Dollar Trap or Opportunity: MASALA DEAL से भारत की डिप्लोमेसी को मिली नई ताकत – ट्रंप की रणनीति पर भारी पड़ा भारत का समझदारी भरा जवाब! 2025

कल्पना कीजिए—आप एक बाजार में खड़े हैं, और सामने वाला व्यापारी आपको मजबूर कर रहा है कि आप उसका सामान बिना मोलभाव के खरीदें, वरना वह आपकी दुकान बंद करवा देगा। आप कहेंगे कि ये कोई व्यापार नहीं, दबाव की राजनीति है। और अब सोचिए, अगर यही काम दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका कर रहा हो—तो क्या होगा?

और अगर उसका निशाना हो भारत… तो क्या हमें सच में ‘डील’ के नाम पर जाल में फंसना चाहिए? आज हम बात करेंगे एक ऐसी रणनीति की, जिसे अमेरिका ने बेहद सलीके से ‘MASALA DEAL’ का नाम दिया है—लेकिन असल में ये मसालेदार नहीं, बेहद तीखी और जहर से भरी हुई है। और भारत को इस ज़हर को चखने से पहले कई बार सोचने की ज़रूरत है।

MASALA, यानी Mutually Agreed Settlement Achieved Through Leverage Arm-Twisting। सुनने में जितना कूटनीतिक लगता है, असल में उतना ही चालबाज़ी से भरा है। अमेरिका का यह नया तरीका है देशों से जबरन व्यापारिक रियायतें निकलवाने का। Think Tank GTRI यानी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के मुताबिक, यह रणनीति कोई पारदर्शी बातचीत नहीं, बल्कि “तोड़ो और झुको” वाला गेम है। और यह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि जापान, यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी लागू हो रही है।

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने साफ कहा है कि ट्रंप की ये ‘मसाला’ रणनीति पूरी तरह से राजनीतिक है—इसमें कोई व्यापारिक स्थिरता नहीं है। अमेरिका अब तक 24 देशों और यूरोपीय यूनियन को चेतावनी पत्र भेज चुका है कि अगर उन्होंने अमेरिका की बातें नहीं मानीं, तो उन पर टैरिफ थोप दिए जाएंगे। और ये कोई छोटी-मोटी फीस नहीं—ब्राजील जैसे देशों पर 50% तक, जबकि EU और मैक्सिको जैसे बड़े व्यापारिक सहयोगियों पर 30% टैरिफ लगाने की धमकी दी गई है। ये बताता है कि अमेरिका अब दोस्ती में भी दादागीरी दिखा रहा है।

अब सवाल उठता है कि भारत कहां खड़ा है? अमेरिका के साथ एक संभावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते की बातचीत का दौर शुरू हो चुका है। भारत से एक उच्च स्तरीय वार्ताकारों की टीम जल्द ही वाशिंगटन जा रही है। लेकिन विशेषज्ञों की चेतावनी है—भारत को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वह इस ‘मसाला डील’ से बाहर है। जब अमेरिका अपने सबसे करीबी साझेदारों को भी दबा रहा है, तो भारत को सावधानी से हर कदम उठाना होगा। खासकर कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्र में कोई भी रियायत देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकती है।

ट्रंप की रणनीति सिर्फ दबाव बनाने तक सीमित नहीं है। ये एक माइंड गेम है। वो भारत जैसे देशों को पहले व्यापारिक अवसरों का सपना दिखाते हैं, फिर टैरिफ की धमकी देते हैं, और फिर अंत में एकतरफा समझौते पर दस्तखत करने को मजबूर करते हैं। कई बार ये समझौते ऐसे होते हैं, जिनमें अमेरिका को तो गारंटी मिलती है कि उसका सामान खरीदा जाएगा, लेकिन दूसरे देश को कोई स्पष्ट लाभ नहीं होता। और अगर समझौता हो भी जाए, तो भविष्य में वो अमेरिका की राजनीतिक मर्जी पर टिका होता है—अर्थात ट्रंप जाएं तो समझौता भी चला जाए!

ऐसा पहले हो चुका है। 2019 में जब ट्रंप प्रशासन ने चीन के खिलाफ टैरिफ वॉर छेड़ी थी, तब भी उन्होंने भारत से Generalized System of Preferences (GSP) का दर्जा छीन लिया था। भारत को उस वक्त लगभग 6 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट झटका लगा था। तब भी भारत ने कई रियायतें दी थीं, लेकिन बदले में स्थिरता नहीं मिली। और यही खतरा अब फिर से सामने खड़ा है—नया चेहरा, वही चाल।

भारत को ये समझना होगा कि व्यापार कोई दान नहीं होता, यह बराबरी की बातचीत होती है। और अगर बातचीत में एक पक्ष बंदूक लेकर बैठा हो, तो वहां ‘मसाला’ नहीं, सिर्फ धमकियों की गंध आती है। जापान, EU और दक्षिण कोरिया जैसे देश साफ तौर पर कह चुके हैं कि वे अमेरिका की इन एकतरफा शर्तों को नहीं मानेंगे। अब तक केवल ब्रिटेन और वियतनाम जैसे कुछ देश ही ऐसे हैं जिन्होंने इस दबाव में आकर समझौते पर हां कहा है।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है जिसकी युवा आबादी, डिजिटल क्षमता और घरेलू मांग विश्व में सबसे आगे मानी जा रही है। ऐसे में भारत को जल्दबाज़ी में कोई भी समझौता नहीं करना चाहिए। खासकर तब जब ट्रंप सरकार की विश्वसनीयता खुद उनके देश में सवालों के घेरे में हो। आज जो समझौता होगा, वह कल एक नए अमेरिकी राष्ट्रपति के आते ही पलट सकता है। और तब भारत को न कोई गारंटी मिलेगी, न मुआवजा।

GTRI की रिपोर्ट में यह साफ तौर पर लिखा है कि ट्रंप की धमकियों की विश्वसनीयता लगातार गिर रही है। दुनिया के तमाम देश अब अमेरिका के साथ संबंधों में “Strategic Patience” यानी रणनीतिक धैर्य अपना रहे हैं। वे जानते हैं कि अमेरिका का रवैया अब स्थिर नहीं, बल्कि अवसरवादी हो चला है। और यही भारत को भी करना चाहिए—धैर्य, संयम और देशहित में सोचकर आगे बढ़ना।

कृषि के क्षेत्र में समझौता करना भारत के लिए सबसे Risk भरा हो सकता है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि बाजार को अमेरिकी गेहूं, सोयाबीन और डेयरी प्रोडक्ट्स के लिए खोले। लेकिन भारत में यह क्षेत्र करोड़ों किसानों से जुड़ा है, जिनकी आजीविका सीधी तौर पर घरेलू उत्पादन पर निर्भर है। अगर भारत इस सेक्टर को खोलता है, तो सस्ता अमेरिकी माल बाजार में उतरने लगेगा, जिससे स्थानीय किसान बुरी तरह प्रभावित होंगे। और जब किसानों की कमर टूटती है, तो देश की रीढ़ टूटती है।

इसलिए भारत को एक-एक शब्द, एक-एक पंक्ति, और हर टैरिफ शर्त को बारीकी से जांचना होगा। कोई भी कदम सिर्फ आंकड़ों के आधार पर नहीं, देश की ज़मीनी सच्चाई के आधार पर तय होना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1991 की उदारीकरण की नीतियों ने जहां भारत को ग्लोबल मार्केट से जोड़ा, वहीं कई क्षेत्रों को असुरक्षित भी बनाया। और अब जब दुनिया फिर से प्रोटेक्शनिज्म की ओर लौट रही है, तो भारत को भी स्मार्ट प्ले करना होगा।

भारत सरकार की जिम्मेदारी है कि वह एक ऐसा व्यापार समझौता करे, जो long term हो, संतुलित हो और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हो। इसे किसी राजनीतिक लाभ या कूटनीतिक दबाव के चलते न किया जाए। क्योंकि एक बार किया गया गलत समझौता वर्षों तक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असर छोड़ सकता है। और इसकी सबसे बड़ी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ती है।

आज जब अमेरिका ‘मसाला डील’ के नाम पर दुनिया को चखाने की कोशिश कर रहा है, तो भारत को बहुत सावधानी से अपनी थाली सजानी होगी। हमें यह तय करना होगा कि हम सिर्फ स्वाद के लालच में ऐसा कुछ न निगल जाएं, जो हमें भीतर से बीमार कर दे। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ‘ना’ कहना भी एक कला होती है, और वक्त आ गया है कि भारत उस कला का प्रदर्शन करे।

Conclusion

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