ज़रा सोचिए… एक ऐसा देश जिसकी आबादी 24 करोड़ से ज़्यादा है, जिसकी भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जाती है, और जिसे कभी अमेरिका का ‘सबसे करीबी सहयोगी’ कहा जाता था — आज उसी देश से बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भाग रही हैं। फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, दफ्तरों में सन्नाटा है, और foreign investors का भरोसा चकनाचूर हो चुका है। सवाल उठता है — ऐसा क्या हुआ कि P&G जैसी दिग्गज कंपनी, जिसने दशकों तक पाकिस्तान में अपना ब्रांड खड़ा किया, अब वहां से कारोबार समेट रही है? और साथ ही, ऐसा क्या है भारत में जो आज दुनिया के लिए एक रोल मॉडल बनता जा रहा है? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
Procter & Gamble यानी P&G ने हाल ही में पाकिस्तान में अपनी मैन्युफैक्चरिंग और कॉमर्शियल गतिविधियाँ पूरी तरह बंद करने की घोषणा कर दी। इसका मतलब सिर्फ एक फैक्ट्री बंद होना नहीं है — इसका मतलब है, एक संकेत, कि अब पाकिस्तान Investors के लिए एक भरोसेमंद ज़मीन नहीं रहा। जो कंपनियां कभी वहां अपना अड्डा जमाती थीं, अब उन्हें वहां रहना घाटे का सौदा लग रहा है। P&G, जो कि जिलेट पाकिस्तान लिमिटेड जैसी सहयोगी कंपनियों के साथ वहां काम कर रही थी, अब अपने ब्रांड्स को क्षेत्रीय चैनलों के ज़रिए पहुंचाएगी — यानी अब पाकिस्तान में वो फिज़िकल रूप से मौजूद नहीं होगी।
इस फैसले को कंपनी ने अपने वैश्विक पुनर्गठन का हिस्सा बताया है, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज़्यादा गहरी और परेशान करने वाली है। जब कोई कंपनी किसी देश को छोड़ती है, तो वो सिर्फ फाइनेंशियल चार्ट नहीं देखती — वो देखती है उस देश की आर्थिक स्थिरता, मुद्रा की स्थिति, राजनीतिक माहौल, बिजली और उत्पादन की लागत, और सबसे अहम — उपभोक्ता शक्ति। पाकिस्तान इन सभी मानकों पर लगातार पिछड़ता गया है। IMF की कड़ी शर्तों, डॉलर की भारी किल्लत, महंगाई, बेरोजगारी, और कमजोर संस्थागत व्यवस्था ने वहाँ की कॉरपोरेट स्पेस को जहरीली ज़मीन में बदल दिया है।
P&G की विदाई कोई इकलौती कहानी नहीं है। इससे पहले शेल, फाइज़र, टोटलएनर्जीज़ और टेलीनॉर जैसी कई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां पाकिस्तान से या तो बाहर जा चुकी हैं या फिर अपना स्केल कम कर चुकी हैं। ये सब मिलकर एक बहुत बड़ा आर्थिक पैटर्न बनाते हैं — जिसे ‘कॉरपोरेट एक्सोडस’ कहा जा सकता है। और ये एक्सोडस सिर्फ इकॉनमी का नहीं है, ये भरोसे, स्थिरता और भविष्य के सपनों का भी है।
अब ज़रा भारत की ओर नज़र डालिए। वही भारत, जिसे भी कभी ‘बड़ी आबादी वाला गरीब देश’ समझा जाता था। वही भारत, जिसने बिना किसी ट्रेड छूट के ट्रंप टैरिफ्स को झेला — फिर भी ना सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा, बल्कि Export, production, investment और रोजगार सभी मोर्चों पर आगे बढ़ता चला गया। जहां पाकिस्तान के लिए IMF एक लाइफलाइन बन गया है, वहीं भारत Global investors का पसंदीदा डेस्टिनेशन बन चुका है।
पाकिस्तान में P&G की शुरुआत 1991 में हुई थी। उस वक्त वहां के बाज़ार में पेपर्स, एरियल, पैंटीन और सेफगार्ड जैसे ब्रांड घर-घर में इस्तेमाल होने लगे थे। कंपनी ने 1994 और 2010 में वहां फैक्ट्रियां लगाईं, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया, और एक पूरी सप्लाई चेन खड़ी की। लेकिन अब वही कंपनी कह रही है कि थर्ड-पार्टी डिस्ट्रीब्यूशन ही समझदारी भरा रास्ता है — यानि खुद वहां रहना अब फायदे का सौदा नहीं रहा।
इस फैसले के पीछे सिर्फ कंपनी की restructuring नहीं, बल्कि वहां की ground realities हैं। महंगी बिजली, खराब infrastructure, अनिश्चित टैक्स नीतियाँ और सबसे बढ़कर — कमजोर मांग। हालात ऐसे हैं कि जिलेट पाकिस्तान का रेवेन्यू अगले वित्तीय वर्ष में 50% तक गिरने की आशंका है। दो साल पहले ये कंपनी 3 अरब रुपए की रिकॉर्ड कमाई कर रही थी। और अब shareholders को खुशी सिर्फ इसलिए है कि कंपनी शायद assets बेचे या delist हो जाए।
P&G के पूर्व सीईओ साद अमानुल्लाह खान ने खुद यह कहा कि ये एक चेतावनी है। उनका बयान है — “उम्मीद करता हूं कि इस तरह की विदाई सरकार को यह समझाएगी कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा।” यानी आवाजें अब अंदर से भी उठ रही हैं, लेकिन लगता है जैसे सत्ता के गलियारों में अब भी आंखों पर पट्टी बंधी है।
वहीं दूसरी तरफ भारत की कहानी बिल्कुल विपरीत है। भारतीय अर्थव्यवस्था ना केवल दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी बन चुकी है, बल्कि वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भी इसकी growth trajectory को sustainable और robust मानती हैं। जब अमेरिका ने टैरिफ वॉर शुरू किया, तब भारत ने झुकने की बजाय अपनी नीतियों को मजबूत किया। Make in India, Digital India, Production-Linked Incentives जैसी योजनाओं ने भारत को manufacturing hub बना दिया है।
आज Apple, Foxconn, Google जैसी टेक्नोलॉजी कंपनियां भारत में अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस शिफ्ट कर रही हैं। पाकिस्तान से भाग रही कंपनियां वहीं भारत में Investment की कतार में खड़ी हैं। क्योंकि यहां rule of law है, पॉलिसी स्थिरता है, और सबसे बड़ी बात — एक ऐसा consumer base है, जिसकी मांग निरंतर बढ़ रही है।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां सरकारें बदलती हैं लेकिन नीति की दिशा नहीं। जहां भारत में एक लंबी अवधि की रणनीति बनाई गई है — जैसे GST लागू करना, U P I को बढ़ावा देना, टैक्स की प्रक्रिया को सरल बनाना — वहीं पाकिस्तान अभी तक fuel subsidy और external debt की दलदल से ही नहीं निकल पाया है।
विदेश मामलों के जानकार सुशांत सरीन ने सोशल मीडिया पर एक तीखा तंज कसा — “पाकिस्तान अब सिर्फ सिक्योरिटी गार्ड और बाउंसर सप्लाई करेगा। वो अब ‘Blackwater’ बनता जा रहा है।” ये एक बहुत कड़वा सत्य है कि पाकिस्तान जैसी बड़ी जनसंख्या वाला देश आज global trade और investment की दौड़ में पूरी तरह पिछड़ गया है।

भारत ने इसी बीच न केवल आर्थिक, बल्कि राजनीतिक मोर्चों पर भी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से दुनिया का विश्वास जीता है। चाहे रूस से तेल खरीदने का मामला हो या अमेरिका के tech decoupling में संतुलन बनाए रखने का मुद्दा — भारत हर मोर्चे पर अपने national interest को सर्वोपरि रखकर decision लेता है।
पाकिस्तान में स्थायित्व की कमी, मुद्रास्फीति का आतंक, भ्रष्टाचार की जड़ें और सत्ता के अंदर माफिया मानसिकता ने एक ऐसा माहौल बना दिया है, जहां कोई भी दीर्घकालिक व्यापार योजना बनाना असंभव है। Investor सिर्फ प्रॉफिट नहीं देखते, वे भविष्य की स्थिरता, राजनीतिक जोखिम और ease of doing business जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखते हैं।
भारत ने इन सभी मोर्चों पर सुधार करके दिखाया है — Global Innovation Index में रैंक सुधरी है, Logistics Performance Index में भारत आगे बढ़ा है, और Ease of Doing Business रैंकिंग में भारत ने 79 से 63 तक की छलांग लगाई है।
सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं को P&G की ये विदाई एक चेतावनी के तौर पर नहीं लेनी चाहिए? क्या उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि कंपनियां सिर्फ short-term मुनाफा देखकर नहीं आतीं, बल्कि long-term vision और policy stability देखकर आती हैं?
भारत ने अपने नीति-निर्माण में जनता और उद्योग दोनों को साथ लेकर चलने की कला सीख ली है। यही कारण है कि अब दुनिया भारत को सिर्फ एक developing nation नहीं, बल्कि एक decisive और dependable economic force के तौर पर देख रही है।
जहां पाकिस्तान में आज भी सरकार IMF की अगली किश्त पर आश्रित है, वहीं भारत foreign currency reserves के मामले में रिकॉर्ड स्तर पर है — 650 अरब से अधिक का रिजर्व, जो लगभग पूरे साल का Import संभाल सकता है।
यही वजह है कि भारत आज ASEAN, EU, Middle East और अमेरिका सभी के साथ FTA यानी Free Trade Agreements पर बातचीत कर रहा है, जबकि पाकिस्तान अभी तक FATF से बाहर निकलने के लिए जद्दोजहद कर रहा है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि यह कहानी सिर्फ एक कंपनी के जाने की नहीं है — यह एक देश की नीति, उसकी सोच और उसके सिस्टम की परीक्षा की कहानी है। और इस परीक्षा में पाकिस्तान बार-बार फेल हो रहा है, जबकि भारत पास होकर दुनिया को अपनी तरफ खींच रहा है।
Conclusion
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