ज़रा सोचिए… एक लड़का जो कभी रेडमंड की ठंडी सुबहों में माइक्रोसॉफ्ट के दफ्तर की ओर निकलता था, आज उसी लड़के का नाम भारतीय स्टार्टअप इतिहास की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में लिखा जा रहा है। वही लड़का जिसने अपनी आरामदायक नौकरी छोड़कर यह सोचने की हिम्मत की कि क्या भारत जैसे देश में लोग कभी चश्मे के लिए भी ब्रांड को चुनेंगे? क्या “देखना” भी कभी एक स्टाइल स्टेटमेंट बन सकता है? और आज, 15 साल बाद, जब Lenskart 9 अरब डॉलर की वैल्यूएशन के साथ शेयर बाज़ार में उतरने जा रही है — तो दुनिया उसी सवाल का जवाब तालियों से दे रही है।
पीयूष बंसल — यह नाम अब सिर्फ़ एक उद्यमी का नहीं, बल्कि एक युग का प्रतीक बन चुका है। वह युग, जिसने यह साबित कर दिया कि भारत सिर्फ़ उपभोक्ताओं का देश नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय ब्रांड्स का जन्मस्थान भी बन सकता है।
लेकिन यह कहानी इतनी सीधी नहीं थी। इसमें असफलता थी, अकेलापन था, जोखिम था, और वो दिन भी जब लगता था कि शायद ये सपना कभी साकार नहीं होगा। लेकिन कहते हैं — “जिसके पास विज़न हो, उसे चश्मे की ज़रूरत नहीं होती।” 2008 में, जब भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम आज जितना सक्रिय नहीं था, तब एक युवा इंजीनियर ने तय किया कि वह अपनी नौकरी छोड़कर कुछ ऐसा करेगा जो लोगों की ज़िंदगी बदल दे।
मॉन्ट्रियल की McGill University से पढ़ाई के बाद पीयूष ने अमेरिका में Microsoft में काम करना शुरू किया। टेक्नोलॉजी और डेटा की दुनिया उनके लिए नई नहीं थी। लेकिन कुछ सालों में उन्हें एहसास हुआ — असली समस्या लोगों के डिवाइस या डेटा में नहीं, बल्कि उनकी आंखों में है। भारत में करोड़ों लोग ऐसे थे जिन्हें नज़रों की समस्या थी, लेकिन उनके पास सही चश्मा खरीदने की सुविधा या पैसे नहीं थे। यह एक साधारण लेकिन गहरी समस्या थी — Vision Problem.
भारत में चश्मा खरीदना कभी आसान नहीं था। दुकानों में ब्रांडेड फ्रेम्स की कीमतें आसमान छूती थीं, और नॉन-ब्रांडेड प्रोडक्ट्स की क्वालिटी बेहद खराब। यहीं से पीयूष के दिमाग में विचार आया — क्यों न एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाया जाए जो हर व्यक्ति को उसकी पसंद और बजट के हिसाब से चश्मा उपलब्ध कराए, वो भी घर बैठे?
2010 में, कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने Lenskart की नींव रखी। उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटी सी ऑनलाइन वेबसाइट एक दिन भारत की सबसे बड़ी आईवियर रिटेल चेन बन जाएगी। शुरुआत में कंपनी पूरी तरह ऑनलाइन थी। ग्राहक वेबसाइट पर जाते, अपना नंबर डालते, और फ्रेम चुनते। लेकिन भारत जैसा देश जहाँ लोग हर चीज़ “हाथ लगाकर” खरीदते हैं, वहां केवल ऑनलाइन चश्मा बेचना आसान नहीं था।
इसलिए पीयूष ने एक और साहसिक कदम उठाया — Hybrid Model। यानी ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी। उन्होंने कहा, “ग्राहक को चश्मा सिर्फ़ दिखना नहीं चाहिए, महसूस भी होना चाहिए।” और यहीं से शुरू हुआ Lenskart का रिटेल सफर।
आज Lenskart के पास 2,700 से ज्यादा स्टोर्स हैं — भारत, सिंगापुर, दुबई, इंडोनेशिया और वियतनाम तक। कंपनी की करीब 40% कमाई भारत के बाहर से होती है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब सब कुछ दांव पर था। Investor पीछे हटने लगे थे, फंडिंग की कमी थी, और कई लोगों ने कहा — “चश्मे बेचकर कोई यूनिकॉर्न नहीं बनता।” पर बंसल ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा, “हम दुनिया को साबित करेंगे कि विज़न बिज़नेस में भी क्लैरिटी हो सकती है।”
2017 में जब कई भारतीय स्टार्टअप्स घाटे में चल रहे थे, Lenskart ने अपना बिज़नेस मॉडल बदल डाला। उसने Robotic Production Technology अपनाई — जर्मनी से मशीनें मंगाई गईं जो एक दिन में हज़ारों चश्मे तैयार कर सकती थीं। इससे न केवल प्रोडक्शन क्वालिटी बढ़ी, बल्कि डिलीवरी टाइम भी घटा। यहीं से Lenskart भारत की सबसे भरोसेमंद आईवियर कंपनी बन गई। ग्राहक अब जानते थे कि यह सिर्फ़ सस्ता ब्रांड नहीं, बल्कि High-Precision Quality देने वाला ब्रांड है।
और फिर आया 2020 का दौर — महामारी। जब पूरा देश लॉकडाउन में था, Lenskart ने उस समय भी अपने Home Eye Test प्रोग्राम के ज़रिए लाखों लोगों की मदद की। Trained Optometrist घर जाकर जांच करते, और कंपनी वर्चुअल ट्राई-ऑन टेक्नोलॉजी के जरिए ग्राहकों को चश्मे दिखाती। उस समय यह सुविधा एक वरदान साबित हुई। धीरे-धीरे, Lenskart एक बिज़नेस से बढ़कर एक ब्रांड बन गया — वो ब्रांड जिसने लोगों के चेहरे पर सिर्फ़ फ्रेम नहीं, आत्मविश्वास भी दिया।
लेकिन रास्ता आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में जब बंसल और उनकी टीम Investors से फंडिंग मांगते थे, तो उन्हें बार-बार मना कर दिया जाता था। किसी ने कहा — “भारत में चश्मे की मार्केट बहुत छोटी है।” किसी ने कहा — “यह स्केलेबल बिज़नेस नहीं।” लेकिन बंसल जानते थे कि एक दिन यही लोग लाइन लगाकर Investment करेंगे। और हुआ भी वही। जब Lenskart ने अपने पहले 100 स्टोर्स खोले और ऑर्डर रिकॉर्ड तोड़ने लगे, तब Investor खुद उनके दरवाज़े पर आए।
फरीदाबाद के छोटे से ऑफिस से शुरू होकर, आज कंपनी हैदराबाद में 50 एकड़ के नए मैन्युफैक्चरिंग हब का निर्माण कर रही है, जो हर साल लाखों जोड़ी चश्मे तैयार करेगा। इससे कंपनी की चीन पर निर्भरता भी घटेगी। फिलहाल करीब एक-तिहाई फ्रेम्स और पार्ट्स चीन से आते हैं, लेकिन आने वाले दो वर्षों में कंपनी “Make in India” मॉडल की ओर शिफ्ट करने की योजना बना रही है।
Lenskart का यह विस्तार सिर्फ़ व्यापारिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है — क्योंकि बंसल भारत को आईवियर मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बनाना चाहते हैं। विदेशों में, खासकर इंडोनेशिया और वियतनाम में, कंपनी तेजी से बढ़ रही है। इन देशों में चश्मों की मांग भारत जैसी ही है, और Lenskart अपने “affordable luxury” मॉडल के ज़रिए वहां भी क्रांति लाने की तैयारी में है।
2025 में कंपनी ने इतिहास रच दिया। 15 साल बाद, Lenskart ने अपना IPO लाने की घोषणा की, जिसकी वैल्यूएशन लगभग 9 अरब डॉलर आंकी गई। पीयूष बंसल, जो कभी 2 लाख रुपए महीने की नौकरी करते थे, अब अरबपति बनने के कगार पर हैं। अनुमान है कि अपने शेयरों का छोटा हिस्सा बेचकर वो करीब 6,500 करोड़ कमा सकते हैं।
अगर लिस्टिंग प्रीमियम 25% तक जाती है, तो उनका नेटवर्थ 90 अरब रुपये तक पहुंच सकता है। इस IPO ने न सिर्फ़ Investors को, बल्कि भारतीय स्टार्टअप जगत को फिर से उम्मीद दी है कि मेहनत और धैर्य से बना बिज़नेस, वक्त आने पर अपना सोना दिखाता है।
कंपनी के Investors की लिस्ट देखें तो उसमें— SoftBank, Premji Invest, Temasek, Alpha Wave Global, Kedara Capital — ये सब दुनिया के दिग्गज Investor हैं, जिन्होंने पीयूष के विज़न पर भरोसा किया। SoftBank, जिसके पास कंपनी की करीब 15% हिस्सेदारी है, ने इसे “patient capital” कहा — यानी ऐसा Investment जो धीमे-धीमे लेकिन स्थायी मुनाफे में यक़ीन रखता है।
Lenskart ने हाल ही में मार्च 2025 में अपना पहला वार्षिक मुनाफा दर्ज किया, जबकि कई अन्य स्टार्टअप्स घाटे में डूबे थे। यह कंपनी अब भारत की consumer-tech success story बन चुकी है। दिलचस्प बात यह है कि Lenskart सिर्फ़ व्यापार नहीं, बल्कि innovation की प्रयोगशाला बन गई है। कंपनी की 70 सदस्यीय इंजीनियरिंग टीम अब “Smart Eyewear” पर काम कर रही है — ऐसे चश्मे जिनमें AI features, UPI पेमेंट, कैमरा और हेडफोन शामिल होंगे। कल्पना कीजिए, आपका चश्मा ही आपका मोबाइल असिस्टेंट बन जाए — यह वही भविष्य है जिस पर पीयूष काम कर रहे हैं।
कंपनी के पास पहले से ही हजारों कर्मचारियों की टीम है, और हर हफ्ते औसतन 10 लाख से ज्यादा ऑर्डर्स प्रोसेस होते हैं। Lenskart अब सिर्फ़ एक कंपनी नहीं, बल्कि भारत की vision revolution बन गई है। बंसल का कहना है — “हमारा लक्ष्य सिर्फ़ चश्मे बेचना नहीं है। हम चाहते हैं कि भारत में कोई भी व्यक्ति नज़रों की कमी के कारण पिछड़ा न रहे।” यही सोच उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।
जब उनसे पूछा गया कि सफलता का राज़ क्या है, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — “Time management.” उन्होंने कहा, “हम और मेरे सह-संस्थापक अमित चौधरी हर हफ्ते एक दिन सिर्फ़ नए आइडियाज पर काम करते हैं। हमारा हिट रेट करीब 50% है। यानी आधे आइडिया फेल हो जाते हैं, लेकिन बाकी आधे हमें अगले मुकाम पर ले जाते हैं।” बंसल की सोच बड़ी है। वे कहते हैं — “हम भारतीयों को चश्मा नहीं, आत्मविश्वास पहनाते हैं।” और शायद इसी वजह से आज उनकी कंपनी सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव बन चुकी है।
उनका टीवी शो Shark Tank India में बतौर जज आना, उनकी पहचान को और व्यापक बना गया। लाखों युवा उन्हें सिर्फ़ एक सफल उद्यमी नहीं, बल्कि role model की तरह देखते हैं। शो में उनकी शांति, सटीक विश्लेषण और सच्ची सलाह ने दर्शकों को यह सिखाया कि बिज़नेस सिर्फ़ पैसे का खेल नहीं, बल्कि सोच और संवेदनशीलता का संगम है। शो में उन्होंने एक बार कहा था — “किसी बिज़नेस की असली सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितना कमाया, बल्कि इस बात से कि उसने कितनों का जीवन बेहतर किया।”
Lenskart की यही फिलॉसफी है — Vision for All. 2025 में जब पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितता से गुजर रही है, तब Lenskart का IPO Investors के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया है। ग्लोबल टेन्शन्स, ट्रेड वार्स और घटती फंडिंग के बीच भी, यह IPO यह साबित करता है कि भरोसा अभी भी जीवित है — अगर कंपनी के पास मजबूत नींव और ईमानदार नेतृत्व हो।
Bloomberg और Fidelity जैसे संस्थानों ने Lenskart की वैल्यू 6 अरब डॉलर से ऊपर आँकी है, और IPO के बाद यह संख्या 9 अरब डॉलर के पार जा सकती है। अगर यह सब हुआ, तो पीयूष बंसल उन कुछ भारतीय उद्यमियों में शामिल हो जाएंगे जिन्होंने न सिर्फ़ शून्य से साम्राज्य खड़ा किया, बल्कि स्टार्टअप युग के प्रतीक बन गए। पीयूष बंसल की कहानी यह सिखाती है कि अगर आप सही दिशा में लगन से चलते हैं, तो दुनिया का कोई भी बाजार, कोई भी सीमा, आपको रोक नहीं सकती।
Conclusion
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