Inspiring: Developing Country अमेरिकी दबाव के आगे झुका चीन? छोड़ दिया Developing Country का दर्जा। 2025

ज़रा सोचिए… वो देश जिसने बीते चार दशकों में खुद को गरीबी से निकालकर एक Global economic power बना दिया, जिसने अपनी सस्ती लेबर, विशाल उत्पादन क्षमता और सरकारी नीतियों की मदद से पूरी दुनिया के बाज़ारों पर कब्ज़ा कर लिया—वही चीन अब यह कह रहा है कि वह ‘developing country’ नहीं रहा।

यह घोषणा न सिर्फ़ चीन की छवि को बदल देती है, बल्कि पूरे Global trade system को भी हिला देती है। लेकिन सवाल ये है कि क्या चीन ने सच में स्वेच्छा से यह दर्जा छोड़ा है, या फिर अमेरिका के दबाव के आगे झुक गया है? और इससे भारत जैसे देशों पर क्या असर पड़ेगा? आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।

सालों से अमेरिका का आरोप था कि चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद ‘developing country’ का लेबल लगाकर विश्व व्यापार संगठन (WTO) से मिलने वाली ढेर सारी रियायतें ले रहा है। यह रियायतें उन देशों को दी जाती हैं जिन्हें गरीबी, अविकसित उद्योग और सीमित संसाधनों के चलते Global competition में बराबरी का मौका नहीं मिल पाता। लेकिन चीन, जो स्पेस मिशन से लेकर 5G तकनीक तक में अमेरिका और यूरोप को चुनौती देता है, वही खुद को गरीब देशों की लाइन में खड़ा दिखाता था। अमेरिका को यह हमेशा से अनुचित लगा।

अब चीन ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि वह WTO में विशेष छूटों की मांग नहीं करेगा। प्रधानमंत्री ली कियांग ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में यह घोषणा की। यह निर्णय पहली नज़र में भले ही चीन की मजबूती और आत्मविश्वास को दिखाता हो, लेकिन पर्दे के पीछे इसमें अमेरिका का दबाव और Global politics की बड़ी भूमिका छिपी है। डोनाल्ड ट्रंप से लेकर जो बाइडेन तक, हर अमेरिकी प्रशासन लगातार चीन को घेरता रहा है—टैरिफ बढ़ाकर, टेक कंपनियों पर पाबंदी लगाकर और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठाकर। आखिरकार, चीन को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।

चीन की दलील दिलचस्प है। वह कहता है कि भले ही उसकी अर्थव्यवस्था का आकार विशाल हो, लेकिन प्रति व्यक्ति आय अभी भी पश्चिमी देशों के मुकाबले बहुत कम है। औसत चीनी नागरिक की कमाई, अमेरिकी या यूरोपीय नागरिकों की तुलना में कहीं कम है। यानी चीन खुद को “मध्यम आय वाला देश” मानता है।

लेकिन असलियत यह भी है कि चीन आज पूरी दुनिया के developing countries को कर्ज़ और तकनीकी सहायता देने वाला सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में चीन की कंपनियां सड़कें, पुल, रेलवे और बंदरगाह बना रही हैं। “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” के ज़रिए चीन ने developing countries की नब्ज़ पकड़ ली है। तो सवाल यह उठता है—क्या ऐसा देश अब भी ‘विकासशील’ कहलाने का हकदार है?

WTO की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो-इवेला ने चीन के इस कदम को “सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया। अमेरिका और यूरोप ने भी इसे सकारात्मक माना। लेकिन developing countries में चिंता फैल गई। भारत, ब्राज़ील, इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका जैसे देशों को लग रहा है कि चीन अब उनकी पंक्ति से अलग होकर पूरी तरह विकसित दुनिया की तरफ़ खड़ा हो गया है। यह बदलाव उन सभी देशों के लिए भी चुनौती है जो WTO में अपनी मांगें उठाने के लिए चीन को अपने साथ खड़ा देखते थे।

इस फैसले का एक और बड़ा असर है—Global trade balance पर। WTO का अस्तित्व पिछले कुछ वर्षों में संकट में था। Protectionism, टैरिफ वॉर और राजनीतिक टकराव ने इसे लगभग पंगु बना दिया था। अमेरिका ने बार-बार सवाल उठाए कि WTO पुराने नियमों पर चल रहा है, जबकि दुनिया बदल चुकी है। ऐसे समय में चीन का यह कदम WTO में नई जान डाल सकता है। यह संदेश देता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब खुद को बराबरी के स्तर पर मानती है और Global नियमों को मजबूत बनाने के लिए तैयार है।

लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। अमेरिका ने लंबे समय से चीन को “चीटिंग” का आरोपी ठहराया है। वॉशिंगटन का कहना था कि चीन, “डेवलपिंग नेशन” टैग के चलते सब्सिडी, ट्रेड प्रोटेक्शन और अन्य ढील लेता है, जिससे उसके एक्सपोर्ट्स और भी सस्ते हो जाते हैं और बाकी देशों की इंडस्ट्री तबाह हो जाती है। भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री से लेकर अफ्रीका की छोटी कंपनियों तक, सबने चीन की इस ताकत का नुकसान झेला है। अमेरिका ने यह दबाव बनाया कि अगर चीन खुद को ‘डेवलपिंग’ कहेगा तो वह WTO सुधारों को स्वीकार नहीं करेगा। अब चीन का झुकना इस दबाव का सीधा नतीजा लगता है।

इस पूरे घटनाक्रम को भारत के नजरिए से देखना भी जरूरी है। भारत WTO में अक्सर चीन और अन्य developing countries के साथ खड़ा होता रहा है। सब्सिडी, Agricultural conservation और तकनीकी सहायता के मुद्दे पर भारत ने हमेशा यही तर्क दिया है कि, जब तक हमारी अर्थव्यवस्था और आम नागरिक विकसित देशों के स्तर तक नहीं पहुँचते, तब तक हमें छूट मिलनी चाहिए। लेकिन अब चीन का हटना भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है। भारत को अब अकेले या छोटे देशों के साथ मिलकर अपनी बात रखनी होगी। यह कूटनीतिक और आर्थिक, दोनों स्तर पर चुनौती है।

इतिहास में झांके तो चीन हमेशा से “डुअल फेस” रणनीति अपनाता रहा है। एक तरफ़ वह खुद को गरीब और विकासशील बताता है ताकि रियायतें मिलें, दूसरी तरफ़ वह हाई-टेक्नोलॉजी, सैन्य ताकत और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश से Global नेतृत्व की होड़ में शामिल रहता है। यही कारण है कि चीन के इस नए फैसले को लेकर संदेह भी है। क्या चीन सचमुच विकासशील दर्जा छोड़ देगा? या फिर केवल औपचारिक घोषणा करके वह अपने हितों को सुरक्षित रखने के रास्ते ढूंढ लेगा? इतिहास गवाह है कि चीन कभी भी अपनी रणनीति पूरी तरह पारदर्शी नहीं रखता।

इस पूरे मामले का असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। भू-राजनीति पर भी इसका सीधा असर होगा। अमेरिका को यह जीत के तौर पर दिखेगा, लेकिन चीन इसे अपने “Global नेतृत्व” की कहानी के हिस्से के तौर पर पेश करेगा। developing countries के बीच चीन अब कहेगा कि देखो, मैंने तुम्हारे लिए जितना हो सकता था किया, अब मैं एक नई भूमिका निभाने जा रहा हूँ। वहीं विकसित देश इसे इस तरह पेश करेंगे कि चीन आखिरकार सच मानने पर मजबूर हुआ। यह “नैरेटिव वॉर” आने वाले समय में और तेज़ होगी।

चीन का यह फैसला उस दौर में आया है जब पूरी दुनिया “टैरिफ वॉर” और “ग्लोबल मंदी” की आहट से जूझ रही है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध ने पहले ही सप्लाई चेन को हिला दिया है। यूरोप में ऊर्जा संकट और युद्ध की वजह से महंगाई बढ़ी है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है और खतरा भी। अवसर इसलिए कि चीन के हटने से भारत WTO में ज्यादा नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। खतरा इसलिए कि अगर Global trade balance बिगड़ता है, तो भारत की निर्यात-आधारित इंडस्ट्री पर भी असर होगा।

अंततः, यह फैसला केवल चीन का दर्जा बदलने तक सीमित नहीं है। यह Global business की नई तस्वीर पेश करता है। यह दिखाता है कि अमेरिका का दबाव और चीन की रणनीति दोनों मिलकर किस तरह दुनिया की अर्थव्यवस्था को नए रास्ते पर धकेल सकते हैं। आने वाले सालों में WTO में और भी बड़े सुधार देखने को मिल सकते हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यही रहेगा—क्या चीन सचमुच अपनी पुरानी आदतें छोड़ेगा, या यह सिर्फ़ एक राजनीतिक चाल है?

कहानी का यही मोड़ हमें याद दिलाता है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कोई भी फैसला सीधा-सपाट नहीं होता। हर कदम के पीछे कई परतें होती हैं—ताकत, दबाव, रणनीति और भविष्य की योजनाएं। चीन का यह फैसला भी उसी जटिल खेल का हिस्सा है। और आने वाले समय में यह तय करेगा कि Global व्यापार और शक्ति संतुलन किस दिशा में बढ़ेगा।

Conclusion

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