IMF का सहारा या सुधार का मौका? कर्ज़ की मोहब्बत या मजबूरी की सज़ा — पाकिस्तान और IMF के रिश्ते की पूरी कहानी। 2026

सोचिए एक ऐसा रिश्ता, जिसमें एक तरफ़ जीवनरेखा हो और दूसरी तरफ़ धीरे-धीरे दम घोंटती शर्तें। एक ऐसा रिश्ता, जहां हर मुलाक़ात के बाद राहत की सांस तो मिलती है, लेकिन कुछ ही महीनों में हालात और ज़्यादा बिगड़ जाते हैं। पाकिस्तान और International Monetary Fund, यानी IMF का रिश्ता कुछ ऐसा ही बन चुका है।

बाहर से देखने पर यह सिर्फ़ कर्ज़ और सुधारों की कहानी लगती है, लेकिन अंदर झांकिए तो यह एक पूरे देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उलझनों की दास्तान है। सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि पाकिस्तान IMF से बार-बार कर्ज़ क्यों लेता है, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या IMF के बिना पाकिस्तान जी सकता है, और IMF के साथ रहकर क्या वह सच में उबर पा रहा है?

आपको बता दें कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय जिस हालत में है, वहां IMF का नाम किसी फायर ब्रिगेड की तरह लिया जाता है। जब foreign currency reserves खतरनाक स्तर तक गिर जाता है, जब डॉलर की कमी से Import रुकने लगता है, जब सरकार को यह डर सताने लगता है कि कहीं देश डिफॉल्ट न कर जाए—तब IMF ही वह दरवाज़ा बन जाता है, जिस पर दस्तक दी जाती है। IMF से मिलने वाला कर्ज़ पाकिस्तान के लिए सिर्फ़ पैसा नहीं होता, बल्कि एक सिग्नल होता है कि दुनिया अब भी उस पर भरोसा कर रही है। इसी भरोसे के दम पर वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और दूसरे लेंडर्स भी आगे आते हैं।

लेकिन यही रिश्ता पाकिस्तान के भीतर सबसे ज़्यादा विवादास्पद भी है। पाकिस्तानी मीडिया, अर्थशास्त्री और पूर्व मंत्री अक्सर कहते हैं कि IMF की शर्तें देश को बचाने के बजाय उसे धीरे-धीरे तोड़ रही हैं। ‘द न्यूज़ इंटरनेशनल’ जैसे अख़बारों में छपे लेखों में इस रिश्ते को “managed destruction” तक कहा गया है। यानी एक ऐसा व्यवस्थित विनाश, जिसमें अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के नाम पर समाज की बुनियाद ही कमजोर होती जा रही है।

IMF के हर प्रोग्राम के साथ कुछ तय शब्द जुड़े होते हैं—austerity, fiscal discipline, structural reforms। सुनने में ये शब्द बहुत टेक्निकल और प्रोफेशनल लगते हैं, लेकिन ज़मीन पर इनका मतलब होता है महंगी बिजली, महंगा पेट्रोल, बढ़ते टैक्स और कम होती सरकारी सब्सिडी। पाकिस्तान में जब-जब IMF प्रोग्राम लागू हुआ, तब-तब आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ा। बिजली और गैस की कीमतों में भारी इज़ाफ़ा हुआ, जिससे न सिर्फ़ घरों का बजट बिगड़ा, बल्कि फैक्ट्रियों की लागत भी आसमान पर पहुंच गई।

ऊर्जा की बढ़ती लागत पाकिस्तान की इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुई। कई उद्योगपति कहते हैं कि जब बिजली और गैस की कीमतें अचानक दोगुनी-तिगुनी हो जाती हैं, तो स्थानीय उत्पादन इंटरनेशनल मार्केट में प्रतिस्पर्धा ही नहीं कर पाता। नतीजा यह हुआ कि पिछले पांच-छह सालों में पाकिस्तान का औद्योगिक ढांचा बुरी तरह कमजोर हुआ। कई सेक्टर्स में 50 प्रतिशत से ज़्यादा फैक्ट्रियां बंद होने की बातें सामने आईं। खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में सैकड़ों औद्योगिक इकाइयां ताले लगाकर बैठ गईं, जिससे हज़ारों लोगों की नौकरियां चली गईं।

पाकिस्तान का टेक्सटाइल सेक्टर, जो कभी उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था, वही सबसे ज़्यादा मार झेल रहा है। टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री से ही पाकिस्तान का बड़ा हिस्सा एक्सपोर्ट आता था। लेकिन बढ़ती लागत, घटती सब्सिडी और अनिश्चित नीतियों के कारण कम से कम 140 से ज़्यादा टेक्सटाइल मिलों के बंद होने की खबरें आईं। इसके साथ-साथ लाखों मज़दूर बेरोज़गार हुए और एक्सपोर्ट ऑर्डर्स बांग्लादेश, वियतनाम और भारत जैसे देशों की तरफ़ शिफ्ट होने लगे।

एक और बड़ा झटका पाकिस्तान को शिक्षा और मानव संसाधन के मोर्चे पर लगा है। IMF प्रोग्राम्स के दौरान सरकार को अक्सर शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर्स में खर्च सीमित करना पड़ता है, क्योंकि प्राथमिकता घाटा कम करने की होती है। इसका नतीजा यह हुआ कि स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ की हालत लगातार खराब होती गई। शिक्षा की गुणवत्ता गिरती चली गई और युवाओं को वह स्किल्स नहीं मिल पाईं, जो उन्हें ग्लोबल इकॉनमी में टिकने लायक बनातीं।

आज हालात यह हैं कि पाकिस्तान का एक्सपोर्ट, जो कुछ साल पहले 35 अरब डॉलर के आसपास था, वह घटकर करीब 30 अरब डॉलर पर आ गया है। यह गिरावट सिर्फ़ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि देश की उत्पादक क्षमता कमजोर हो रही है। जब एक्सपोर्ट नहीं बढ़ता, तो डॉलर नहीं आते। जब डॉलर नहीं आते, तो विदेशी कर्ज़ पर निर्भरता और बढ़ जाती है। और यहीं से IMF के साथ वह अंतहीन चक्र शुरू हो जाता है, जिससे पाकिस्तान निकल नहीं पा रहा।

इस पूरे समीकरण का सबसे दर्दनाक पहलू है ब्रेन ड्रेन और कॉरपोरेट पलायन। जब देश में अनिश्चितता बढ़ती है, तो सबसे पहले टैलेंट बाहर जाता है। पाकिस्तान से डॉक्टर, इंजीनियर, IT प्रोफेशनल और स्टार्टअप फाउंडर्स बड़ी संख्या में विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं। इसके साथ-साथ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भी या तो पाकिस्तान छोड़ रही हैं या अपनी मौजूदगी घटा रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट का 25 साल बाद पाकिस्तान से ऑपरेशन बंद करना सिर्फ़ एक कंपनी का फैसला नहीं था, बल्कि यह एक संकेत था कि निवेशकों का भरोसा टूट रहा है।

करीम, शेल, टेलीनॉर और प्रॉक्टर एंड गैम्बल जैसी कंपनियों के कदम पीछे खींचने से यह साफ़ हो गया कि, पाकिस्तान का बिज़नेस एनवायरनमेंट अब ग्लोबल कंपनियों के लिए उतना आकर्षक नहीं रहा। विदेशी निवेश घटने का सीधा मतलब है कम नौकरियां, कम टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और कम टैक्स रेवेन्यू। और जब रेवेन्यू कम होता है, तो सरकार फिर IMF के पास जाती है।

यहां एक दिलचस्प विरोधाभास है। एक तरफ़ पाकिस्तानी सरकार IMF को मजबूरी बताती है, और दूसरी तरफ़ वही IMF घरेलू राजनीति में एक खलनायक की तरह पेश किया जाता है। जब कर्ज़ मिलता है, तो सरकार राहत की सांस लेती है। लेकिन जब शर्तें लागू होती हैं और जनता पर बोझ बढ़ता है, तो IMF को दोषी ठहराया जाता है। इस ‘love and hate’ रिश्ते में दोनों एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं पाते और साथ रहकर भी चैन से नहीं रह पाते।

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि IMF की नीतियां अपने आप में पूरी तरह गलत नहीं हैं। समस्या यह है कि पाकिस्तान ने कभी भी इन प्रोग्राम्स को लॉन्ग-टर्म रिफॉर्म्स के मौके की तरह नहीं देखा। हर बार कर्ज़ लिया गया, आग बुझाई गई और फिर वही पुरानी गलतियां दोहराई गईं। टैक्स बेस बढ़ाने की बात होती है, लेकिन अमीर और ताकतवर तबके पर टैक्स लगाने की हिम्मत नहीं होती। सरकारी खर्च घटाने की बात होती है, लेकिन रक्षा और प्रशासनिक खर्च लगभग जस का तस रहता है।

अगर पाकिस्तान ने समय रहते शिक्षा, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन पर गंभीर निवेश किया होता, तो शायद आज तस्वीर अलग होती। कई विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान को प्राकृतिक संसाधनों, और सस्ते श्रम पर आधारित अर्थव्यवस्था से निकलकर नॉलेज-बेस्ड इकॉनमी की तरफ़ बढ़ना चाहिए था। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता, शॉर्ट-टर्म सोच और लगातार बदलती सरकारों ने किसी भी दीर्घकालिक रणनीति को पनपने नहीं दिया।

आज पाकिस्तान एक अस्तित्वगत संकट की स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। IMF के बिना उसके पास डॉलर नहीं हैं, और IMF के साथ उसकी अर्थव्यवस्था और समाज पर दबाव बढ़ता जा रहा है। यह एक ऐसा जाल है, जिसमें निकलने का रास्ता सिर्फ़ कर्ज़ से नहीं, बल्कि गहरे सुधारों से निकल सकता है। लेकिन सुधारों का मतलब होता है कठिन फैसले—और वही फैसले पाकिस्तान की राजनीति में सबसे मुश्किल साबित होते हैं।

आम जनता के लिए यह रिश्ता सबसे ज़्यादा पीड़ादायक है। महंगाई, बेरोज़गारी और घटती आय ने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी है। IMF की शर्तों पर मिलने वाला कर्ज़ भले ही देश को डिफॉल्ट से बचा ले, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी को और कठिन बना देता है। यही वजह है कि सड़कों पर विरोध प्रदर्शन होते हैं, सरकारें गिरती हैं और अस्थिरता और बढ़ जाती है।

आख़िर में सवाल वही है—पाकिस्तान और IMF का यह रिश्ता क्या कहलाए? यह न पूरी तरह प्यार है, न पूरी तरह नफरत। यह एक मजबूरी है, एक आदत है, और शायद एक चेतावनी भी। चेतावनी इस बात की कि अगर कोई देश बार-बार बाहरी सहारे पर निर्भर रहता है, और अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर नहीं करता, तो वह हमेशा इसी चक्र में फंसा रहेगा।

भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पाकिस्तान इस रिश्ते से क्या सीखता है। क्या वह IMF को सिर्फ़ एक आपातकालीन मदद के रूप में देखेगा, या फिर इसे अपनी अर्थव्यवस्था को रीसेट करने का मौका बनाएगा? अगर शिक्षा, उद्योग, निर्यात और गवर्नेंस पर गंभीर काम नहीं हुआ, तो यह ‘love and hate’ रिश्ता और भी कड़वा होता जाएगा। और तब शायद सवाल सिर्फ़ IMF का नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता का हो जाएगा।

Conclusion

भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पाकिस्तान इस रिश्ते से क्या सीखता है। क्या वह IMF को सिर्फ़ एक आपातकालीन मदद के रूप में देखेगा, या फिर इसे अपनी अर्थव्यवस्था को रीसेट करने का मौका बनाएगा? अगर शिक्षा, उद्योग, निर्यात और गवर्नेंस पर गंभीर काम नहीं हुआ, तो यह ‘love and hate’ रिश्ता और भी कड़वा होता जाएगा। और तब शायद सवाल सिर्फ़ IMF का नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता का हो जाएगा।

नौकरियां खत्म हो गईं। शिक्षा और इनोवेशन पर निवेश घटा, नतीजा यह कि युवा और कंपनियां देश छोड़कर जा रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट जैसी ग्लोबल कंपनियों का जाना इस संकट की गहराई दिखाता है। जहां IMF से पैसा मिलता है, वहीं उसकी नीतियां भविष्य कमजोर कर रही हैं। सवाल यही है—क्या पाकिस्तान इस “लव एंड हेट” रिश्ते से निकल पाएगा, या यही चक्र चलता रहेगा?

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