Great Depression 1929: जिसने संकट से उभारा अमेरिका और दी नई आर्थिक ताकत!

सुबह का वक्त था, लेकिन शहर की सड़कों पर वह चहल-पहल नहीं थी, जो एक विकसित देश के दिल में होनी चाहिए थी। न कहीं दूध बेचने वाला आवाज़ लगा रहा था, न बच्चे स्कूल की ओर भाग रहे थे, न अख़बार बांटने वाले के पैरों की रफ़्तार थी। दुकानों के शटर नीचे खिंचे हुए थे, उनके ऊपर धूल और मकड़ी के जाले जमा हो चुके थे। फैक्ट्रियों के बड़े-बड़े गेट पर ताले लटक रहे थे और उनकी ऊंची चिमनियों से महीनों से धुआं नहीं निकला था।

घरों के दरवाज़ों पर लोग खड़े होकर खाली आंखों से सड़क की ओर देखते, मानो किसी चमत्कार का इंतजार कर रहे हों—कोई उन्हें बुला ले काम पर, कोई हाथ में पैसों का लिफाफा थमा दे, या शायद कोई आकर कहे, “सब ठीक हो गया है।” लेकिन ऐसा कोई नहीं आता। हवा में रोटी पकने की खुशबू नहीं, बल्कि भूख की कसक तैर रही थी।

बच्चों की आंखों में खेलने की मासूम चमक गायब थी, उसकी जगह एक सवाल था—“आज खाने को मिलेगा क्या?” किसी के हाथ में नौकरी का ऑफर लेटर नहीं, बल्कि बैंक का नोटिस था—घर खाली करो, कर्ज चुका दो। यह कोई फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि 1929 के अमेरिका की असली तस्वीर थी—वो दौर जिसे दुनिया ने ‘महामंदी’ के नाम से जाना। और आज, लगभग एक सदी बाद, डोनाल्ड ट्रंप के शब्दों ने उसी डर की परछाई को फिर से ज़िंदा कर दिया है। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

आपको पहले बता दें कि कैसे एक ऐसा देश, जो दुनिया में उद्योग, विज्ञान और तकनीक में सबसे आगे था, अचानक से भूख, गरीबी और बेरोजगारी के गहरे अंधेरे में क्यों डूब गया? जवाब खोजने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा—पहले विश्व युद्ध के अंत तक।

साल था 1918, और पहला विश्व युद्ध समाप्त हुआ था। दुनिया के नक्शे पर कई देश बर्बाद होकर खड़े थे। यूरोप के बड़े-बड़े शहर खंडहर बन चुके थे, सड़कें टूटी हुईं, पुल गिर चुके, और लाखों लोग बेघर थे। लेकिन इस तबाही में भी कुछ देशों ने खूब कमाया—अमेरिका और जापान।

युद्ध के दौरान हथियार, गोला-बारूद, मशीनें और जरूरी सामान बनाने के लिए वहां फैक्ट्रियां चौबीसों घंटे चल रही थीं। उत्पादन इतना बढ़ा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी फैक्ट्रियों के चिमनियों से धुआं नहीं रुक सका। मालिकों ने सोचा—“अब ये मशीनें और तेज चलेंगी, अब हम और अमीर होंगे।” लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि जिस मांग ने उन्हें इतना मुनाफा दिया, वह मांग युद्ध खत्म होने के साथ ही खत्म हो जाएगी।

युद्ध खत्म होते ही यूरोप की जेब खाली थी। उनके पास नए सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अमेरिका के गोदाम माल से भरते गए, लेकिन खरीददार नहीं मिले। एक व्यापारी ने उस दौर को याद करते हुए कहा था, “हमारे पास गेहूं के गोदाम भरे थे, लेकिन बाज़ार में कोई कीमत नहीं थी। हम मशीनें बना रहे थे, लेकिन कोई उन्हें खरीदने नहीं आ रहा था। हम उत्पादन कर रहे थे, और उत्पादन ही हमें डुबो रहा था।”

खेती-किसानी में भी हालात अलग नहीं थे। युद्ध के दौरान जब खेत वीरान थे, तब पैदावार कम थी और दाम ऊंचे। लेकिन युद्ध खत्म होते-होते खेती में सुधार आया, पैदावार बढ़ी, लेकिन मांग घट गई। गेहूं, मक्का, जौ और दूसरी फसलों की इतनी भरमार हो गई कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अनाज के दाम गिरते चले गए।

किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे थे। कई किसान तो कर्ज लेकर बीज और खाद खरीदते, फसल काटते, लेकिन बाज़ार में उसे बेचते तो दाम इतने कम मिलते कि कर्ज और बढ़ जाता। उन्होंने सोचा, ज़्यादा पैदावार करके घाटा पूरा कर लेंगे, लेकिन हुआ उल्टा—अनाज और सस्ता हो गया, खरीदार कम होते गए, और गोदामों में रखा अनाज सड़ने लगा। यह विडंबना थी—देश में लोग भूखे थे, लेकिन बाजार में अनाज बिक नहीं रहा था।

और फिर आया 24 अक्टूबर 1929—जिसे ‘ब्लैक ट्यूसडे’ कहा जाता है। उस दिन न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में शेयर की कीमतें गिरने लगीं, और देखते ही देखते 50% तक नीचे चली गईं। कॉर्पोरेट मुनाफा 90% से ज्यादा गिर गया। अरबों डॉलर की पूंजी एक झटके में खत्म हो गई। वो लोग, जिन्होंने अपनी जिंदगी की सारी कमाई शेयर मार्केट में लगा रखी थी, कुछ ही घंटों में कंगाल हो गए। एक ब्रोकर ने आत्महत्या कर ली, दर्जनों Investors ने दिवालियापन घोषित कर दिया, और हजारों लोग अपने Investment के कागज़ हाथ में लेकर सड़कों पर बैठ गए, क्योंकि अब वो सिर्फ बेकार के कागज थे।

अमेरिका इस समय तक यूरोप के कई देशों को भारी कर्ज दे चुका था। जब मंदी के संकेत दिखने लगे, तो अमेरिका ने ऐलान कर दिया कि अब वह किसी देश को कर्ज नहीं देगा। इससे यूरोप के बड़े-बड़े बैंक डूबने लगे। ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड की कीमत गिरने लगी, जर्मनी में बेरोजगारी आसमान छूने लगी, और लैटिन अमेरिका की अर्थव्यवस्था भी हिल गई।

अमेरिका के अंदर हालात और भी खराब हो गए। बैंकों ने कर्ज देना बंद कर दिया, और जिन लोगों को पहले कर्ज दिया था, उनसे जबरन वसूली शुरू कर दी। किसान, मजदूर, दुकानदार—सबके घर और जमीन नीलाम होने लगे। डॉलर की कीमत लगातार गिर रही थी, और लोग कर्ज चुकाने में असमर्थ थे।

1929 से 1933 के बीच 4000 से ज्यादा बैंक बंद हो गए। 1,10,000 कंपनियां हमेशा के लिए ताला लगाकर बैठ गईं। बेरोजगारी का आलम यह था कि 1929 में जहां 16 लाख लोग बेरोजगार थे, 1933 तक यह संख्या 1.4 करोड़ हो गई—यानि हर चार में से एक व्यक्ति के पास कोई काम नहीं था।

बेरोजगारी के साथ भूख और बीमारी ने हमला किया। न्यूयॉर्क के अस्पतालों में 1931 में करीब 100 लोग भूख से मर गए। पोषण की कमी से बीमारियां फैल गईं, और एक-तिहाई बच्चे कुपोषित हो गए। इलाज के लिए न दवा थी, न डॉक्टर।

1932 तक 2,50,000 से ज्यादा लोग अपने घर खो बैठे। किराया या मॉर्गेज चुकाने में नाकाम लोग सड़कों, पार्कों और रेलवे पटरियों के किनारे रात बिताने लगे। शहरों के किनारों पर कार्डबोर्ड और लोहे की चादरों से बनी झुग्गियां बस गईं, जिन्हें लोग ‘हूवरविले’ कहने लगे—राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर के नाम पर, जिनसे लोग नाराज़ थे।

कुछ लोग भूख से बचने के लिए खुद को गिरफ्तार करवाने लगे। जेल में कम से कम गर्म कमरा, बिस्तर और खाना मिल जाता था। 1932 में करीब 20 लाख लोग ऐसे थे जो इधर-उधर घूमते, काम की तलाश करते, और रात जेल में गुजारते।

यह अंधेरा दौर लगभग एक दशक तक चला। फिर 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ। फैक्ट्रियां फिर से चल पड़ीं, हथियार, गाड़ियां, जहाज—सबकी मांग बढ़ गई। बेरोजगारों को नौकरी मिलने लगी, महिलाएं भी कारखानों में काम करने लगीं। युद्ध ने भले ही दुनिया को तबाही में धकेला, लेकिन अमेरिका के लिए यह महामंदी से बाहर निकलने का मोड़ साबित हुआ।

और आज, जब ट्रंप कहते हैं कि अमेरिका फिर से ऐसी स्थिति में जा सकता है, तो यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं है—यह उस इतिहास की गूंज है जिसने एक अमीर देश को भूख, गरीबी और बेबसी में झोंक दिया था।

Conclusion

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