ज़रा सोचिए… एक ऐसी लड़की जो कभी चेन्नई की गलियों में साइकिल चलाकर कॉलेज जाती थी, वही आगे चलकर दुनिया की सबसे ताकतवर महिला CEO में गिनी गई। एक ऐसी भारतीय महिला जिसने Pepsi जैसी अमेरिकी दिग्गज कंपनी की दिशा ही नहीं, परिभाषा बदल दी। जिसने करोड़ों डॉलर के फैसले तो किए ही, पर हर मीटिंग के बाद अपनी मां को फोन करके पूछती थी — “मां, आज मैंने ठीक किया ना?” यह कहानी है Indra Nooyi की — उस महिला की जिसने साबित किया कि दुनिया में सफलता की कोई भाषा, कोई देश और कोई जेंडर नहीं होता।
Indra Nooyi का जन्म 28 अक्टूबर 1955 को चेन्नई के एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ। पिता बैंक अधिकारी थे और मां गृहिणी। परिवार में सादगी थी, पर सपनों की कोई कमी नहीं। घर में रोज़ शाम को मां बेटियों को एक खेल खिलाती थीं — “अगर तुम प्रधानमंत्री बन जाओ तो क्या करोगी?” वही खेल, वही कल्पना शायद इंदिरा के भीतर नेतृत्व की पहली चिंगारी थी। छोटी उम्र से ही उनमें एक अलग आत्मविश्वास था। वो स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आगे रहतीं, क्रिकेट खेलतीं, और जब कॉलेज आईं, तो अपने कॉलेज बैंड में गिटार तक बजाने लगीं — उस ज़माने में, दक्षिण भारत की किसी लड़की के लिए यह बहुत बड़ी बात थी।
मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से उन्होंने फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में Graduate किया। विज्ञान की पढ़ाई करते हुए भी उन्हें बिज़नेस और मैनेजमेंट की दुनिया से आकर्षण था। इसलिए उन्होंने IIM कोलकाता से MBA करने का फैसला लिया। उस वक्त भारतीय समाज में महिलाओं का मैनेजमेंट में जाना असामान्य था, लेकिन इंदिरा ने वही किया जो मुश्किल था। उन्होंने हमेशा कहा — “अगर रास्ता आसान लगे, तो शायद वो आपका रास्ता ही नहीं है।”
IIM से निकलने के बाद उनकी पहली नौकरी थी जॉनसन एंड जॉनसन में — और वहां उनका पहला रोल था “रिसेप्शनिस्ट” का। यह वही समय था जब उन्होंने महसूस किया कि एक महिला को कॉर्पोरेट दुनिया में खुद को साबित करने के लिए दोगुना प्रयास करना पड़ता है। कई बार मीटिंग्स में उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, कई बार केवल इसलिए उनका आइडिया रिजेक्ट कर दिया गया क्योंकि वो “बहुत युवा” थीं। लेकिन इंदिरा ने हार नहीं मानीं। उन्होंने अपने काम से धीरे-धीरे पहचान बनानी शुरू की।
उनका अगला कदम था — मेटुर बीर्डसेल, और फिर बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप। यहां उन्होंने स्ट्रैटेजी और फाइनेंस के क्षेत्र में गहरी समझ विकसित की। इसी दौरान उन्हें अमेरिका जाने का मौका मिला, और उन्होंने Yale University से “Public and Private Management” में मास्टर्स की डिग्री ली। यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। वहां उन्होंने महसूस किया कि भारत में मिले मूल्यों — अनुशासन, परिवार, और मेहनत — को अगर ग्लोबल सोच से जोड़ा जाए, तो कोई भी भारतीय महिला दुनिया की किसी भी कॉर्पोरेट टेबल पर बराबरी से बैठ सकती है।
साल 1994 में इंदिरा ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने उनके करियर की दिशा ही नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट इतिहास भी बदल दिया — उन्होंने PepsiCo जॉइन किया। उस समय कंपनी Coca-Cola के दबाव में थी, और “junk food” के कारण आलोचनाओं का सामना कर रही थी। लेकिन इंदिरा के पास एक vision था। उन्होंने कहा — “हम केवल पेप्सी नहीं बेचेंगे, हम purpose बेचेंगे।”
उन्होंने कंपनी की रणनीति पूरी तरह बदल दी। उन्होंने “Performance with Purpose” का कॉन्सेप्ट दिया — यानी मुनाफा भी, लेकिन जिम्मेदारी के साथ। उन्होंने हेल्दी स्नैक्स, लो-शुगर ड्रिंक्स और सस्टेनेबल पैकेजिंग पर फोकस किया। उन्होंने किसानों से सीधी खरीद बढ़ाई, और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को कंपनी की संस्कृति बना दिया। उनकी लीडरशिप में PepsiCo का रेवेन्यू 35 बिलियन डॉलर से बढ़कर 63 बिलियन डॉलर हो गया। उन्होंने कंपनी को एक “कोल्ड ड्रिंक ब्रांड” से “हेल्थ एंड स्नैक पॉवरहाउस” में बदल दिया।
पर सफलता की ये यात्रा आसान नहीं थी। जब वो पहली बार PepsiCo के हेडक्वार्टर में गईं, तो कई लोगों ने उनके भारतीय लहजे पर मज़ाक उड़ाया। कई लोगों ने कहा कि “एक भारतीय महिला” इस पद तक नहीं पहुंच पाएगी। लेकिन इंदिरा ने हर पूर्वाग्रह को अपने काम से जवाब दिया। वो रातों को देर तक दफ्तर में रहतीं, सुबह 4 बजे तक रिपोर्ट्स पढ़तीं, और हर छोटे से छोटे निर्णय को खुद देखतीं।
उन्होंने खुद कहा था — “मैं हर दिन घर से निकलने से पहले अपने बच्चों को गले लगाती हूं, क्योंकि मुझे नहीं पता आज रात मैं लौट पाऊंगी या नहीं। काम का बोझ इतना होता था।” यही वो sacrifice था जिसने उन्हें दुनिया की सबसे respected CEOs में शामिल किया।
इंदिरा नूई का जीवन केवल corporate strategy की नहीं, बल्कि emotional intelligence की भी कहानी है। वो कहती हैं — “लीडर वो नहीं जो सबसे ज्यादा बोलता है, बल्कि वो जो सबसे ज्यादा सुनता है।” उनके ऑफिस में हर कर्मचारी उन्हें “Indra” कहकर बुलाता था — न कि “Ma’am” या “Boss।” वो hierarchy से ज़्यादा humanity में विश्वास रखती थीं।
उन्होंने एक बार बताया कि जब वो PepsiCo की CFO बनीं, तो घर लौटीं और अपनी मां से कहा — “मां, मैं CFO बन गई!” तो मां ने कहा — “बहुत अच्छा, पहले दूध लाओ। गेस्ट बैठे हैं।” इंदिरा हँसते हुए कहती हैं — “मां ने मुझे याद दिलाया कि घर में मैं CEO नहीं, बेटी हूं।” यही उनकी ताकत थी — professional ambition और personal grounding का perfect balance।
उनकी किताब My Life in Full में उन्होंने लिखा — “हर महिला को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है — एक दुनिया से और एक खुद से।” उन्होंने अपने करियर में मातृत्व और नेतृत्व के बीच संघर्ष को खुलकर साझा किया। वो कहती हैं — “कभी-कभी मीटिंग्स में दिमाग कंपनी में होता था और दिल बच्चों के पास।”
साल 2006 में जब उन्हें PepsiCo की CEO बनाया गया, तब वो सिर्फ़ कंपनी की नहीं, बल्कि दुनिया भर की महिलाओं की उम्मीद बन गईं। उस वक्त Fortune और Forbes जैसी मैगज़ीन्स ने उन्हें “World’s Most Powerful Women” की लिस्ट में दूसरे स्थान पर रखा। उन्होंने लगातार 12 साल तक PepsiCo को दुनिया की टॉप कंपनियों में बनाए रखा।
उनकी रणनीति सिर्फ़ प्रॉफिट तक सीमित नहीं थी। उन्होंने हर निर्णय में “भविष्य की जिम्मेदारी” को जोड़ा। उन्होंने sugar और fat कम करने वाले प्रोडक्ट लॉन्च किए, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया, और कंपनी के कार्बन फुटप्रिंट को कम किया। उन्होंने कहा था — “अगर हम धरती को बचा नहीं सकते, तो profit का क्या मतलब?” 2018 में उन्होंने CEO पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन उनकी छाप आज भी हर मीटिंग रूम, हर बोर्ड टेबल पर दिखती है। उन्होंने कंपनी को सिर्फ़ financial रूप से नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी बदल दिया।
उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2007 में “पद्मभूषण” से सम्मानित किया। लेकिन इंदिरा नूई ने कभी इसे व्यक्तिगत जीत नहीं कहा। उन्होंने कहा — “यह उन सभी भारतीय महिलाओं का पुरस्कार है जो घर, परिवार और सपनों के बीच संतुलन बना रही हैं।” उनकी कहानी यह बताती है कि leadership का अर्थ सिर्फ़ आदेश देना नहीं, बल्कि दूसरों को प्रेरित करना है। वो कहती हैं — “मैं चाहती हूं कि महिलाएं केवल ‘सीट’ न मांगें, बल्कि ‘टेबल’ बनाएं।”
आज इंदिरा नूई कई boards पर सलाहकार हैं, mentorship programs चलाती हैं, और अगली पीढ़ी के leaders को तैयार कर रही हैं। लेकिन वो अब भी वही सरल, grounded इंसान हैं जो अपने हर फैसले में इंसानियत को सबसे ऊपर रखती हैं। वो कहती हैं — “सफलता तब तक अधूरी है जब तक आप किसी और की जिंदगी आसान नहीं बनाते।” अगर उनके जीवन को एक वाक्य में कहा जाए, तो शायद ये होगा — “She built a career on logic, but a legacy on love.”
इंदिरा नूई की यात्रा हमें सिखाती है कि किसी भी साधारण शुरुआत से असाधारण सफलता तक पहुंचा जा सकता है — अगर हिम्मत हो, मेहनत हो और दिल साफ़ हो। उनकी कहानी भारत की हर उस लड़की के लिए उम्मीद है जो सोचती है कि एक छोटे शहर से निकली आवाज़ दुनिया बदल नहीं सकती। क्योंकि इंदिरा ने साबित कर दिया — अगर आप खुद पर भरोसा रखते हैं, तो पूरी दुनिया आपको सुनने लगती है।
Conclusion
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