ज़रा सोचिए… जब भी भारत के भविष्य की तस्वीर खींची जाती है तो सबसे पहले हमारी आँखों के सामने क्या आता है? चमचमाते औद्योगिक कॉरिडोर, हज़ारों मशीनों से गूंजती फैक्ट्रियाँ, लाखों कामगारों का रोज़-रोज़ उत्पादन में जुटा होना और “मेक इन इंडिया” का चमकता हुआ सपना।
हमें बरसों से यह बताया गया है कि अगर भारत को चीन जैसी आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो हमें भी उसी के नक्शेकदम पर चलना होगा—यानी मैन्युफैक्चरिंग हब बनना होगा। लेकिन सोचिए अगर कोई कहे कि यह रास्ता अब बंद हो चुका है? और यह बात कोई आम व्यक्ति नहीं बल्कि दुनिया के टॉप अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले Raghuram Rajan और प्रसन्ना तांत्री कहें, तो यह सुनकर आप चौंकेंगे या सोच में पड़ जाएंगे? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
Raghuram Rajan, जो कभी भारत के रिज़र्व बैंक के गवर्नर रहे और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी आर्थिक समझ की मिसाल दी जाती है, उन्होंने साफ शब्दों में कहा—“मैन्युफैक्चरिंग के जरिए रोजगार सृजन का समय निकल चुका है।” उनके अनुसार भारत को अब अपने भविष्य की बुनियाद ब्रेन स्किल्स और इनोवेशन पर रखनी होगी।
और यही राय इंडियन स्कूल ऑफ बिज़नेस (ISB) के प्रोफेसर प्रसन्ना तांत्री ने भी रखी। उन्होंने न सिर्फ राजन की बात का समर्थन किया, बल्कि विस्तार से समझाया कि क्यों आज की दुनिया में छोटे और मध्यम स्तर की मैन्युफैक्चरिंग (SMEs) भारत के लिए टिकाऊ हल नहीं है।
प्रोफेसर तांत्री ने अपने तर्क को और स्पष्ट करते हुए कहा—“आज भी नीति निर्माता यह मानकर चल रहे हैं कि SMEs और मैन्युफैक्चरिंग नौकरियां पैदा करेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि रोबोटिक्स और ऑटोमेशन के इस युग में हाथ से किया गया product competitor नहीं रहा।
मशीनें इंसानों से तेज़, सटीक और सस्ती हैं। जब पूरी दुनिया रोबोटिक असेंबली लाइन पर काम कर रही है, तब भारत अगर हाथ से उत्पादन करेगा तो वह टिक ही नहीं पाएगा।” उनका सवाल बेहद सीधा और कड़ा था—“आप इस रोबो चीज़ से कब तक लड़ेंगे?”
उनकी बात में गहराई है। देखें तो पिछले 20 से 30 सालों में मैन्युफैक्चरिंग की दुनिया ही बदल गई है। पहले फैक्ट्रियों में हजारों मजदूर काम करते थे। लेकिन अब वही फैक्ट्री कुछ सौ रोबोट और टेक्नोलॉजी से चल रही है। यही कारण है कि ट्रेडेबल सेक्टर्स जैसे मैन्युफैक्चरिंग में नौकरियां घटती जा रही हैं। दूसरी ओर नॉन-ट्रेडेबल सेक्टर्स जैसे हेल्थकेयर, शिक्षा, पर्सनल सर्विसेज़, हॉस्पिटैलिटी, यहाँ नौकरियां ज़्यादा स्थिर हैं क्योंकि इन पर तकनीकी बदलाव का असर सीमित है।
तांत्री ने उदाहरण दिया—“30 साल पहले नाई बाल काटता था, आज भी वही करता है। काम वही है, मेहनत वही है और कर्मचारियों की ज़रूरत भी वही है। लेकिन अगर आप फैक्ट्री देखें तो वहाँ का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका है। पहले जो काम 1000 लोग करते थे, आज वही काम 100 रोबोट करते हैं।” यही वजह है कि Economist मानते हैं कि हमें असली नौकरियों की तलाश, नॉन-ट्रेडेबल सेक्टर्स और इनोवेशन सेक्टर में करनी होगी।
अब यहाँ सवाल उठता है—तो क्या “मेक इन इंडिया” जैसी योजनाएँ गलत हैं? प्रोफेसर तांत्री कहते हैं—“हम गलत दिशा में ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। हमारी प्राथमिकता ‘Make in India’ से बदलकर ‘InnoVate in India’ होनी चाहिए।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को PLI (Production Linked Incentive) की बजाय ILI (Innovation Linked Incentive) योजना शुरू करनी चाहिए। क्योंकि अगर हम प्रोडक्शन पर अटके रहेंगे तो दुनिया से पीछे रह जाएंगे। लेकिन अगर हम इनोवेशन पर फोकस करेंगे तो हम भविष्य की रेस में सबसे आगे हो सकते हैं।
याद करिए, चीन का मॉडल क्यों कामयाब हुआ। 1980 और 90 के दशक में जब चीन बढ़ रहा था, उस समय Globalization अपने सुनहरे दौर में था। दुनिया सस्ती चीज़ों की भूखी थी और चीन ने यह मौका भुनाया। उनके पास 50% तक की बचत दर थी, जिसे उन्होंने Investment में लगाया। उनके पास लाखों सस्ते मजदूर थे।
नतीजा—पूरी दुनिया का उत्पादन चीन से होने लगा और चीन “दुनिया की फैक्ट्री” कहलाने लगा। लेकिन भारत के पास न तो उतनी बचत दर है, न उतना Investment और न ही अब दुनिया वैसी है। भारत की बचत दर महज 30% है और वह भी गिर रही है। मजदूरी भी पहले जैसी सस्ती नहीं रही और अब दुनिया “सिर्फ सस्ता सामान” नहीं, बल्कि स्मार्ट और इनोवेटिव प्रोडक्ट चाहती है।
रघुराम राजन का तर्क भी बिल्कुल यही है। उनका कहना है—“हम चीन का रास्ता नहीं दोहरा सकते क्योंकि परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। हर देश अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ावा दे रहा है। अमेरिका “मेड इन अमेरिका” का नारा दे रहा है, यूरोप अपने उद्योग बचाने में जुटा है और चीन पहले से ही आगे है। ऐसे माहौल में भारत अगर पुराने मॉडल पर चलेगा तो हार निश्चित है।”

तो भारत को क्या करना चाहिए? राजन और तांत्री दोनों का मानना है कि भारत को अपनी I T और सर्विसेज़ की ताक़त को आधार बनाकर अगला कदम उठाना चाहिए। भारत पहले ही I T सर्विसेज़ में महाशक्ति है। इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो जैसी कंपनियों ने दुनिया का भरोसा जीता है। लेकिन अब वक्त है कि हम सिर्फ सर्विस न देकर अपने प्रोडक्ट्स और इनोवेशन पर भी ध्यान दें। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी, क्लाइमेट टेक, डीप टेक—यानी भविष्य की तकनीकों पर हमें दुनिया का नेतृत्व करना चाहिए।
प्रसन्ना तांत्री का कहना है कि इनोवेशन सिर्फ़ टैलेंट से नहीं, बल्कि इकोसिस्टम और क्लस्टरिंग से आता है। उन्होंने सिलिकॉन वैली का उदाहरण दिया। वहाँ जब 20 से 30 टॉप इनोवेटर्स एक जगह आए तो उनका असर उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं से कहीं बड़ा हुआ। भारत को भी वैसा ही माहौल बनाना होगा। उन्होंने कहा—“अगर हम दुनिया के टॉप 10 इनोवेटर्स को भारत में एक साथ ला सकें, तो यह किसी भी सरकारी योजना से कहीं ज़्यादा असरदार होगा।”
उन्होंने अरविंद श्रीनिवास (Founder, Perplexity A I) का उदाहरण दिया। वह भारतीय मूल के हैं लेकिन अमेरिका में हैं और ग्रीन कार्ड के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तांत्री ने कहा—“अगर हम ऐसे 10 लोगों को भारत लाकर सही माहौल दें तो भारत का भविष्य बदल सकता है।” उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में कई भारतीय इनोवेटर्स हैं जो वापस आना चाहते हैं, लेकिन भारत को उनके लिए आकर्षक माहौल बनाना होगा—आसान वीज़ा, रिसर्च फंडिंग, बेहतर स्टार्टअप इकोसिस्टम।
इस मॉडल को समझने के लिए हमें इज़राइल, ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को देखना चाहिए। इज़राइल “स्टार्टअप नेशन” कहलाता है, जहाँ हर साल हजारों स्टार्टअप जन्म लेते हैं। ताइवान आज पूरी दुनिया की चिप इंडस्ट्री पर काबिज है। दक्षिण कोरिया ने इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी में अपना नाम बनाया। ये सब छोटे देश हैं लेकिन इनोवेशन की ताक़त से वैश्विक महाशक्ति बने। भारत के पास तो इनसे कहीं बड़ी आबादी और टैलेंट है। सवाल सिर्फ़ सही दिशा का है।
भारत की सबसे बड़ी ताक़त हमारी युवा आबादी है। लेकिन अगर हमने उन्हें सिर्फ कारखानों का मजदूर बनाया तो वे मशीनों से हार जाएंगे। लेकिन अगर हमने उन्हें इनोवेशन और रिसर्च की ओर मोड़ा, तो यही युवा दुनिया को बदल देंगे। यही कारण है कि तांत्री और राजन दोनों जोर देकर कहते हैं कि हमें InnoVate in India का नारा देना चाहिए, न कि सिर्फ Make in India का।
Conclusion
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