क्या आप यकीन करेंगे कि एक ही जैसे जीडीपी वाले दो देशों में, एक देश में MBBS की पढ़ाई मात्र 4 लाख रुपये सालाना में हो रही है, और दूसरे देश में वही डिग्री पाने के लिए आपको 1 करोड़ रुपये तक चुकाने पड़ सकते हैं? यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि एक चुभती हुई सच्चाई है—और यह फर्क किसी छोटे देश के मुकाबले भारत जैसे विशाल देश में हो रहा है।
जब जोहो जैसी विश्व प्रसिद्ध टेक कंपनी के फाउंडर श्रीधर वेम्बु को यह पता चला कि, भारतीय छात्र वियतनाम जाकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं, और वह भी इतनी कम फीस में, तो उन्होंने सिर्फ हैरानी नहीं जताई—बल्कि इसे ‘शर्मनाक’ कहकर भारत की शिक्षा प्रणाली पर बड़ा सवाल उठा दिया। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
आपको बता दें कि वेम्बु की इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है—कि आखिर क्यों भारत जैसे देश में, जहां प्रति व्यक्ति आय वियतनाम जैसी ही है, वहां शिक्षा खासकर मेडिकल जैसी ज़रूरी पढ़ाई इतनी महंगी है? क्या यह केवल निजी कॉलेजों का लालच है या फिर सिस्टम की वह कमजोरी है जो दशकों से छात्रों के भविष्य का दम घोंट रही है?
श्रीधर वेम्बु ने X पर अपने पोस्ट में लिखा कि उन्होंने देखा कि भारतीय छात्र वियतनाम जा रहे हैं MBBS की पढ़ाई के लिए, जहां उन्हें सालाना मात्र 4 लाख रुपये फीस चुकानी पड़ती है। वहीं भारत में निजी मेडिकल कॉलेजों में यह फीस 60 लाख से 1 करोड़ रुपये तक है। उन्होंने सीधा सवाल उठाया—जब दोनों देशों की प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 4700 डॉलर है, तो भारत में पढ़ाई इतनी महंगी क्यों है?
इस सवाल के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है। भारत के कई हिस्सों—खासकर दक्षिणी राज्यों की प्रति व्यक्ति आय वियतनाम के बराबर या थोड़ी ही कम है। इसके बावजूद, हमारे कॉलेज एक आम व्यक्ति की सालाना कमाई के मुकाबले 10 से 20 गुना ज़्यादा फीस क्यों वसूलते हैं? वेम्बु का कहना है कि वियतनाम की फीस और वहां की जीडीपी के बीच संतुलन है, लेकिन भारत में ये संतुलन पूरी तरह बिगड़ा हुआ है। यही वजह है कि हज़ारों भारतीय छात्र चीन, रूस, यूक्रेन, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों में सस्ती मेडिकल शिक्षा पाने के लिए पलायन करते हैं।
सरकारी आंकड़ों से भी इस बात की पुष्टि होती है। साल 2019 में भारत में 499 मेडिकल कॉलेज थे, जो 2025 तक बढ़कर 780 हो गए। इसी तरह MBBS की सीटें 70,012 से बढ़कर 1,18,137 हो गईं। लेकिन इस बढ़ोत्तरी का फायदा हर किसी को नहीं मिला क्योंकि सीटें तो बढ़ी लेकिन फीस भी आसमान छूने लगी। निजी कॉलेजों के पास MBBS की लगभग 48% सीटें हैं, और वहां की फीस किसी आम मध्यमवर्गीय परिवार के सपनों को चूर-चूर कर देने के लिए काफी है।
fiscal year 2025 के आर्थिक सर्वेक्षण ने भी श्रीधर वेम्बु की बात को सही ठहराया है। इसमें साफ कहा गया कि मेडिकल शिक्षा की ऊंची लागत उन छात्रों को बाहर कर देती है, जो प्रतिभाशाली तो होते हैं लेकिन उनके पास संसाधन नहीं होते। देश में आज भी लाखों ऐसे छात्र हैं जो NEET परीक्षा में अच्छे अंक लाते हैं लेकिन सीट न मिलने पर, या फीस न चुका पाने के कारण डॉक्टर बनने का सपना अधूरा छोड़ देते हैं।
यही कारण है कि हर साल हज़ारों छात्र विदेश जाते हैं। वहां उन्हें कम फीस, कम प्रतियोगिता और कभी-कभी बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर मिलता है। लेकिन ये भी कोई आसान सफर नहीं होता। सबसे पहले NEET-UG परीक्षा पास करना होता है, फिर विदेश में कोर्स पूरा करना, उसके बाद भारत लौटकर FMG (Foreign Medical Graduates) परीक्षा पास करनी होती है और अंत में 12 महीने की अनिवार्य इंटर्नशिप करनी पड़ती है। यह पूरा सफर एक ऐसे युवा के जीवन के 6 से 7 साल खा जाता है, जो पहले ही आर्थिक बोझ और मानसिक दबाव से जूझ रहा होता है।
श्रीधर वेम्बु का सवाल सिर्फ फीस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की गैर-बराबरी को उजागर करता है। भारत में Medical education के अवसर भी भौगोलिक रूप से असमान हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश की 51% अंडरग्रेजुएट और 49% पोस्टग्रेजुएट सीटें सिर्फ दक्षिणी राज्यों में हैं। इसका मतलब यह है कि Eastern, Northern और North Eastern States के छात्र पहले से ही सीमित अवसरों के साथ संघर्ष कर रहे हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में भी यह असमानता साफ दिखती है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच डॉक्टरों का अनुपात 3.8:1 है। यानी शहरों में डॉक्टरों की संख्या ग्रामीण इलाकों की तुलना में लगभग चार गुना ज़्यादा है। और जब शिक्षा की पहुंच ही सीमित हो, तो गांवों और कस्बों में स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुधरेंगी? जब ग्रामीण इलाकों से आने वाला एक छात्र फीस के डर से मेडिकल की पढ़ाई छोड़ देता है, तो भविष्य में उसका गांव एक डॉक्टर से वंचित रह जाता है।
आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया कि मेडिकल शिक्षा को किफायती और समावेशी बनाने का अब भी मौका है। यदि हम शिक्षा की लागत को कम करें, तो न सिर्फ अधिक लोगों को डॉक्टर बनने का अवसर मिलेगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत भी घटेगी। जब डॉक्टर बनने में करोड़ों का खर्च होगा, तो वे भी अपनी सेवाओं की कीमत उतनी ही ऊंची रखेंगे। ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए इलाज कराना और भी मुश्किल हो जाएगा।
श्रीधर वेम्बु का यह कहना बिलकुल सही है कि हमें शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को समानता और न्याय के नजरिए से देखना होगा। अगर हम चाहते हैं कि हर गांव, हर कस्बे में एक डॉक्टर हो, तो हमें पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि हर प्रतिभाशाली छात्र को पढ़ाई का समान अवसर मिले। हमें यह भी देखना होगा कि मेडिकल कॉलेजों में सीटों का वितरण और फीस का ढांचा इस तरह से हो कि यह देश की आर्थिक हकीकत से मेल खाए।
सवाल उठता है कि आखिर क्यों भारत में मेडिकल कॉलेज खोलने और चलाने की लागत इतनी ज़्यादा बताई जाती है? क्या यह सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर या स्टाफ की सैलरी का मामला है? या फिर यह एक सुनियोजित उद्योग बन गया है, जहां शिक्षा नहीं बल्कि मुनाफा प्राथमिकता है? अगर वियतनाम जैसी इकॉनमी कम फीस में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकती है, तो भारत क्यों नहीं?
यह भी एक सच्चाई है कि भारत में मेडिकल कॉलेजों का संचालन करने के लिए भारी सरकारी मंज़ूरी और निरीक्षण की जरूरत होती है। लेकिन इस प्रक्रिया में भी भ्रष्टाचार और राजनीतिक प्रभाव की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कई बार कॉलेज मालिकों को नियमों के पालन के बजाय सिस्टम को ‘मैनेज’ करना पड़ता है, जिसका सीधा असर फीस पर पड़ता है। इसका खामियाजा छात्र और उनके परिवार भुगतते हैं।
आज जब भारत ‘विकसित भारत’ का सपना देख रहा है, तो क्या यह सपना अधूरा नहीं रह जाएगा अगर हमारा स्वास्थ्य सिस्टम कमजोर रहेगा? और क्या यह स्वास्थ्य सिस्टम मजबूत हो पाएगा जब तक डॉक्टर बनने की प्रक्रिया ही इतनी जटिल और महंगी होगी? सवाल सिर्फ शिक्षा की लागत का नहीं, बल्कि देश के भविष्य का है।
हर बार जब कोई छात्र किसी विदेशी मेडिकल कॉलेज में दाख़िला लेता है, तो वह भारत के सिस्टम पर एक वोट ऑफ नो-कॉन्फिडेंस डालता है। वह यह बताता है कि उसे अपने देश की व्यवस्था पर भरोसा नहीं। और जब हजारों छात्र यही करें, तो यह एक संकेत है कि सुधार की ज़रूरत बहुत बड़ी है।
श्रीधर वेम्बु का यह मुद्दा सिर्फ एक ट्वीट नहीं, बल्कि एक आईना है जिसमें हम सबको देखना चाहिए। ये सिर्फ MBBS की फीस नहीं, बल्कि भारत के शिक्षा तंत्र की पोल खोलती कहानी है—जहां सपनों की कीमत इतनी ज़्यादा है कि वो हकीकत बनने से पहले ही टूट जाते हैं। अब समय आ गया है कि हम इस पर चुप न रहें—बल्कि बदलाव की मांग करें। तभी शायद वो दिन आएगा जब भारत में भी एक आम छात्र बिना डरे, बिना उधार लिए, डॉक्टर बनने का सपना देख सके।
Conclusion
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