उन्हें Zomato भेजने के लिए। Zomato ने उन्हें लीडर बनने का मौका दिया ताकि वो Leap club बना सकें। और Leap club ने उन्हें वो अनुभव दिया जिससे वो अब गूगल में स्टार्टअप्स की गाइड बन सकें। यही तो “फुल सर्कल” है—जहां से चले थे, वहीं लौट आए, लेकिन अब पहचान बदल चुकी थी।
उनके सहयोगी कहते हैं कि रागिनी की सबसे बड़ी ताकत उनका “ह्यूमन टच” है। चाहे Zomato की सेल्स टीम हो या Leap club की कम्युनिटी—वो हमेशा सुनने और समझने वाली लीडर रही हैं। वो मानती हैं कि सफलता की असली कुंजी “नेटवर्किंग नहीं, बल्कि कनेक्शन” है। उनका कहना है—“लोग आपको नहीं, आपकी एनर्जी को याद रखते हैं। और अगर आपकी एनर्जी पॉज़िटिव है, तो दुनिया आपको अपने आप ढूंढ लेती है।”
गूगल के दफ्तर में जब वो अपने पहले दिन पहुंचीं, तो शायद उन्हें 2013 का वो दिन याद आया होगा जब वही कैंपस उन्हें बाहर का रास्ता दिखा चुका था। अब वही गलियारों ने उनका स्वागत किया, वही इंटरव्यू रूम अब कॉन्फ्रेंस हॉल में बदल गया था जहां लोग उनसे सवाल नहीं, बल्कि समाधान पूछ रहे थे।
रागिनी के इस नए सफर ने भारत की हजारों महिलाओं को प्रेरित किया है। वो अब सिर्फ़ एक एग्जीक्यूटिव नहीं, बल्कि एक प्रतीक हैं—कि अगर आप लगातार सीखते रहें, तो जिंदगी आपको वहीं वापस ले जाती है जहां कभी आपने हार मानी थी… बस इस बार आप विजेता बनकर लौटते हैं।
रागिनी अब FICCI की “वीमेन इन स्टार्टअप्स कमिटी” की चेयर भी हैं। वो चाहती हैं कि महिलाएं सिर्फ़ वर्कफ़ोर्स का हिस्सा न बनें, बल्कि वेंचर बिल्डर्स और इन्वेस्टर्स के रूप में भी उभरें। उनका मानना है कि “महिलाएं अगर एक-दूसरे को ऊपर उठाने लगें, तो समाज का ग्रोथ रेट दोगुना हो जाएगा।”
Conclusion
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