IFFCO किसानों की सबसे बड़ी ताकत — कैसे बनी दुनिया की नंबर 1 Fertilizer Cooperative?

एक ऐसा वक्त था, जब भारत के गाँवों में किसानों के चेहरों पर निराशा थी। खेतों में मेहनत थी, लेकिन मिट्टी में ताकत नहीं थी। बरसात पर निर्भर किसान, खाद की कमी से परेशान, और सरकारी सप्लाई की अनियमितता ने खेती को जैसे जुए का खेल बना दिया था।

उस दौर में, जब हर किसान एक उम्मीद की तलाश में था, तब कुछ लोगों ने मिलकर ऐसा बीज बोया जो आज पूरी दुनिया में “भारत की सहकारिता क्रांति” के नाम से जाना जाता है। वही बीज था — IFFCO, यानी Indian Farmers Fertilizer Cooperative Limited। एक ऐसी संस्था जिसने “किसानों के लिए, किसानों द्वारा” के विचार को साकार किया, और भारत की मिट्टी को फिर से उपजाऊ बना दिया।

1960 का दशक… भारत आज़ादी के बाद अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहा था। हर दिशा में विकास की बातें हो रही थीं — लेकिन खेती, जो देश की रीढ़ थी, वहां हालात कुछ और थे। हर राज्य में सहकारी समितियां थीं, जो किसानों को खाद बांटती थीं, लेकिन वे खुद खाद बनाती नहीं थीं।

उन्हें सरकारी कंपनियों या निजी उद्योगों से खाद खरीदनी पड़ती थी। कई बार सप्लाई लेट हो जाती, दाम बढ़ जाते, और किसान कर्ज़ में डूब जाते। यही वो दौर था जब किसानों ने सोचा — “अगर हम अपने खेतों के मालिक हैं, तो खाद के भी क्यों न बनें? और यहीं से जन्म हुआ — IFFCO का।

3 नवंबर 1967… दिल्ली में एक छोटी सी मीटिंग हुई। सिर्फ़ 57 सहकारी समितियों ने हाथ मिलाया और एक सपना देखा — “हम किसानों के लिए अपनी खुद की Fertilizer कंपनी बनाएंगे।” यह किसी क्रांति से कम नहीं था। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही संस्था एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी Cooperative Federation बन जाएगी। आज IFFCO से जुड़ी हैं 35,000 से भी ज़्यादा सहकारी समितियां, और इसकी जड़ें पूरे भारत में फैली हुई हैं — पंजाब से लेकर तमिलनाडु तक, गुजरात से लेकर असम तक।

IFFCO का सफर किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं। शुरुआत में उनके पास सीमित पूंजी थी, अनुभव कम था, लेकिन इरादे मज़बूत थे। उन्होंने गुजरात और उत्तर प्रदेश में पहले दो Fertilizer प्लांट लगाए — कलोल और फुलपुर। इन प्लांट्स ने न सिर्फ खाद बनाई, बल्कि किसानों का आत्मविश्वास भी। पहले साल उत्पादन सीमित था, लेकिन कुछ ही वर्षों में IFFCO ने इतनी प्रगति की कि भारत में इस्तेमाल होने वाली 25% खाद IFFCO से आने लगी।

IFFCO ने सिर्फ खाद नहीं दी, उसने सोच दी — “खेत को Fertilizer चाहिए, लेकिन किसान को अवसर।” इसीलिए उन्होंने अपनी नीतियों में सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, शिक्षा और तकनीक को भी जोड़ा। उन्होंने गांवों में कृषि केंद्र बनाए — जहां से किसान सीधे बीज, कीटनाशक और कृषि उपकरण खरीद सकें। आज देशभर में IFFCO के सैकड़ों केंद्र हैं, जो किसान के लिए एक ‘वन-स्टॉप सॉल्यूशन’ बन चुके हैं।

समय के साथ IFFCO ने अपनी पहुंच को और गहरा किया। उन्होंने महसूस किया कि खेती सिर्फ खाद से नहीं चलती, बल्कि जानकारी से चलती है। इसलिए IFFCO ने Airtel के साथ मिलकर एक मोबाइल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट शुरू किया — जिससे किसान अपने मोबाइल पर मौसम, बाजार और फसल की जानकारी पा सकें। आज लाखों किसान IFFCO के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं, जो उन्हें रियल-टाइम सलाह देता है।

IFFCO ने बीमा क्षेत्र में भी कदम रखा — और यह भारत में पहली ऐसी संस्था बनी जिसे ग्रामीण इलाकों में बीमा का लाइसेंस मिला। यानी अब किसान अगर खाद खरीदता था, तो उसके साथ उसे बीमा सुरक्षा भी मिलती थी। यह कदम इतना प्रभावशाली था कि लाखों किसानों को इसका सीधा फायदा मिला। यह वही सोच थी जिसने IFFCO को बाकी कंपनियों से अलग बनाया — यह कंपनी नहीं, एक परिवार थी।

परिवार की तरह ही IFFCO ने अपने किसानों की हर मुश्किल में साथ दिया। जब 2001 में गुजरात में भूकंप आया, IFFCO के ट्रक सिर्फ खाद लेकर नहीं, बल्कि राहत सामग्री लेकर निकले। जब कोविड महामारी के दौरान सप्लाई चैन टूट रही थी, तब भी IFFCO ने किसानों तक खाद पहुंचाई। उन्होंने अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट तक लगाए। यह बताता है कि IFFCO का DNA सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि सेवा है।

IFFCO का विस्तार सिर्फ भारत तक नहीं रुका। उसने विदेशों में भी अपनी शाखाएं बनाई — ओमान, जॉर्डन, सेनेगल जैसे देशों में Fertilizer प्रोजेक्ट्स लगाए, ताकि भारत की ज़रूरतों को समय पर पूरा किया जा सके। यह सोच थी — “भारत आत्मनिर्भर बने, पर दुनिया से जुड़ा भी रहे।” आज IFFCO की उपस्थिति 50 से ज़्यादा देशों में है, और उसकी पहचान एक वैश्विक सहकारी शक्ति के रूप में हो चुकी है।

IFFCO के चेयरमैन डॉक्टर यू एस अवस्थी ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संस्था सिर्फ प्रॉफिट के पीछे न भागे, बल्कि किसान की प्रगति ही उसका असली लाभ बने। उनके नेतृत्व में IFFCO ने कई नए इनोवेशन किए — जैसे नैनो यूरिया, जो पारंपरिक यूरिया से कई गुना प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल है।

सिर्फ एक छोटी बोतल नैनो यूरिया की उतना काम करती है जितना एक पूरी बोरी यूरिया करती थी। इससे किसान का खर्च घटा, मिट्टी की सेहत सुधरी, और भारत का इम्पोर्ट बिल कम हुआ। IFFCO ने ये साबित किया कि “Innovation is not about machines, it’s about mindset.” जब दुनिया Green Revolution की बातें कर रही थी, तब IFFCO ने Sustainable Agriculture की नींव रखी।

IFFCO का समाज के प्रति योगदान भी उतना ही प्रेरक है। उन्होंने 36,000 हेक्टेयर से ज़्यादा भूमि पर वनीकरण करवाया। गांवों में पौधारोपण अभियान चलाए, स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा दी, और किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया। कई जगह उन्होंने Rainwater Harvesting Projects शुरू किए ताकि भूजल का स्तर बढ़ सके। आज जब ग्लोबल वार्मिंग एक संकट है, IFFCO ने उस पर भी समाधान दिया।

IFFCO ने रोज़गार भी दिया — सिर्फ अपने कर्मचारियों को नहीं, बल्कि लाखों किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से। हर साल ये संस्था करीब 50 लाख टन से ज़्यादा Fertilizer बनाती है और 55 मिलियन किसानों तक उसकी पहुंच है। ये सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि वो ज़िंदगियाँ हैं जो इस संस्था की वजह से खुशहाल हुईं।

IFFCO की वित्तीय स्थिति भी अद्भुत है। आज इसकी नेट वर्थ अरबों डॉलर में है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी पूंजी उसके सदस्य किसान हैं। वो किसान जो इस संस्था के शेयरहोल्डर हैं, इसके मालिक हैं, और इसके लाभ के असली हकदार भी। इसीलिए जब वर्ल्ड कोऑपरेटिव मॉनिटर ने IFFCO को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सहकारी संस्था घोषित किया, तो ये सिर्फ एक रैंक नहीं थी — ये भारतीय किसानों की मेहनत का सम्मान था।

IFFCO ने यह भी दिखाया कि “Cooperation” कोई पुरानी सोच नहीं, बल्कि भविष्य का मॉडल है। जब दुनिया Profit-Driven Corporations में उलझी है, तब IFFCO जैसे मॉडल दिखाते हैं कि सहकारिता से भी साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है, और वो भी बिना किसी के शोषण के।

IFFCO ने देशभर में IFFCO Kisan Sanchar Limited, IFFCO Tokio General Insurance, Indian Potash Limited जैसी कई सहायक कंपनियां बनाईं। इन कंपनियों ने खेती को सिर्फ “occupation” नहीं, बल्कि “opportunity” बना दिया। किसानों को मार्केट तक सीधी पहुंच दिलाने के लिए उन्होंने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक लॉन्च किए — ताकि किसान अपने प्रोडक्ट सीधे बेच सकें। यह डिजिटल इंडिया की असली आत्मा थी — गांव से शहर तक बिना बिचौलियों के सीधा कनेक्शन।

IFFCO का असर इतना गहरा है कि आज अगर आप भारत के किसी भी राज्य में किसी किसान से पूछें — “आपकी खेती में कौन मदद करता है?” तो ज़्यादातर लोग यही जवाब देंगे — “IFFCO!” यह संस्था अब सिर्फ खाद नहीं देती, बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन चुकी है।

हर कहानी के पीछे कुछ लोग होते हैं जो उसे साकार करते हैं। IFFCO के पीछे भी ऐसे ही हज़ारों चेहरे हैं — किसान, इंजीनियर, प्रबंधक, मजदूर — जिन्होंने दिन-रात काम किया ताकि खेतों में हरियाली बनी रहे। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज भारत दुनिया में खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अब IFFCO का अगला लक्ष्य है — न्यू ग्रीन रिवोल्यूशन। यह नई क्रांति सिर्फ खाद तक सीमित नहीं, बल्कि क्लाइमेट चेंज, मिट्टी की सेहत और किसानों की आय बढ़ाने पर केंद्रित है। नैनो यूरिया के बाद अब IFFCO नैनो डीएपी पर काम कर रहा है। यह तकनीक आने वाले वर्षों में भारत की कृषि लागत को 20 से 30% तक घटा सकती है।

IFFCO ने अपने Digital Transformation Mission में AI और IoT आधारित खेती के मॉडल भी शुरू किए हैं। खेतों में सेंसर लगाए जा रहे हैं जो मिट्टी की नमी, तापमान और पोषक तत्वों का डेटा रियल टाइम में देते हैं। यह डेटा किसानों को बताता है कि कब सिंचाई करनी है, कितनी खाद डालनी है और कब फसल तैयार होगी। यह “Future Farming” है — और IFFCO इसे आज ही साकार कर रहा है।

Conclusion

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