अगर एक दिन आपके मोबाइल का नेटवर्क गायब हो जाए, पेट्रोल पंप पर लंबी लाइनें लग जाएं, और शेयर बाजार में हाहाकार मच जाए, तो समझिए कि भारत तक पहुँच चुका है उस जंग का असर… जो शुरू हुई थी मीलों दूर, मिडिल ईस्ट की रेत में। एक ऐसा युद्ध, जिसकी चिंगारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने की धमकी दी है —Iran and Israel के बीच की जंग। लेकिन ये सवाल अब सिर्फ दो देशों का नहीं रह गया… अब ये भारत की हर जेब, हर कारखाने, और हर व्यापारी की चिंता बन चुका है।” आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
बीते रविवार को Iran and Israel के बीच हिंसा की एक नई लहर शुरू हुई। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमले किए, जिनमें दर्जनों आम लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। ये कोई सीमित झड़प नहीं, बल्कि उस बड़े युद्ध की दस्तक थी जिसकी आहट पिछले कई महीनों से सुनाई दे रही थी। इस बार हालात इतने गंभीर हैं कि अमेरिका तक चिंतित है। डोनाल्ड ट्रंप ने जहां दोनों देशों से शांति की अपील की, वहीं ईरान ने साफ कर दिया कि जब तक इजराइल हमले जारी रखेगा, तब तक सीजफायर की कोई उम्मीद नहीं।
शुरुआती नजर में भारत को इस जंग से कोई सीधा खतरा नहीं दिखता। लेकिन सच्चाई इससे कहीं गहरी और खतरनाक है। जैसे-जैसे युद्ध की आग फैलेगी, मिडिल ईस्ट के दूसरे देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं। और यही वो मोड़ होगा, जब भारत की अर्थव्यवस्था एक गहरे तूफान की चपेट में आ जाएगी।
सबसे पहले बात तेल की करते हैं, जो भारत की आर्थिक नसों में खून की तरह दौड़ता है। भारत अपनी 85% से ज्यादा कच्चे तेल की जरूरत Import से पूरी करता है। अगर जंग बढ़ी, तो तेल के दाम आसमान छूने लगेंगे। कुछ रिपोर्ट्स तो कहती हैं कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य बंद हो गया, तो दुनिया की आधी से ज्यादा तेल Supply थम सकती है। सोचिए, एक दिन में 50 लाख बैरल तेल गायब हो जाए तो क्या होगा? पहले ही ब्रेंट क्रूड 7% बढ़कर 74 dollar प्रति बैरल पहुंच चुका है, और अगर हालात नहीं संभले, तो ये 200 से 300 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।
ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, ये भारत के बजट में भूचाल लाने वाला खतरा है। तेल महंगा होगा, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे। सरकार को सब्सिडी देनी पड़ेगी। समाज कल्याण योजनाओं का पैसा ईंधन में झोंकना पड़ेगा। और Current account deficit बेकाबू हो जाएगा। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, हर 10 dollar प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत की GDP ग्रोथ 0.3% घट जाती है। यानी विकास की रफ्तार थमने लगेगी।
और यही नहीं, महंगाई की लहर सब कुछ बहा ले जाएगी। खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी, किराया बढ़ेगा, ट्रांसपोर्ट महंगा होगा। रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होगा। लोग कम खर्च करेंगे, कंपनियों की कमाई घटेगी, और नौकरी की मार्केट में सन्नाटा छा जाएगा।
अब बात करें कॉरपोरेट इंडिया की। आनंद राठी रिसर्च के अनुसार, अगर तेल की कीमतें स्थिर नहीं हुईं, तो इंडस्ट्री पर बड़ा बोझ पड़ेगा। खासतौर पर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर। HPCL, BPCL, IOC जैसी कंपनियां जो रिफाइनिंग करती हैं, उनकी लागत बढ़ जाएगी। लेकिन ये कीमत सीधे ग्राहकों पर नहीं डाली जा सकती। नतीजा — मुनाफा कम और घाटा ज्यादा। वहीं दूसरी तरफ ONGC जैसी कंपनियों को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन अगर सरकार फिर से विंडफॉल टैक्स लगाती है, तो फायदा भी खत्म हो जाएगा।
इसके अलावा, एविएशन सेक्टर भी इस तूफान की चपेट में आ जाएगा। एयरलाइंस का एक तिहाई खर्च एविएशन फ्यूल होता है। तेल महंगा होगा, टिकट महंगे होंगे, और फिर यात्रियों की संख्या घटेगी। जो सेक्टर महामारी के बाद थोड़ा संभला था, वह फिर से ICU में पहुंच सकता है।
पेंट और केमिकल इंडस्ट्री का हाल भी कुछ अलग नहीं होगा। एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स जैसी कंपनियां अपने रॉ मटेरियल्स के लिए पूरी तरह तेल पर निर्भर हैं। सॉल्वेंट्स, रेजिन्स, नैफ्था — ये सब महंगे होंगे। नतीजा — प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ेंगे, मांग घटेगी, और मुनाफा डूबेगा।
सिर्फ यहीं तक नहीं, Fertilizer और ऑटोमोबाइल सेक्टर तक तेल की यह महंगाई अपनी चपेट में ले लेगी। यूरिया, अमोनिया जैसे Fertilizer बनाने में प्राकृतिक गैस की जरूरत होती है। अगर गैस महंगी हुई, तो या तो कीमतें बढ़ेंगी या सरकार पर सब्सिडी का और बोझ बढ़ेगा। वहीं ऑटो कंपनियों को रबर, प्लास्टिक और पेट्रोलियम-आधारित सामग्री महंगी पड़ेगी। ये उनके मुनाफे को सीधे काट देगा।
लेकिन इसी आपदा में एक मौका भी छुपा है — इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग। जब पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, तो लोग इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ेंगे। इससे टाटा मोटर्स, ओला इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों को फायदा हो सकता है।
अब बात करते हैं भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की। भारत ने 2025 में ईरान से 442 मिलियन dollar का Import और 1.24 बिलियन dollar का Export किया। वहीं इजराइल के साथ 1.61 बिलियन dollar का Import और 2.15 बिलियन dollar का Export हुआ। अगर युद्ध लंबा चला, तो ये व्यापार ठप पड़ सकता है। कंपनियों को सप्लाई चेन में रुकावट का सामना करना पड़ेगा।
शिपिंग और बीमा की लागत भी आसमान छूने लगेगी। फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवर्डर्स का कहना है कि केप ऑफ गुड होप जैसे रास्ते से माल भेजना ज्यादा महंगा और टाइम लेने वाला होगा। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रास्ते अगर बंद हुए, तो भारत का 15 से 20% Export महंगा हो सकता है।
MENA क्षेत्र यानी मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के देशों के साथ व्यापार पर भी असर पड़ेगा। सऊदी अरब, UAE, कतर जैसे देश भारत से फार्मा, टेक्सटाइल और फर्निशिंग्स का बड़ा Import करते हैं। अगर तनाव बढ़ा, तो ऑर्डर कैंसिल होने लगेंगे, और कंपनियों को घाटा होगा।
इजराइल भारत को रफ डायमंड्स सप्लाई करता है। अगर सप्लाई बाधित हुई, तो भारत के डायमंड कटिंग इंडस्ट्री पर असर पड़ेगा। लेकिन कुछ राहत ये है कि भारत इस अंतर को भर सकता है और खुद कट-पॉलिश डायमंड्स का Export बढ़ा सकता है।
अब आते हैं उन भारतीय कंपनियों पर जिनका सीधा असर इस जंग से पड़ेगा। TCS, Wipro, Infosys, Adani, SBI, L&T — इन सबकी इजराइल में मौजूदगी है। अगर जंग बढ़ी, तो वहां के ऑपरेशन्स ठप हो सकते हैं, कर्मचारियों को निकालना पड़ सकता है, और Investor डरकर पैसा निकाल सकते हैं।
अगर यह जंग सिर्फ इजराइल और ईरान के बीच नहीं रही, बल्कि इसमें हूती, हिजबुल्ला, या यहां तक कि अमेरिका और रूस जैसी ताकतें शामिल हो गईं, तो स्थिति और विस्फोटक हो जाएगी। ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट हिल जाएगा। और भारत, जो अब भी महंगाई, बेरोजगारी और चालू खाता घाटे से जूझ रहा है, और भी पीछे चला जाएगा।
सरकार भले ही सतर्कता बरत रही हो, लेकिन यह तूफान अगर सिर चढ़कर बोला, तो तैयारी का वक्त भी नहीं मिलेगा। यही समय है जब भारत को अपने तेल स्रोतों को विविध बनाना होगा। वैकल्पिक ऊर्जा, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों पर अब सिर्फ चर्चा नहीं, एक्शन लेना होगा।
क्योंकि यह युद्ध सिर्फ टैंक और मिसाइलों का नहीं है… यह ऊर्जा, सप्लाई चेन और अर्थव्यवस्था की नसों में जहर घोलने वाला युद्ध है। और भारत को अगर अपनी गति, अपनी वृद्धि, और अपने लो
Conclusion
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