ज़रा सोचिए — एक ऐसा देश, जो चांद तक पहुंच चुका है, डिजिटल पेमेंट में दुनिया को पीछे छोड़ चुका है, और जहां हर हफ्ते एक नया यूनिकॉर्न स्टार्टअप जन्म लेता है। लेकिन उसी देश में एक टूटी सड़क किसी बच्चे की जान ले लेती है — और सरकार उसे अगले ही दिन ठीक कर देती है, सिर्फ़ उस जगह तक, जहां कैमरा पहुंच सकता है। कुछ घंटे के लिए व्यवस्था जागती है, और फिर उसी नींद में लौट जाती है, जहां लापरवाही सामान्य है, और संवेदनहीनता स्थायी। यही वह भारत है जिसे देखकर एक स्टार्टअप फाउंडर ने कहा — “मैं भारत के विकास की कहानी पर बहुत उत्साहित था… लेकिन अब नहीं।”
Dhawal Jain, Mave Health नाम की एक mental wellness startup के CEO हैं। एक ऐसा व्यक्ति जो देश के युवाओं को मानसिक रूप से सशक्त बनाना चाहता था, आज उसी व्यवस्था से टूटा हुआ है। उन्होंने X (Twitter) पर लिखा — “सालों तक मुझे लगा कि हम बस एक गरीब देश हैं। कि तरक्की सब ठीक कर देगी। लेकिन अब लगता है कि असली समस्या पैसों की नहीं, सोच की है।” ये शब्द किसी नाराज़ नागरिक के नहीं, बल्कि उस उद्यमी के हैं जिसने भारत को digital, global और powerful होते देखा — पर भीतर से गिरते हुए महसूस किया।
धवल की यह निराशा अचानक नहीं आई। उनके पड़ोसी के बेटे की मौत एक गड्ढे वाली सड़क पर हुए एक्सीडेंट में हो गई। कुछ घंटे में प्रशासन हरकत में आया, गड्ढा भरा गया, फोटो खिंची गई, और बस। दो हफ्ते बाद सड़क फिर वैसे ही टूटी पड़ी थी। धवल ने लिखा — “सोचिए, उस पिता को कैसा लगा होगा। हमने सड़क ठीक की, लेकिन सोच नहीं।” यही वह क्षण था जब उन्हें एहसास हुआ कि भारत की तरक्की का नारा अक्सर cosmetic होता है — सतह चमकती है, लेकिन अंदर की दरारें गहरी होती हैं।
धवल ने अपनी पोस्ट में लिखा — “अगर आपके पास अच्छी नीयत है, तो काम करवाना बुरे सपने जैसा होता है। और अगर आप गलत रास्ता चुनते हैं, तो सब आसान हो जाता है।” ये एक वाक्य भारत के पूरे तंत्र का सार है। क्योंकि यहां ‘ईमानदारी’ एक आदर्श नहीं, बल्कि कमजोरी मानी जाती है। जो व्यक्ति नियमों का पालन करता है, वह धीमा कहलाता है। और जो नियम तोड़ता है, उसे “system se chalak” कहा जाता है।
असल समस्या resources या budget की नहीं है। समस्या mindset की है। हमारे देश में भ्रष्टाचार इतना normal हो चुका है कि अब वह सिर्फ़ अपराध नहीं, एक “process” बन गया है। किसी tender को पास करवाने के लिए, किसी approval को जल्दी लाने के लिए, या किसी छोटी सी सुविधा के लिए रिश्वत देना अब अपराध नहीं, संस्कृति बन चुकी है। यही वह “corrupt system” है जिससे धवल जैसे लोग निराश हो रहे हैं।
धवल जैन ने आगे लिखा — “मैं नागरिकों को दोष नहीं देता, यह व्यवस्था ही ऐसी है जो अच्छे लोगों को हताश कर देती है।” यह बात गहराई से समझने लायक है। जब कोई ईमानदार अधिकारी भ्रष्ट माहौल में काम करता है, तो या तो वह टूट जाता है या फिर सिस्टम का हिस्सा बन जाता है। और यही vicious cycle हर स्तर पर दोहराई जाती है — चाहे पंचायत हो या संसद।
भारत के शहरों में हर चुनाव से पहले सफाई अभियान चलता है, गड्ढे भरे जाते हैं, और मीडिया में तस्वीरें आती हैं। लेकिन असली सुधार कभी नहीं होता। नेता और अधिकारी दिखावे के लिए काम करते हैं — स्थायी सुधार के लिए नहीं। धवल कहते हैं, “हम सफाई की बात करते हैं, लेकिन गंदगी सिर्फ़ जमीन पर नहीं, सोच में है।” ये वो सच्चाई है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
धवल की बात सिर्फ़ सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। एक उद्यमी के नज़रिए से देखें तो भ्रष्टाचार innovation को मार देता है। क्योंकि जब किसी startup founder को अपना 50% समय permissions, approvals और licenses में लगाना पड़ता है, तो creativity मर जाती है। यही कारण है कि भारत में आज भी कई innovations बाहर जन्म लेते हैं — Silicon Valley में, Singapore में, या London में — क्योंकि वहां “system” innovation को रोकता नहीं, बढ़ाता है।

धवल का कहना है कि भारत अब भी automation और AI को लेकर तैयार नहीं है। हमारे policy makers technology को threat की तरह देखते हैं, opportunity की तरह नहीं। वो कहते हैं — “AI लाखों नौकरियां खत्म करेगा, लेकिन सरकारें अब भी उसी रफ्तार से सोच रही हैं जिस रफ्तार से 1980 में सोचा जाता था।” ये अंतर केवल समय का नहीं, सोच का है।
और यही disconnect भारत की असली समस्या है — ground reality और grand vision के बीच। ऊपर से हम Space Power हैं, नीचे से basic infrastructure में फेल हैं। ऊपर से हम Digital India हैं, नीचे से एक document attestation के लिए तीन दफ्तर घूमने पड़ते हैं।
धवल जैन ने लिखा — “हम automation और efficiency की बातें करते हैं, लेकिन government offices में अब भी files धूल खा रही हैं।” यही कारण है कि उनके जैसे कई युवा अब देश की व्यवस्था पर भरोसा खो रहे हैं।
फिर भी, धवल पूरी तरह निराश नहीं हैं। उन्होंने लिखा — “उम्मीद की किरण हमारे entrepreneurs हैं। जो system बना रहे हैं, healthcare सुधार रहे हैं, और research में निवेश कर रहे हैं।” उनके मुताबिक, भारत में असली बदलाव सरकार नहीं, startups ला रहे हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि इन्हीं startups को system सबसे ज्यादा रोकता है।
वो कहते हैं — “अगर कोई युवा honest होकर काम करना चाहता है, तो system उसे परेशान करता है। और अगर कोई shortcut लेता है, तो वही successful कहलाता है।” यह paradox सिर्फ़ business में नहीं, हर क्षेत्र में है। शिक्षक, डॉक्टर, अफसर, पत्रकार — सभी इस दोराहे पर हैं।
धवल के अनुसार, “भारत में leadership की समस्या है। हमारे नेता वो नियम नहीं मानते जो वो जनता पर थोपते हैं।” यह hypocrisy व्यवस्था की जड़ में है। और जब शीर्ष स्तर पर ईमानदारी नहीं होती, तो नीचे उम्मीद नहीं बचती।फिर भी धवल की बात में एक आत्मा है — एक जिम्मेदारी का भाव। वो कहते हैं — “मैं गुस्से में नहीं हूं। मैं privileged हूं कि private system में रह सकता हूं। लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरा देश बेहतर करे।” यह बयान किसी शिकायत का नहीं, एक दर्द का है।
उनकी आखिरी पंक्ति थी — “मुझे उम्मीद है कि किसी और ब्रह्मांड में भारत फल-फूल रहा होगा, क्योंकि मुझे सच में विश्वास है कि वो कर सकता है।” यह लाइन व्यंग्य और उम्मीद दोनों का मिश्रण है। शायद वो यह कहना चाहते हैं कि भारत में बदलाव की क्षमता तो है, लेकिन इरादा नहीं।
यह कहानी केवल धवल जैन की नहीं है। यह हर उस भारतीय की है जिसने कभी अपने देश के लिए गर्व महसूस किया, पर आज व्यवस्था से थक चुका है। हर उस युवा की है जिसने अपने सपनों को फाइलों और हस्ताक्षरों के बीच खो दिया।

भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन क्या विकास का मतलब सिर्फ़ GDP है? क्या विकास वो नहीं जब कोई व्यक्ति बिना रिश्वत दिए अपना हक़ पा सके? जब सड़क पर कोई गड्ढा किसी बच्चे की जान न ले? जब कोई उद्यमी बिना डर और अपमान के अपना काम कर सके?
सवाल यही है — क्या भारत की कहानी केवल रिपोर्ट्स और विज्ञापनों में चमकदार है, या ज़मीन पर भी? धवल जैन की पोस्ट ने सोशल मीडिया पर एक बहस छेड़ दी — कोई बोला, “भ्रष्टाचार तो हर देश में है।” कोई बोला, “कम से कम अब बोलने की हिम्मत तो है।” लेकिन सच्चाई ये है कि इस बहस से ज़्यादा ज़रूरत है कार्रवाई की। क्योंकि भ्रष्टाचार सिर्फ़ सरकार की गलती नहीं, समाज की भी है।
जब हम किसी छोटे काम के लिए “चलो थोड़ा दे दो” कहकर बात खत्म कर देते हैं, तब हम उसी भ्रष्ट व्यवस्था को पोषित कर रहे होते हैं। बदलाव दूसरों से नहीं, खुद से शुरू होता है। अगर हम चाहते हैं कि भारत सच में विकसित हो, तो हमें नारे नहीं, आदतें बदलनी होंगी। हमें ईमानदारी को फिर से सम्मान देना होगा। हमें यह समझना होगा कि shortcut से बना देश कभी long-term नहीं टिकता।
धवल जैन जैसे लोगों की बात इसलिए जरूरी है, क्योंकि वो असुविधाजनक सच्चाई कह रहे हैं। वो याद दिला रहे हैं कि “विकास” सिर्फ़ GDP या skyscraper नहीं होता, बल्कि भरोसा होता है — उस नागरिक का भरोसा जो जानता है कि उसका देश उसके साथ न्याय करेगा। आज भी देर नहीं हुई। अगर भारत अपने अंदर झांके — अपनी नीतियों, सिस्टम और नैतिकता पर पुनर्विचार करे — तो यह वही देश बन सकता है जिसका सपना गांधी, अब्दुल कलाम, और आज के उद्यमियों ने देखा था।
भ्रष्टाचार से लड़ाई सिर्फ़ कानून से नहीं, मानसिकता से जीतनी होगी। जब हर नागरिक ये ठान ले कि “मैं हिस्सा नहीं बनूंगा”, तब असली आज़ादी मिलेगी। और शायद तब धवल जैन जैसे लोग फिर कहेंगे — “मैं भारत की विकास की कहानी पर बहुत उत्साहित हूं… और इस बार सच में।”
Conclusion
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