चारों ओर एक अजीब सी खामोशी थी… जैसे बैंकिंग जगत किसी तूफान से पहले की शांति में डूबा हो। अचानक एक खुलासा सामने आया जिसने सबको चौंका दिया। एक ऐसा खुलासा जो न सिर्फ दो दिग्गज Financial institutions की किस्मत बदल सकता था, बल्कि भारत के बैंकिंग इतिहास को भी नया मोड़ दे सकता था।
HDFC के पूर्व चेयरमैन दीपक पारेख ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि, एक समय था जब आईसीआईसीआई बैंक की प्रमुख चंदा कोचर ने खुद उन्हें प्रस्ताव दिया था—HDFC और आईसीआईसीआई को मिलाने का। यह कोई आम बातचीत नहीं थी, बल्कि एक ऐसा ऑफर था, जो अगर स्वीकार कर लिया जाता, तो भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट बैंकिंग डील बन सकता था। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
सबसे पहले आपको बता दें कि यह वो समय था जब HDFC ने अभी तक अपनी ही बैंकिंग यूनिट HDFC बैंक के साथ Merger नहीं किया था। पारेख ने बताया कि चंदा कोचर ने बड़े ही सहज अंदाज में कहा था—”ICICI ने ही तो HDFC की नींव रखी थी, तो क्यों न घर वापसी कर लो?” लेकिन इस मासूम-सी लगने वाली बात के पीछे एक गहरी रणनीति छुपी थी। यह प्रस्ताव अगर स्वीकार कर लिया जाता, तो न सिर्फ HDFC की स्वतंत्र पहचान खत्म हो जाती, बल्कि पूरे प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर का स्वरूप भी बदल जाता।
दीपक पारेख ने उस पल को याद करते हुए बताया कि यह बात कभी भी सार्वजनिक नहीं हुई थी। लेकिन अब, जब HDFC और HDFC बैंक का Merger पूरा हो चुका है, तब उन्होंने इसे सबके सामने रखने का फैसला किया। उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने उस वक्त चंदा कोचर के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि यह उचित नहीं होगा। HDFC की अपनी एक अलग पहचान, संस्कृति और बैंकिंग ढांचा है, जिसे किसी और संस्थान में समाहित कर देना एक तरह से उसकी आत्मा को मिटा देना होता।
यह कहानी सिर्फ दो बैंकों के बीच एक प्रस्ताव की नहीं है। यह कहानी है भारत की वित्तीय प्रणाली की आत्मनिर्भरता, अपनी पहचान की रक्षा और नियामकीय जटिलताओं से जूझते हुए एक संतुलित निर्णय की। क्योंकि जो मर्जर अंततः हुआ, वो ICICI और HDFC के बीच नहीं था, बल्कि HDFC और उसके अपने ही बैंकिंग यूनिट HDFC बैंक के बीच हुआ। और वो भी तब, जब Regulatory pressure इतना अधिक हो गया था कि कोई और रास्ता बचा ही नहीं था।
2023 में जब HDFC और HDFC बैंक का Merger हुआ, तो उसे किसी कॉर्पोरेट महत्वाकांक्षा की बजाय RBI की मजबूरी से प्रेरित निर्णय माना गया। RBI ने साफ किया था कि ऐसी बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां, जिनकी संपत्ति 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो, उन्हें देश की वित्तीय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण माना जाएगा। पहले यह सीमा 50,000 करोड़ रुपये थी।
दीपक पारेख ने स्वीकार किया कि RBI ने इस Merger में उनका समर्थन किया, लेकिन कोई छूट, कोई विशेष राहत नहीं दी। उन्होंने कहा, “RBI ने हमें पुश किया, मदद की, लेकिन न कोई रियायत दी, न ही समय। हमें खुद से प्रक्रिया पूरी करनी थी, सभी अनुमतियां लेनी थीं और नियामकीय मानदंडों का पालन करना था।”
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि यह पूरा मर्जर बेहद गुप्त रखा गया था। किसी को इसकी भनक तक नहीं थी। सिर्फ कुछ वकील, ड्यू डिलिजेंस करने वाली टीम और अकाउंटेंट्स को इसकी जानकारी थी। सरकार को इसकी जानकारी थी क्योंकि RBI उनके सीधे संपर्क में था। लेकिन बाज़ार और मीडिया को इसकी भनक तक नहीं लगी। जब यह खबर सुबह की अखबारों में छपी, तभी दुनिया को इस डील की सच्चाई पता चली।
दीपक पारेख ने कहा कि मर्जर वाले दिन उन्हें दो भावनाएं घेर रही थीं—एक तरफ दुख था कि HDFC एक स्वतंत्र इकाई के रूप में खत्म हो रही है, और दूसरी तरफ संतोष भी था कि भारत को अब एक ऐसा बैंक मिलेगा, जो global level पर Competition कर सकेगा। उन्होंने कहा, “देखिए, चीन के बैंक कितने बड़े हैं। हमें भी बड़े सोचना होगा। अगर हमें वैश्विक मंच पर मुकाबला करना है, तो हमारे बैंकों को भी आकार में बड़ा बनना होगा।”
HDFC और ICICI की यह कहानी जितनी बैंकिंग की है, उतनी ही राजनीति, रणनीति और इमोशन की भी है। चंदा कोचर का प्रस्ताव किसी भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक था—”घर वापस आ जाओ”—लेकिन दीपक पारेख ने उस प्रस्ताव को यह सोचकर अस्वीकार किया कि एक ब्रांड की स्वतंत्रता उससे कहीं अधिक जरूरी है।
दिलचस्प बात यह है कि ICICI बैंक की पूर्ववर्ती संस्था ICICI लिमिटेड ने ही कभी HDFC को शुरुआती फंडिंग दी थी। यह रिश्ता काफी पुराना था, और शायद इसी पुराने रिश्ते को आधार बनाकर चंदा कोचर ने प्रस्ताव रखा था। लेकिन बिजनेस में भावनाएं नहीं, रणनीति काम करती है। और पारेख ने रणनीति को चुना।
1 जुलाई 2023 को जब HDFC और HDFC बैंक का Merger हुआ, तो 44 वर्षों की स्वतंत्र संस्था HDFC लिमिटेड इतिहास का हिस्सा बन गई। यह मर्जर भारत के बैंकिंग सेक्टर के लिए मील का पत्थर था। लेकिन इसकी जड़ें बहुत पहले ICICI और HDFC के बीच हुई उस अनकही बातचीत में थीं, जो अगर हां में बदल जाती, तो शायद आज हम किसी और ही बैंकिंग मैप को देख रहे होते।
दीपक पारेख ने इंटरव्यू में एक और महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने बीमा सेक्टर को ‘सबसे कम समझा गया’ सेक्टर बताया। उन्होंने कहा कि कई बैंक सिर्फ ऊंचे कमीशन के लालच में गलत बीमा पॉलिसियां बेचते हैं, जिससे ग्राहकों को नुकसान होता है। यह बात उन्होंने इसीलिए कही क्योंकि Merger के बाद एकीकृत बैंक की जिम्मेदारियां और जवाबदेही और बढ़ जाएंगी, और ग्राहक सेवा का स्तर बनाये रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
उनका यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि बैंकिंग सिर्फ बैलेंस शीट और आंकड़ों की दुनिया नहीं है, बल्कि यह भरोसे और पारदर्शिता की भी दुनिया है। और जब बड़े मर्जर होते हैं, तो यह ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है कि ग्राहकों के हितों की रक्षा की जाए।
दीपक पारेख की यह पूरी कहानी न सिर्फ एक सच्चाई को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे एक दूरदर्शी नेता सही समय पर सही फैसले लेकर एक संस्था की पहचान को बचा सकता है।
अगर चंदा कोचर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया होता, तो HDFC शायद ICICI की शाखा बनकर रह जाती। लेकिन आज HDFC बैंक देश का सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक है, जो खुद की एक अलग पहचान के साथ काम कर रहा है।
यह कहानी उन सभी प्रोफेशनल्स के लिए भी एक सीख है जो कभी भावनाओं में तो कभी तात्कालिक फायदे में आकर निर्णय ले लेते हैं। पारेख ने दिखा दिया कि लॉन्ग टर्म सोच और ब्रांड वैल्यू की समझ हो तो किस तरह एक संस्थान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।
अब जब भारत का बैंकिंग सेक्टर एक नए युग में प्रवेश कर चुका है, जहां मर्जर और अधिग्रहण आम होते जा रहे हैं, यह जरूरी हो जाता है कि हर ऐसा निर्णय सिर्फ आंकड़ों पर नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, ग्राहक हित और संस्थागत सम्मान को ध्यान में रखकर लिया जाए। और अंत में, दीपक पारेख की यह बात हमें सोचने पर मजबूर कर देती है—कि कभी-कभी ‘ना’ कहना ही सबसे सही निर्णय होता है।
Conclusion
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