Maithili Thakur का कमाल! एक महीने की चौंकाने वाली कमाई और BJP का बड़ा मास्टरस्ट्रोक — बिहार की बेटी बनी राजनीति की नई आवाज़! 2025

ज़रा सोचिए… एक लड़की, जिसने अपने घर की मिट्टी में बैठकर गाना शुरू किया, आज उसी आवाज़ के दम पर करोड़ों लोगों के दिलों पर राज कर रही है। कभी यू-ट्यूब पर भजन गाने वाली यह लड़की आज बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ने जा रही है। और जब लोग यह सुनते हैं कि इस 25 साल की गायिका की एक महीने की कमाई कितनी है… तो हर कोई बस यही कहता है — “ये तो राजनीति नहीं, एक सुनियोजित मास्टरस्ट्रोक है!”

यह कहानी है Maithili Thakur की — बिहार की उस बेटी की, जिसकी आवाज़ ने भक्ति में भावना, और संगीत में संस्कार जोड़ दिए। लेकिन अब वही आवाज़ राजनीति की गूंज में बदल रही है। 14 अक्टूबर, 2025। दिल्ली के बीजेपी मुख्यालय में जब Maithili Thakur ने भगवा दुपट्टा ओढ़ा, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्य और उत्सुकता दोनों थीं। मीडिया कैमरों की फ्लैश चमक रही थी। और कुछ ही घंटों में, जब पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव की दूसरी सूची जारी की, तो उसमें एक नाम ने हर चर्चा को बदल दिया — “मैथिली ठाकुर, उम्मीदवार — अलीनगर विधानसभा सीट।”

लोगों के मन में सवाल उठा — क्या बीजेपी ने अब कला और संस्कृति के जरिए राजनीति का नया रास्ता खोल दिया है? क्या यह वही मैथिली हैं, जिनके भजन सुनकर लोग आंखें बंद करके शांति महसूस करते थे, अब वही जनसभाओं में नारे लगाएँगी?

लेकिन इस सवाल के पीछे एक गहरी रणनीति छिपी थी। बीजेपी ने यह कदम सिर्फ़ एक कलाकार को टिकट देने के लिए नहीं उठाया, बल्कि बिहार की उस भावनात्मक जड़ को छूने के लिए उठाया, जहाँ संगीत, संस्कार और श्रद्धा राजनीति से भी गहराई से जुड़ते हैं। Maithili Thakur कोई आम गायिका नहीं हैं — वह उस परंपरा की प्रतिनिधि हैं, जहाँ भक्ति और जनभावना साथ चलती है।

Maithili Thakur का जन्म 25 साल पहले बिहार के मधुबनी ज़िले के बेनीपट्टी गांव में हुआ था। बचपन से ही घर में संगीत की साधना थी। पिता रमेश ठाकुर खुद एक संगीत शिक्षक थे, जिन्होंने अपने बच्चों को संगीत सिखाने के लिए दिल्ली का रुख किया। परिवार साधारण था — लेकिन सपने असाधारण। मैथिली ने जब पहली बार मंच पर भजन गाया, तो लोग कहते हैं कि उसकी आवाज़ में “मिट्टी की महक” थी — वो सादगी, जो हर भारतीय दिल को छू जाए।

2017 में जब वह “राइजिंग स्टार” नामक सिंगिंग रियलिटी शो में नज़र आईं, तो देश ने पहली बार उस आवाज़ को सुना, जो एक साधारण गांव की बेटी से निकली थी, लेकिन उसमें एक दिव्य गूंज थी। भले ही वह शो नहीं जीत सकीं, लेकिन उन्होंने लोगों का दिल जीत लिया। उसी साल उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया, और यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर — जिसने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया बदली, बल्कि सोशल मीडिया पर “भक्ति संगीत” को एक नई पहचान दी।

आज Maithili Thakur के यूट्यूब चैनल पर 51 लाख से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं। उनके भजनों के वीडियो करोड़ों बार देखे जाते हैं। लोग सिर्फ़ सुनते नहीं, बल्कि भावविभोर हो जाते हैं। और जब इतने लोगों का आशीर्वाद जुड़ जाए, तो लोकप्रियता अपने आप राजनीति का रास्ता बन जाती है।

पर अब बात करते हैं उस पहलू की, जिसने हर किसी को चौंका दिया — Maithili Thakur की कमाई। आपको जानकर हैरानी होगी कि मैथिली ठाकुर भारत की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली युवा लोकगायिकाओं में से एक हैं। वह एक लाइव शो के लिए लगभग 5 से 7 लाख रुपए चार्ज करती हैं। महीने में वह 12 से 15 शो करती हैं — यानी उनकी कुल Monthly income 90 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक पहुंच जाती है।

इसके अलावा यूट्यूब और सोशल मीडिया प्रमोशंस से उनकी इनकम अलग है — लगभग 50 लाख रुपए प्रति माह। यानी कुल मिलाकर उनकी नेट वर्थ 10 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जाती है। सोचिए — एक कलाकार, जिसने अपने घर की चौखट से गाना शुरू किया, आज करोड़ों में खेल रही है। और अब वही चेहरा राजनीति में उतर रहा है। ऐसे में बीजेपी का यह दांव किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगता।

बीजेपी के लिए Maithili Thakur सिर्फ़ एक उम्मीदवार नहीं हैं — वह एक प्रतीक हैं। वह बिहार की उस युवा पीढ़ी का चेहरा हैं जो अपनी जड़ों से जुड़कर भी ग्लोबल पहचान बनाना जानती है। उनकी गायकी में संस्कार हैं, उनकी बातों में विनम्रता है, और यही कारण है कि उनके फॉलोअर्स केवल फैंस नहीं, बल्कि “भक्त” हैं — जो दिल से जुड़ते हैं। राजनीति में यह जुड़ाव सबसे बड़ी पूंजी होता है। और बीजेपी को यह भली-भांति पता है।

अलीनगर, जहाँ से उन्हें टिकट मिला है, दरभंगा ज़िले में पड़ता है। यह वही इलाका है, जो “मिथिला संस्कृति” का हृदय है। यहां की भाषा, लोकगीत, और परंपरा Maithili Thakur के नाम की तरह ही गूंजती है। बीजेपी को यहां से एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो लोगों के दिल को छू सके, और Maithili Thakur उस भावनात्मक जुड़ाव की परिपूर्ण मिसाल हैं।

लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वह राजनीति का अनुभव रखती हैं, तो उनका जवाब बिल्कुल सादगी भरा था — “मैं राजनीति खेलने नहीं आई हूं, मैं राजनीति में बदलाव लाने आई हूं। अगर मुझे अपने क्षेत्र की सेवा का अवसर मिला, तो इससे बड़ी बात नहीं होगी।”

यह बयान सुनते ही सोशल मीडिया पर तूफ़ान आ गया। कुछ ने कहा — “यह राजनीति का अध्यात्मिक चेहरा है,” तो कुछ ने कहा — “बीजेपी ने युवाओं और संस्कृति दोनों को साध लिया।”

दरअसल, Maithili Thakur की लोकप्रियता केवल यूट्यूब तक सीमित नहीं है। उन्होंने फेसबुक, इंस्टाग्राम, और लाइव इवेंट्स में भी बड़ा फैनबेस बनाया है। उनके गाए “राम भजन”, “शिव आराधना”, “कृष्ण भक्ति गीत” सिर्फ़ गाने नहीं, बल्कि भावनाओं का माध्यम हैं। और जब यह भावनाएँ राजनीति से जुड़ती हैं, तो परिणाम बहुत गहरे होते हैं।

उनका हर शो, हर वीडियो आज एक ब्रांड की तरह काम करता है। सिर्फ़ सोशल मीडिया विज्ञापन से वह महीने में 10 से 12 लाख रुपए कमाती हैं। उनकी टीम — जिसमें उनके भाई रिषभ और अयाचित ठाकुर भी हैं — उनके साथ संगीत प्रोडक्शन में हाथ बंटाते हैं। यह परिवार अब “थाकुर ब्रदर्स म्यूज़िक” के नाम से जाना जाता है। उन्होंने कई भाषाओं में गाने रिकॉर्ड किए हैं — मैथिली, भोजपुरी, हिंदी, संस्कृत, और यहां तक कि बंगाली में भी।

लेकिन राजनीति में आने का यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था। बताया जाता है कि पिछले एक साल से बिहार बीजेपी की टीम उनसे लगातार संपर्क में थी। पार्टी चाहती थी कि कोई ऐसा चेहरा सामने आए जो जनता के दिल से जुड़ा हो, विवादों से दूर हो, और महिलाओं और युवाओं दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हो। Maithili Thakur उन सभी मापदंडों पर खरी उतरती थीं।

और जब उन्होंने 14 अक्टूबर को बीजेपी का दामन थामा, तो दरभंगा से लेकर दिल्ली तक चर्चा का माहौल बन गया। राजनीति विश्लेषक इसे बीजेपी की “सॉफ्ट कल्चरल स्ट्रैटेजी” कह रहे हैं। यानी जब जनता की भावनाएँ किसी कलाकार से जुड़ जाती हैं, तो उसका प्रभाव चुनाव परिणामों तक पहुंचता है।

जैसे कभी उत्तर प्रदेश में हेमामालिनी, भोजपुरी में मनोज तिवारी, और अब बिहार में Maithili Thakur — पार्टी ने यह समझ लिया है कि संस्कृति और वोट, दोनों का संगम सबसे असरदार राजनीतिक संयोजन है। लेकिन Maithili Thakur केवल एक चुनावी चेहरा नहीं हैं। उनकी छवि एक ऐसी युवती की है, जिसने अपनी प्रतिभा से खुद के दम पर पहचान बनाई। न कोई गॉडफादर, न कोई बड़ी कंपनी — सिर्फ़ अपनी आवाज़, और अपने पिता का विश्वास।

आज जब वह मंच पर गाती हैं, तो लोग कहते हैं कि वह “लता मंगेशकर की सादगी और शारदा सिन्हा की आत्मा” का संगम हैं। और अब जब वही आवाज़ जनता के लिए बोलेगी, तो असर गहरा होना तय है। उनकी जीवनशैली भी उतनी ही सादगी भरी है। Maithili Thakur अक्सर पारंपरिक परिधान पहनती हैं — साड़ी, बिंदी, और खुले बालों के साथ। उनके वीडियो में कोई दिखावा नहीं होता। बस संगीत, भक्ति और मुस्कान। यही उनकी पहचान है — और यही उनके ब्रांड का आधार भी।

उनकी सफलता का एक बड़ा हिस्सा “डिजिटल इंडिया” का भी परिणाम है। 2017 में जहां उनका पहला वीडियो कुछ हज़ार व्यूज़ तक सीमित था, आज उनके हर गाने पर करोड़ों व्यूज़ आते हैं। उन्होंने अपनी आवाज़ को एक मिशन बना दिया — “भारतीय लोक संगीत को ग्लोबल बनाना।” और सच कहें तो वह इसमें सफल भी हुई हैं।

अमेरिका, यूके, कनाडा और नेपाल में बसे भारतीय समुदाय उनके लाइव शो के लिए लाइन लगाते हैं। उनकी फीस 5 से 7 लाख रुपए प्रति शो इसलिए भी है क्योंकि उनके शो सिर्फ़ संगीत नहीं — संस्कृति का अनुभव होते हैं।

लेकिन अब सवाल उठता है — क्या राजनीति में आने से उनकी यह छवि बदलेगी? लोग कहते हैं कि राजनीति कलाकारों को बदल देती है। पर Maithili Thakur का कहना है — “मेरा मंच अब बड़ा हुआ है, मेरी माइक अब जनता तक पहुंचेगी। मैं अब भी वही गाऊंगी — बस अब मेरे गीत सेवा के रूप में सुनाई देंगे।”

यह बयान दर्शाता है कि वह केवल एक उम्मीदवार नहीं, बल्कि एक संदेश लेकर आई हैं — राजनीति में भी संगीत की तरह समरसता होनी चाहिए। बिहार की राजनीति में यह कदम कई मायनों में बड़ा है। जहां एक ओर जातीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे चुनावों में हावी रहते हैं, वहीं मैथिली ठाकुर जैसे उम्मीदवार राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव और सकारात्मकता की नई लहर ला सकते हैं।

बीजेपी को उम्मीद है कि उनका यह कदम युवाओं, महिलाओं और संगीत प्रेमियों को एक साथ जोड़ देगा। आज जब बिहार की सड़कों पर उनके पोस्टर लगे हैं, तो लोग कहते हैं — “अबकी बार, भक्ति भी राजनीति में उतरी है।”

भविष्य क्या होगा, यह तो चुनाव बताएगा। लेकिन इतना तय है कि मैथिली ठाकुर का नाम अब केवल संगीत की दुनिया तक सीमित नहीं रहेगा। वह अब बिहार की राजनीति की नई आवाज़ हैं — एक ऐसी आवाज़ जो मंदिरों से निकलकर विधान भवन तक पहुंच रही है और शायद यही वह समय है जब देश को ऐसे नेताओं की ज़रूरत है, जो राजनीति में सिर्फ़ वादे नहीं, बल्कि संवेदना लेकर आएं।

Conclusion

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