रात के ठीक बारह बजे हैं, दुनिया के अलग-अलग Time Zone में स्क्रीन चमक रही हैं। London, New York, Tokyo, Mumbai… हजारों Traders की आंखें एक ही चीज़ पर टिकी हैं—Exchange Rate। एक छोटी सी Breaking News आती है, और कुछ ही मिनटों में Dollar मजबूत हो जाता है, रुपया गिर जाता है, Yen उछल जाता है।
कोई संसद में फैसला नहीं हुआ, कोई राष्ट्रपति ने बयान नहीं दिया, फिर भी करोड़ों लोगों की जेब पर असर पड़ गया। सवाल यह है कि आखिर यह अदृश्य ताकत कौन है, जो तय करती है कि एक Dollar के बदले आपको कितने रुपये मिलेंगे? क्या यह किसी Central Bank का आदेश है, या यह बाजार की कोई अनदेखी लहर है? डर यह है कि अगर यह खेल समझ में न आए, तो आपकी Savings, Investments और EMI तक हिल सकती है। और जिज्ञासा यह है कि इस खेल का असली खिलाड़ी कौन है।
हम रोज सुनते हैं कि रुपया Dollar के मुकाबले मजबूत हुआ, या फिर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। लेकिन Exchange Rate कोई Fixed Price Tag नहीं है, जिसे कोई एक व्यक्ति या संस्था सुबह तय कर दे। दुनिया के ज्यादातर देश Floating Exchange Rate System अपनाते हैं। इसका मतलब यह है कि Currency की वैल्यू Demand और Supply के आधार पर तय होती है। जिस तरह सब्ज़ी मंडी में अगर टमाटर की मांग ज्यादा हो जाए, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है, ठीक वैसे ही अगर रुपये की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़े, तो रुपया मजबूत हो जाता है।
अब सवाल उठता है कि Demand और Supply आखिर बनती कैसे है। मान लीजिए कि दुनिया के देश भारत से ज्यादा सामान खरीद रहे हैं। उन्हें Payment करने के लिए रुपये की जरूरत होगी। वे अपने Dollar बेचकर रुपये खरीदेंगे। इससे रुपये की Demand बढ़ेगी और उसकी वैल्यू मजबूत होगी। इसके उलट अगर भारत ज्यादा Import कर रहा है, खासकर Oil जैसे जरूरी सामान, तो भारत को Dollar की जरूरत पड़ेगी। तब रुपया बेचकर Dollar खरीदा जाएगा, और रुपया कमजोर हो सकता है।
लेकिन कहानी सिर्फ इतनी सीधी नहीं है। Currency Market, जिसे Foreign Exchange Market या Forex Market कहा जाता है, दुनिया का सबसे बड़ा Financial Market है। Bank for International Settlements के आंकड़ों के अनुसार, हर दिन करीब 7 Trillion Dollar से ज्यादा का Forex Trading होता है। यह Market 24 घंटे खुला रहता है। यहां Banks, Hedge Funds, Corporates, Governments और Individual Traders सब भाग लेते हैं। यानी यह सिर्फ Export-Import का खेल नहीं, बल्कि Speculation, Hedging और Investment का भी खेल है।
अब आते हैं Central Bank की भूमिका पर। भारत में RBI, अमेरिका में Federal Reserve, यूरोप में European Central Bank—ये संस्थाएं अपनी Currency की Stability पर नजर रखती हैं। भले ही Exchange Rate Market Forces से तय होता है, लेकिन Central Bank जरूरत पड़ने पर Intervention कर सकता है। अगर रुपया बहुत तेजी से गिरने लगे, तो RBI अपने Forex Reserves से Dollar बेच सकता है। इससे Market में Dollar की Supply बढ़ेगी और रुपया संभल सकता है। इसी तरह अगर रुपया बहुत ज्यादा मजबूत हो जाए, तो Export प्रभावित हो सकते हैं, तब RBI Dollar खरीदकर Balance बना सकता है।
भारत के पास 2024 के आसपास 600 Billion Dollar से ज्यादा का Forex Reserve रहा है। यह Reserve इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे RBI जरूरत पड़ने पर Market में Intervention कर सकता है। लेकिन Intervention भी Limit में होता है। RBI Exchange Rate को पूरी तरह Control नहीं करता, बल्कि Volatility को Smooth करने की कोशिश करता है। इसे Managed Float कहा जाता है।
Interest Rate भी Currency की वैल्यू को प्रभावित करती है। अगर RBI Repo Rate बढ़ाता है, तो भारत में Investment करना ज्यादा आकर्षक हो सकता है। Foreign Investors अपने Dollar लाकर Indian Bonds या Equity में निवेश करेंगे। इससे रुपये की Demand बढ़ेगी। इसी तरह अगर Federal Reserve US में Interest Rate बढ़ाता है, तो Capital US की ओर लौट सकता है, जिससे Dollar मजबूत हो सकता है और Emerging Market Currencies कमजोर हो सकती हैं।
अब बात करते हैं Reserve Currency की। Dollar को दुनिया की Reserve Currency माना जाता है। IMF के आंकड़ों के अनुसार, Global Foreign Exchange Reserves का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा Dollar में है। Oil Trade, जिसे Petrodollar System कहा जाता है, मुख्यतः Dollar में होता है। इसका मतलब यह है कि Energy Import करने वाले देशों को Dollar की जरूरत होती है। इससे Dollar की Demand स्थिर बनी रहती है। यही कारण है कि Global Crisis के समय भी लोग Dollar की ओर भागते हैं, इसे Safe Haven Currency माना जाता है।
लेकिन दुनिया बदल रही है। Euro, Yuan, Yen भी Global Trade में हिस्सेदारी रखते हैं। China ने Yuan Internationalization की कोशिश की है। BRICS देशों में Local Currency Trade की चर्चा होती रही है। लेकिन Dollar की गहराई और Liquidity अभी भी unmatched है। US Bond Market दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे Liquid Market है। Investors को वहां Safety और Return दोनों का Combination मिलता है। यही Dollar की ताकत है।
अब एक और महत्वपूर्ण Factor है—Inflation। अगर किसी देश में Inflation ज्यादा है, तो उसकी Currency की Purchasing Power घटती है। Investors उस Currency से दूरी बना सकते हैं। लंबे समय में High Inflation Currency Depreciation की ओर ले जाती है। इसलिए Central Banks Inflation Control पर इतना जोर देते हैं। Stable Inflation, Strong GDP Growth और Political Stability—ये तीनों Currency Confidence के Pillars हैं।
Political Risk भी Currency को हिला सकता है। अगर किसी देश में अचानक Election Uncertainty, War या Policy Shock आ जाए, तो Investors Capital निकाल सकते हैं। Capital Outflow से Currency पर दबाव आता है। 1997 का Asian Financial Crisis इसका उदाहरण है, जब Thailand की Baht से शुरू हुआ संकट कई Asian Currencies को गिरा गया। 2008 का Global Financial Crisis, 2013 का Taper Tantrum—इन सब घटनाओं ने दिखाया कि Global Liquidity, और Sentiment Currency Markets को तेजी से बदल सकते हैं।
Foreign Direct Investment और Foreign Portfolio Investment भी Currency की Demand बनाते हैं। जब कोई Multinational Company भारत में Factory लगाती है, तो वह Dollar लाकर रुपये में बदलती है। इससे रुपया मजबूत हो सकता है। लेकिन Portfolio Investment ज्यादा Volatile होता है। अगर Global Risk Appetite घटे, तो FPI तेजी से बाहर निकल सकते हैं, जिससे Currency पर दबाव पड़ता है।
Trade Deficit भी महत्वपूर्ण है। अगर कोई देश ज्यादा Import करता है और कम Export, तो उसे Foreign Currency की जरूरत ज्यादा होगी। इससे उसकी Currency कमजोर हो सकती है। भारत Oil Importer देश है। जब Crude Oil की कीमतें बढ़ती हैं, तो India को ज्यादा Dollar की जरूरत होती है। इससे Current Account Deficit बढ़ सकता है और रुपया दबाव में आ सकता है।
Speculators और Traders भी Currency को Short Term में प्रभावित करते हैं। अगर Market को लगता है कि किसी देश की Economy कमजोर पड़ रही है, तो वे उस Currency को Sell कर सकते हैं। यह Self-Fulfilling Prophecy जैसा हो सकता है। इसलिए Central Banks Communication Strategy पर ध्यान देते हैं। Forward Guidance, Policy Statements—ये सब Market Expectations को Shape करते हैं।
कुछ देश Fixed Exchange Rate System अपनाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ Gulf Countries अपनी Currency को Dollar से Peg करते हैं। इसका मतलब है कि उनकी Currency एक निश्चित Rate पर Dollar से जुड़ी होती है। इससे Stability मिलती है, लेकिन Monetary Policy की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। Floating System में Flexibility होती है, लेकिन Volatility भी हो सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या कोई एक व्यक्ति Exchange Rate तय करता है? जवाब है नहीं। यह लाखों Transactions, Decisions और Expectations का Collective Result है। Market Psychology, Global Politics, Economic Data Releases—सब मिलकर Rate बनाते हैं। हर दिन जब US में Jobs Data आता है, या India का Inflation Data घोषित होता है, तो Forex Market में हलचल होती है।
Currency की Value सिर्फ Economics नहीं, Trust का भी सवाल है। अगर दुनिया को भरोसा है कि किसी देश की Economy मजबूत है, Debt Manageable है और Institutions Stable हैं, तो उसकी Currency पर भी भरोसा होगा। यही कारण है कि Crisis के समय Dollar और Swiss Franc जैसी Currencies में Demand बढ़ जाती है।
India जैसे Emerging Economy के लिए Balance बनाना चुनौती है। Growth चाहिए, Export Competitiveness चाहिए, Inflation Control चाहिए और Currency Stability भी। RBI अक्सर Tightrope Walk करता है—कभी Interest Rate Adjust करके, कभी Forex Intervention करके, कभी Policy Communication के जरिए।
डर यह नहीं कि रुपया कभी गिरेगा या बढ़ेगा। Exchange Rate का Move होना Normal है। असली डर तब होता है जब Move अनियंत्रित और अचानक हो। इसलिए Central Banks Volatility को Smooth करते हैं। लेकिन Long Term Trend Market Fundamentals से ही तय होता है।
अंत में लौटते हैं उस Midnight Screen पर, जहां Exchange Rates चमक रहे थे। वहां कोई एक Controller नहीं बैठा, बल्कि पूरी दुनिया की Collective Mind काम कर रही है। Currency की Value एक Reflection है—Economy की सेहत, Political Stability, Global Trade Dynamics और Investor Sentiment का। यह Invisible Hand का Modern Version है।
जब अगली बार आप सुनें कि रुपया Dollar के मुकाबले मजबूत हुआ या गिर गया, तो समझिए कि इसके पीछे लाखों Transactions, Decisions और Global Forces काम कर रही हैं। Currency की चाल एक दिन में नहीं बनती, यह भरोसे, संतुलन और बाजार की ताकतों से बनती है। और यही इस खेल की सबसे बड़ी सच्चाई है—कि Exchange Rate किसी एक की नहीं, पूरी दुनिया की कहानी है।
Conclusion
सुबह खबर आती है—“रुपया डॉलर के मुकाबले गिर गया।” आपकी जेब में वही पैसे हैं, फिर भी उनकी कीमत बदल गई। डर ये कि क्या आपकी बचत की ताकत कम हो रही है? और जिज्ञासा ये कि आखिर तय कौन करता है कि एक डॉलर के बदले कितने रुपये मिलेंगे? असल में, ज्यादातर देशों में करेंसी की वैल्यू Floating Exchange Rate सिस्टम से तय होती है—यानी Demand और Supply का खेल।
अगर भारत से ज्यादा Export होगा, विदेशी निवेश आएगा, तो रुपये की मांग बढ़ेगी और वह मजबूत होगा। लेकिन Import ज्यादा हुआ, Trade Deficit बढ़ा, तो दबाव पड़ेगा। साथ ही RBI जैसे Central Bank भी Forex Reserves और ब्याज दरों के जरिए दखल देते हैं। राजनीतिक स्थिरता, महंगाई और वैश्विक हालात भी असर डालते हैं। लेकिन जब अचानक कोई बड़ा वैश्विक संकट या युद्ध छिड़ता है… तब बाजार का रुख एक पल में बदल जाता है I
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