Inspiring: Patanjali की पहचान पर सवाल — Ghee टेस्ट फेल होने से कैसे हिलने लगा भरोसे का साम्राज्य? 2025

रात के सन्नाटे में पिथौरागढ़ की एक इमारत में अभी भी हल्की-सी रोशनी जल रही थी। ज्यादातर ऑफिस बंद हो चुके थे, लेकिन एक लैब रूम में हलचल बढ़ती जा रही थी। जिस technician ने घी के सैंपल का टेस्ट किया था, उसके चेहरे पर घबराहट और हैरानी एक साथ साफ दिख रही थी। उसने अपनी फाइल उठाई, चश्मे को ठीक किया और धीरे-धीरे अपने senior officer के पास जाकर बोला—“सर… ये रिपोर्ट ज़रा देखिए।” अधिकारी ने कागज़ पकड़ा, कुछ सेकंड तक गहराई से पढ़ा और फिर अचानक उनकी भौंहें सिकुड़ गईं।

उन्होंने कागज़ टेबल पर रखा, खिड़की की तरफ देखा और लगभग फुसफुसाते हुए कहा—“ये कोई साधारण रिपोर्ट नहीं है… ये Patanjali का sample है। और ये फेल हो गया है।” बस… उसी पल से एक ऐसी कहानी की शुरुआत हुई जिसने कभी देश के सबसे बड़े, स्वदेशी ब्रांड माने जाने वाले पतंजलि की credibility पर सवाल खड़े कर दिए। यह सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं थी, यह उस भरोसे पर पहली गहरी चोट थी जिसके दम पर पतंजलि ने अपने सपनों का साम्राज्य खड़ा किया था।

जब ये खबर बाहर आई, तो सोशल मीडिया, न्यूज चैनल और लाखों भारतीयों में हलचल मच गई। लोग हैरान थे, नाराज़ थे और कुछ सवालों के जवाब ढूंढ रहे थे। क्योंकि मामला किसी छोटे ब्रांड का नहीं था, यह बात थी बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के उस ब्रांड की जिसे उन्होंने “India’s biggest Swadeshi revolution” कहकर स्थापित किया था।

Patanjali घी—वही प्रोडक्ट जिस पर लोगों ने आंख बंद करके भरोसा किया था, वही घी जिसे टीवी विज्ञापनों में पारंपरिक देसी विधि, गाय, संस्कृति और शुद्धता के संदेश के साथ दिखाया जाता था। और अब वही घी एक छोटे से जिले में हुए टेस्ट में फेल। सवाल उठना स्वाभाविक था—क्या ये testing की गलती थी? क्या lab सही नहीं था? या फिर ये ब्रांड के भीतर कुछ ऐसी cracks थीं जो अब बाहर दिखने लगी थीं?

ADM कोर्ट का फैसला साफ था। कंपनी पर 1.25 लाख का जुर्माना और distributor पर 15,000 का दंड। लेकिन इससे भी बड़ा twist तब आया जब पतंजलि ने तुरंत एक लंबी पोस्ट पब्लिश की और हर आरोप पर सवाल उठाए। कंपनी ने कहा कि जिस reference lab में दोबारा परीक्षण किया गया वह NABL से घी जैसे dairy products की testing के लिए approved ही नहीं थी, इसलिए पूरा procedure ही flawed है।

Patanjali ने ये भी कहा कि sample expiry date के बाद test हुआ, इसलिए वह legally invalid है। कंपनी ने इसे “घोर आपत्तिजनक” और “हास्यास्पद” तक कह दिया कि एक “sub-standard lab” ने उनके “best cow ghee” को खराब बताया। सोशल मीडिया पर इस official response ने बहस और भी तेज कर दी, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हुआ—अगर हर बार गलती lab की ही है, तो फिर हर कुछ महीनों में पतंजलि के किसी ना किसी product पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

यहीं से कहानी गहरी होने लगती है। आज अगर Patanjali किसी controversy में फंसती है, तो वो अकेली नहीं लगती—बल्कि पिछले कई सालों के विवादों की एक लंबी लाइन उसके साथ खड़ी दिखती है। कभी honey में purity को लेकर सवाल, कभी noodles में rules का उल्लंघन, कभी आयुर्वेदिक दवाओं पर misleading claims और कभी वैज्ञानिक तौर पर अपुष्ट दावे। लेकिन असली सवाल ये है कि ऐसा हुआ क्यों? क्या यह अचानक हुआ या धीरे-धीरे पनपती उस internal कमजोरी का नतीजा है जो अब सार्वजनिक रूप से सामने आ रही है?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा, उस दौर में जब Patanjali अपनी popularity के peak पर थी। 2015 से 2017 के बीच पतंजलि एक phenomenon बन चुका था। चाहे biscuit हो, shampoo हो, chyawanprash हो, toothpaste हो, noodles हों या फिर ghee—हर जगह पतंजलि का बोलबाला था। Indian middle-class को लगा कि decades से foreign brands का monopoly अब खत्म होगा और स्वदेशी कंपनियां अपनी जगह बनाएंगी।

भावनाएं तेज थीं, nationalism peak पर था, और पतंजलि ने इस wave को perfectly पकड़ लिया। इस दौर में ऐसा लगता था कि पचास साल में जो FMCG कंपनियाँ नहीं कर सकीं, वह पतंजलि पाँच साल में कर रही है। दुकानदार कहते थे कि पतंजलि का माल shelves से खुद उठकर बिक जाता है। यह success पूरी तरह consumers के trust पर खड़ी थी। और trust एक बार मिल जाए, तो business rocket की speed से उड़ता है—लेकिन वही trust अगर हिल जाए, तो empire धराशायी भी हो सकता है।

इसी success ने Patanjali को दो रास्तों पर खड़ा कर दिया—एक रास्ता था steady, scientifically validated, controlled expansion का। दूसरा रास्ता था तेज़ growth, aggressive ambition और हर category में पैर फैलाने का। पतंजलि ने दूसरा रास्ता चुना, और यहीं से cracks शुरू हुईं। पहला issue आया quality consistency का। जब demand अचानक skyrocket हो जाए और supply chain तैयार न हो, तो product की quality ही सबसे पहले प्रभावित होती है।

एक समय पर ऐसी शिकायतें आने लगीं कि soap जल्दी घुल जाता है, biscuit में fungus मिल रही है, honey में odd colour है, shampoo watery हो गया है, और कुछ लोगों ने तो घी की smell पर भी सवाल उठाए। देश के जिस हिस्से में stock की कमी होती, वहां सीधे कम quality वाले local manufacturers supply में घुस जाते और retailer नाम पतंजलि का बोलकर माल बेच देते। supply chain की कमजोरी का ये collateral damage था।

इसके बाद एक और बेहद बड़ा कारण सामने आया—brand dilution। Patanjali ने अपने core आयुर्वेदिक products के अलावा अचानक हर sector में कदम रखना शुरू कर दिया। कपड़े, jeans, shoes, paridhan showrooms, telecom, solar panels और फिर messaging app Kimbho। यह ऐसा था जैसे brand एक साथ 30 अलग-अलग रेसों में भाग रहा हो।

लेकिन सवाल ये है कि कौन सी कंपनी बिना research, बिना expertise और बिना deep technical infrastructure के इतने बड़े sectors में survive कर सकती है? Kimbho को “WhatsApp killer” कहा गया, पर launch के कुछ दिनों बाद ही privacy issues और technical bugs के कारण इसे वापस लेना पड़ा। Patanjali Paridhan store कुछ महीनों में खाली होने लगे। ऐसे random experiments ने core business का फोकस तोड़ दिया और brand की credibility को झटका दिया।

इसी बीच controversies और public statements ने भी पतंजलि की छवि को नुकसान पहुंचाया। पहले पतंजलि का मुख्य narrative योग, आयुर्वेद और स्वदेशी पर आधारित था। लेकिन धीरे-धीरे messaging aggressive और confrontational होने लगी। अलोपैथी बनाम आयुर्वेद की बहस unnecessary रूप से उछाली गई, कई बार scientific community से टकराव हुआ, और COVID के वक्त किए गए claims ने भी Patanjali को विवादों में खड़ा कर दिया।

एक brand जब अपनी communication strategy को positive से negative में बदलना शुरू करता है, तो उसका असर slowly trust पर पड़ता है। क्योंकि लोग सिर्फ product नहीं खरीदते, वे company का व्यवहार भी देखते हैं। और trust वहीं टूटता है जहाँ brand people से दूर होकर ego की तरफ झुकने लगता है।

और फिर आता है आज का मुद्दा—घी test में फेल होने का। Technical सवाल अपनी जगह हैं। Patanjali कहती है कि sample expiry के बाद test हुआ। यह भी कहती है कि testing parameters लागू ही नहीं थे। और यह भी दावा करती है कि lab खुद ही approved नहीं थी। इन दावों में कितनी सच्चाई है और कितनी technical loophole—यह legal experts और regulatory bodies तय करेंगी।

लेकिन consumer psychology एक अलग दुनिया है। वहाँ technicalities नहीं चलतीं। वहाँ सिर्फ perception चलता है। public को ये फर्क नहीं पड़ता कि lab approved थी या नहीं, sampling scientifically perfect थी या नहीं। उन्हें सिर्फ ये दिखता है कि एक product जिसकी purity advertise की जाती है, वह test में fail पाया गया। बस इतना ही trust को हिलाने के लिए काफी होता है।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या Patanjali अपनी credibility वापस पा सकती है? जवाब है—हाँ, बिल्कुल पा सकती है। पर यह आसान नहीं होगा। इसके लिए सबसे पहले brutal honesty की जरूरत है। कंपनी को अपनी internal processes को upgrade करना होगा, scientific validation को stronger बनाना होगा, quality labs को world-class बनाना होगा, supply chain को automate करना होगा और सबसे जरूरी—marketing को ego से निकालकर transparency में bring करना होगा। लोग आज भी swadeshi products को support करना चाहते हैं, लेकिन blind trust का era खत्म हो चुका है। आज consumer informed है, digital है, और पल भर में research कर सकता है।

Patanjali को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि market बदल चुका है। अब लोगों को सिर्फ emotional appeal नहीं चाहिए, उन्हें scientific assurance, consistent quality और clear communication चाहिए। अगर कंपनी इन pillars पर दोबारा focus करे, तो वह सिर्फ वापसी नहीं करेगी, बल्कि and भी stronger बनकर emerging global Ayurveda brands को टक्कर दे सकती है। लेकिन अगर controversies, hurried expansions और unfocused experiments जारी रहे, तो एक समय आएगा जब पतंजलि business schools में एक case study बनकर रह जाएगी—“How over-expansion and quality lapses damaged India’s biggest swadeshi brand.”

यह कहानी सिर्फ Patanjali की नहीं है, यह हर उस भारतीय company की कहानी है जो तेजी से growth के चक्कर में fundamentals को भूल जाती है। यह कहानी है trust की, जो बनता सालों में है और टूटता एक रिपोर्ट में। और यह याद दिलाती है कि brand बनाना आसान है, पर brand की credibility बनाए रखना सबसे कठिन युद्ध है।

Conclusion

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