सोचिए… सुबह का सूरज निकलता है, लेकिन किसी देश के करोड़ों घरों में दिन शुरू नहीं होता। वहां अलार्म नहीं बजते, स्कूल बसों का शोर नहीं होता, बच्चों के कंधों पर बैग नहीं टंगे होते। वहां बच्चे जागते हैं, लेकिन पढ़ने के लिए नहीं—काम करने के लिए। कोई ईंट उठाता है, कोई चूल्हे पर आग जलाता है, और कोई बहुत छोटी उम्र में ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोने लगता है। ये कहानी किसी एक गली या किसी एक शहर की नहीं है। ये कहानी है Pakistan की, जहां भविष्य धीरे-धीरे किताबों से दूर और अंधेरे के करीब जाता जा रहा है।
Pakistan अक्सर दुनिया की सुर्खियों में रहता है—कभी राजनीति के कारण, कभी आर्थिक संकट के कारण, कभी सुरक्षा मुद्दों के कारण। लेकिन इस बार जो सच्चाई सामने आई है, वो किसी बम या गोली से ज़्यादा खतरनाक है। क्योंकि ये सच्चाई इंसान की सोच, उसकी क्षमता और उसके भविष्य को खत्म कर देती है। ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि Pakistan की 63 प्रतिशत युवा आबादी कभी स्कूल ही नहीं गई। यानी हर दस में से छह युवा ऐसे हैं, जिन्होंने कभी क्लासरूम नहीं देखा, कभी ब्लैकबोर्ड पर लिखा अक्षर नहीं पढ़ा, कभी शिक्षक की आवाज़ नहीं सुनी।
ये सिर्फ एक नंबर नहीं है। ये एक पूरा सिस्टम फेल होने का सबूत है। युवा आबादी किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है। वही workforce बनती है, वही innovation लाती है, वही economy को आगे बढ़ाती है। लेकिन जब वही युवा पढ़े-लिखे ही न हों, तो वो ताकत नहीं, बोझ बन जाते हैं। और Pakistan इस वक्त उसी खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहां उसकी demographic strength धीरे-धीरे demographic disaster में बदल रही है।
इस संकट की गंभीरता यहीं खत्म नहीं होती। आंकड़े बताते हैं कि 23 प्रतिशत Teenager ऐसे हैं, जिन्होंने औपचारिक शिक्षा का दरवाज़ा तक नहीं खोला। Teenager वो उम्र होती है, जहां इंसान अपने भविष्य की नींव रखता है। लेकिन यहां नींव ही नहीं डाली गई। नतीजा ये है कि लाखों युवा समाज के हाशिये पर धकेल दिए गए हैं—ना उनकी गिनती होती है, ना उनकी आवाज़ सुनी जाती है।
सबसे चिंताजनक तस्वीर तब सामने आती है, जब हम महिलाओं की स्थिति को देखते हैं। 15 से 29 साल की उम्र की लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं। ये आंकड़ा सिर्फ education gap नहीं दिखाता, ये gender inequality की जड़ें दिखाता है। पुरुषों में भी हालत खराब है—लगभग 50 प्रतिशत पुरुष कभी स्कूल नहीं गए—लेकिन महिलाओं के लिए ये संकट कई गुना ज़्यादा गहरा है। एक लड़की के लिए शिक्षा सिर्फ किताबें नहीं होती, वो उसके आत्मसम्मान, उसकी आज़ादी और उसकी पहचान से जुड़ी होती है। और जब ये सब उससे छीन लिया जाता है, तो उसका पूरा जीवन सीमाओं में सिमट जाता है।
लड़कियों का स्कूल न जाना सिर्फ शिक्षा की कमी नहीं है। इसका मतलब है बेहतर नौकरी से वंचित रहना, स्वास्थ्य के बारे में जानकारी न होना, अपने अधिकारों को न पहचान पाना और समाज में बराबरी की हिस्सेदारी न मिल पाना। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे lifelong exclusion कहते हैं। यानी एक बार अगर शिक्षा छूट गई, तो उसके बाद ज़िंदगी के कई दरवाज़े अपने आप बंद होते चले जाते हैं।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर Pakistan में हालात इतने बदतर क्यों हैं। सबसे बड़ा कारण सामने आता है—आर्थिक तंगी। लगभग 75 प्रतिशत युवाओं ने बताया कि उन्होंने स्कूल इसलिए छोड़ा क्योंकि घर की आर्थिक हालत ने इसकी इजाज़त नहीं दी। कई परिवारों के लिए बच्चे को स्कूल भेजना एक luxury बन चुका है। किताबें, यूनिफॉर्म, फीस, ट्रांसपोर्ट—ये सब खर्च गरीब परिवारों के लिए भारी पड़ते हैं। और जब रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल हो, तो पढ़ाई सबसे पहले कुर्बान होती है।
गरीबी के साथ-साथ घरेलू जिम्मेदारियां भी एक बड़ा कारण बनती हैं। खासकर लड़कियों के लिए। छोटी उम्र से ही उनसे उम्मीद की जाती है कि वो घर संभालें, खाना बनाएं, पानी लाएं, छोटे भाई-बहनों और बुज़ुर्गों की देखभाल करें। ये सारा काम unpaid होता है, लेकिन समय और ऊर्जा दोनों खा जाता है। दिन खत्म हो जाता है, लेकिन लड़की के पास न पढ़ाई के लिए वक्त बचता है और न अपने लिए।
स्कूलों की भौगोलिक दूरी भी एक बड़ी समस्या है। कई इलाकों में नज़दीकी स्कूल बहुत दूर होते हैं। सड़कें खराब होती हैं, सार्वजनिक परिवहन सुरक्षित नहीं होता। माता-पिता डरते हैं, खासकर बेटियों को लेकर। ये डर धीरे-धीरे एक permanent decision बन जाता है—“अब स्कूल मत जाओ।”
और यही एक फैसला उस लड़की की पूरी ज़िंदगी की दिशा तय कर देता है। कम उम्र में शादी इस पूरी व्यवस्था पर आख़िरी चोट करती है। कई लड़कियों की औसत शादी की उम्र 18 साल पाई गई है। यानी स्कूल पूरा होने से पहले ही शादी। शादी के बाद शिक्षा की संभावना लगभग खत्म हो जाती है। नई जिम्मेदारियां, ससुराल का दबाव, बच्चों की देखभाल—इन सबके बीच किताबों के लिए कोई जगह नहीं बचती। एक पढ़ी-लिखी मां बनने का सपना वहीं दम तोड़ देता है।
लड़कों की कहानी थोड़ी अलग है, लेकिन दर्द उतना ही गहरा है। बहुत से लड़कों को बहुत छोटी उम्र में परिवार का सहारा बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। स्कूल छोड़कर काम पर जाना पड़ता है—चाहे वो construction site हो, खेत हो या कोई छोटा-मोटा कारखाना। दो-तिहाई लड़कों ने माना कि उन्हें कम उम्र से ही कमाने का दबाव महसूस हुआ। ये दबाव उन्हें शिक्षा से दूर और असुरक्षित, कम वेतन वाले कामों की तरफ धकेल देता है।
इसका असर सीधा रोजगार पर दिखता है। लगभग 75 प्रतिशत ऐसे युवा, जो स्कूल से बाहर हैं, उनके पास कोई भी paid job नहीं है। जिनके पास काम है भी, वो अस्थायी और असंगठित क्षेत्र में है। लंबे समय तक मेहनत करने के बावजूद उनकी Monthly income बहुत कम रहती है। न कोई job security होती है, न भविष्य की कोई गारंटी।
सबसे alarming सच्चाई ये है कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा युवाओं ने कभी किसी vocational या skill training program में हिस्सा नहीं लिया। यानी न उनके पास academic qualification है और न practical skills। ये double नुकसान है। ऐसे युवाओं के लिए formal economy में जगह बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
स्वास्थ्य की स्थिति भी उतनी ही चिंताजनक है। कुपोषण आम है, खासकर महिलाओं और बच्चों में। कई युवा पुराने दर्द, थकान और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। लेकिन इलाज तक पहुंच आसान नहीं है। अस्पताल दूर हैं, इलाज महंगा है और जागरूकता की भारी कमी है। मानसिक स्वास्थ्य को तो कई जगह गंभीर समस्या ही नहीं माना जाता।
“सब ठीक हो जाएगा” कहकर मुद्दा टाल दिया जाता है। जब एक देश की बड़ी आबादी बीमार, अशिक्षित और बेरोजगार हो, तो उसका असर सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। अपराध बढ़ता है, असंतोष बढ़ता है और extremist ideologies के लिए जमीन तैयार होती है। Frustrated youth सबसे आसान शिकार बनता है—किसी भी गलत रास्ते का।
यही वजह है कि ये संकट सिर्फ Pakistan का internal issue नहीं है। इसका असर पूरे region पर पड़ता है। Borders चाहे कितने भी मजबूत हों, instability की लहरें उन्हें पार कर ही जाती हैं। Education का संकट आखिरकार security और economy—दोनों पर भारी पड़ता है। सबसे दुखद बात ये है कि इस संकट का हल मौजूद है, लेकिन political will कमजोर है। शिक्षा में Investment का फायदा तुरंत नहीं दिखता। ये लंबे समय का काम है। और जब राजनीति short-term फायदे पर चलती है, तो education हमेशा पीछे छूट जाती है। स्कूल खोलना, teachers train करना, लड़कियों को सुरक्षित माहौल देना—ये सब मेहनत और commitment मांगता है।
अगर आज शिक्षा को प्राथमिकता दी जाए, अगर लड़कियों की पढ़ाई को सिर्फ नारा नहीं बल्कि नीति बनाया जाए, अगर skill training को स्थानीय रोजगार से जोड़ा जाए, तो तस्वीर बदल सकती है। लेकिन इसके लिए सोच बदलनी पड़ेगी। ये मानना पड़ेगा कि असली ताकत हथियारों में नहीं, classrooms में होती है। Pakistan आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे दो रास्ते जाते हैं। एक रास्ता वही पुराना है—बयानबाज़ी, टालमटोल और temporary fixes का।
दूसरा रास्ता कठिन है—education reform, social change और long-term vision का। सवाल ये है कि वो किस रास्ते को चुनेगा। अंधेरा अचानक नहीं आता। वो धीरे-धीरे फैलता है। पहले एक बच्चा स्कूल छोड़ता है, फिर दूसरा, फिर पूरा इलाका। और एक दिन पूरा देश खुद से पूछता है—“हम यहां कैसे पहुंच गए?” क्योंकि आखिर में देश GDP से नहीं, पीढ़ियों से बनते हैं। और अगर पीढ़ियां अंधेरे में पली-बढ़ी हों, तो भविष्य अपने आप धुंधला हो जाता है।
Conclusion
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