कल्पना कीजिए एक लड़का, जिसकी जेब में सिर्फ 1700 रुपए हों, और सामने अमेरिका जैसा विशाल सपना खड़ा हो। उसका ना कोई बड़ा बैकग्राउंड था, ना कोई तगड़ा नेटवर्क। बस थी तो केवल एक चीज़—हिम्मत। आज वही लड़का दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के CEO को पीछे छोड़ चुका है। जी हाँ, Nikesh Arora। एक ऐसा नाम, जिसने गाजियाबाद की गलियों से निकलकर सिलिकॉन वैली के आसमान तक उड़ान भरी और वहां भी सबसे ऊपर पहुंच गया। उनकी यह कहानी सिर्फ एक वित्तीय सफलता नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है कि सीमित साधनों के साथ भी असीम संभावनाओं को कैसे हकीकत में बदला जा सकता है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
2023 में वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दुनिया के सबसे ज़्यादा सैलरी पाने वाले CEO की सूची जारी की, और दूसरे नंबर पर Nikesh Arora का नाम चमक रहा था। उनकी कमाई थी 151 मिलियन डॉलर—यानी 1250 करोड़ रुपये से ज़्यादा। यह आंकड़ा एक मिसाल है उन लोगों के लिए जो सोचते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट दुनिया में भारतीयों की पहुंच सीमित है। यह सिर्फ धन का आंकड़ा नहीं था, बल्कि एक संघर्षशील भारतीय युवा की दृढ़ता और दूरदर्शिता का पुरस्कार था। यह साबित करता है कि अगर इरादा पक्का हो, तो असंभव शब्द शब्दकोश से मिटाया जा सकता है।
मेटा के मार्क जुकरबर्ग हों या गूगल के सुंदर पिचाई—इन दोनों को भी Nikesh Arora पीछे छोड़ चुके हैं। लेकिन उनके इस ‘अब’ से पहले एक लंबा ‘तब’ था, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है। और वही ‘तब’ ही इस कहानी को प्रेरणा बनाता है। वो दौर जब उन्होंने अमेरिका की धरती पर कदम रखा, जेब में सिर्फ सौ डॉलर, यानी 1700 रुपये थे। लेकिन दिल में था एक फौलादी इरादा—कि कुछ बड़ा करना है।
Nikesh Arora का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुआ था। एक साधारण परिवार में पले-बढ़े Nikesh Arora के पिता भारतीय वायु सेना में कार्यरत थे। उनका बचपन अनुशासन में बीता, पिता के तबादलों ने उन्हें अलग-अलग शहरों का अनुभव दिया, और इन्हीं जगहों पर रहते हुए उन्होंने बदलावों को सहजता से अपनाना सीखा। शायद यही गुण बाद में उन्हें दुनिया की सबसे तेज़ बदलती इंडस्ट्री—टेक्नोलॉजी—में टिकाए रख सका।
उन्होंने ‘द एयर फोर्स स्कूल’ से पढ़ाई की, फिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (IIT-BHU) से इंजीनियरिंग की डिग्री ली। मगर सपना यहीं रुकता नहीं था। उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने का निश्चय किया। लेकिन समस्या यह थी कि उनके पास पैसे नहीं थे। वो सिर्फ उन यूनिवर्सिटीज़ में आवेदन कर सके, जो एप्लिकेशन फीस माफ कर रही थीं। और किस्मत ने साथ दिया—उन्हें बोस्टन के नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी से छात्रवृत्ति मिल गई।
अमेरिका पहुंचने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ था, वो तो जैसे अभी शुरू ही हुआ था। कंप्यूटर साइंस पढ़ाने के लिए उन्हें जल्दी से कंप्यूटर साइंस सीखनी पड़ी। जो विषय उन्होंने पहले कभी ठीक से नहीं पढ़ा था, अब वही उनका जीविका बन गया। लेकिन वो नहीं रुके। बल्कि हर चुनौती को उन्होंने सीढ़ी बना लिया। अमेरिका की धरती पर उनकी हर सुबह नए सबक और हर रात अनिश्चित भविष्य के साथ गुजरती थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
1992 में ग्रेजुएशन के बाद उन्हें नौकरियों के लिए अप्लाई करना शुरू किया। और फिर शुरू हुआ रिजेक्शन का लंबा सिलसिला—400 से भी ज्यादा कंपनियों ने उन्हें नौकरी देने से इनकार कर दिया। लेकिन जो बात उन्हें खास बनाती है, वो यह है कि उन्होंने हर एक रिजेक्शन लेटर को संभाल कर रखा। वो कहते हैं कि वही उनकी असली प्रेरणा बने। यह उनकी सोच का परिचायक है—जहां अस्वीकृति सफलता की सीढ़ी बन जाती है।
आखिरकार, उन्हें एक मौका मिला—फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स में। एंट्री-लेवल जॉब से शुरुआत की, और फिर वहां से उनका करियर धीरे-धीरे चढ़ता गया। फिडेलिटी टेक्नोलॉजीज में वे वाइस प्रेसिडेंट बने, फाइनेंस में मास्टर्स की डिग्री ली, और साथ ही दुनिया का सबसे कठिन फाइनेंशियल सर्टिफिकेशन—CFA—भी पूरा किया। उन्होंने सिर्फ खुद को नहीं बदला, बल्कि अपने पूरे करियर की दिशा बदल दी।
और जब वो खुद CFA पढ़ाने लगे, तभी उन्हें एक नया दरवाज़ा खुलता दिखा—गूगल। 2004 में Nikesh Arora ने गूगल जॉइन किया। ये वही समय था जब गूगल IPO के लिए तैयार हो रहा था। उन्होंने उस कंपनी को अंदर से देखा, जो आने वाले समय की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी बनने जा रही थी। अगले 10 सालों में उन्होंने गूगल के रेवेन्यू को 2 बिलियन डॉलर से 60 बिलियन डॉलर तक पहुंचा दिया। इस सफर को वो खुद कहते हैं—“It was like riding a rocket ship.”
लेकिन 2014 में जब सब कुछ ऊपर की ओर जा रहा था, तब Nikesh Arora ने गूगल छोड़ने का फैसला किया। क्योंकि अब उन्हें एक नई चुनौती चाहिए थी। और वह चुनौती उन्हें मिली जापानी टेक दिग्गज—सॉफ्टबैंक में। वहां उन्होंने प्रेजिडेंट और COO की भूमिका निभाई। यहां भी उन्होंने कंपनी की दिशा बदलने में अहम योगदान दिया। लेकिन उनके सबसे बड़े फैसलों में से एक था—WeWork में Investment ना करना। उस समय सभी Investor उस स्टार्टअप के पीछे भाग रहे थे, लेकिन Nikesh Arora ने दूरदर्शिता दिखाई और उससे दूर रहे।
2016 में उन्होंने सॉफ्टबैंक को अलविदा कह दिया। कारण था—CEO मासायोशी सोन ने अपनी रिटायरमेंट टाल दी थी, और Nikesh Arora को यह लगा कि उनका इंतज़ार लंबा हो जाएगा। उन्होंने Risk लिया और आगे बढ़ गए। और यही Risk बाद में उनके जीवन की सबसे बड़ी उड़ान बन गया।
2018 में Nikesh Arora पालो ऑल्टो नेटवर्क्स के CEO बने। उस समय कंपनी की वैल्यू थी 18 बिलियन डॉलर। और 5 सालों में, उनके नेतृत्व में वही कंपनी 100 बिलियन डॉलर से भी ऊपर पहुंच गई। यह कोई मामूली छलांग नहीं थी—यह टेक्नोलॉजी के इतिहास में दर्ज की जाने वाली छलांग है। उन्होंने क्लाउड सिक्योरिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर डिफेंस जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक अधिग्रहण किए, और कंपनी को इनोवेशन की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
आज जब Nikesh Arora की सालाना सैलरी 150 मिलियन डॉलर पार करती है, तो यह केवल इनामी चेक नहीं है—यह उनके हर उस रिजेक्शन लेटर का जवाब है, हर उस रात का इनाम है जब उन्होंने लैपटॉप पर नई तकनीक सीखी, और हर उस दिन की पहचान है जब उन्होंने हार नहीं मानी।
उनकी कहानी सिर्फ एक सीईओ की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस भरोसे की, जो एक साधारण घर से निकल कर दुनिया के सबसे बड़े कॉर्पोरेट बोर्डरूम तक जाता है। यह कहानी है उस भारत की, जो सीमाओं से नहीं, सपनों से बनता है। और यह कहानी है हर उस युवा की प्रेरणा जो अपने पास सिर्फ 1700 रुपये लेकर भी करोड़ों का सपना देखता है।
Conclusion
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