कल्पना कीजिए… एक दिन आप अपने फोन पर स्विगी खोलते हैं, कुछ स्वादिष्ट खाने की तलाश में। आपकी उंगलियां खुद-ब-खुद बिरयानी वाले सेक्शन पर रुक जाती हैं। दर्जनों ऑप्शन हैं, लेकिन आपकी नजर उस एक नाम पर टिक जाती है—Biryani By Kilo। आप जानते हैं कि हांडी में गरमा गरम बिरयानी आएगी, और वो भी बिल्कुल उसी फ्लेवर में जैसे हैदराबाद या लखनऊ की गलियों में मिलती है।
लेकिन उसी समय एक खबर ब्रेक होती है—Biryani By Kilo बिक गई! 894 करोड़ की वैल्यू वाली कंपनी अब किसी और के अधीन है। आखिर ऐसा क्या हुआ जो देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती बिरयानी ब्रांड्स में से एक ने अचानक खुद को बेचने का फैसला किया? यह सिर्फ एक डील नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक पूरी कहानी थी… और यही कहानी आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं।
भारत में बिरयानी सिर्फ एक व्यंजन नहीं है, यह एक एहसास है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक, बिरयानी हर जगह लोगों के दिलों में बसी हुई है। यह वो व्यंजन है जिसे कोई कभी मना नहीं करता। इसकी खुशबू ही दिल जीत लेती है और इसका स्वाद—वो तो शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
यही वजह है कि जोमैटो और स्विगी जैसे बड़े फूड डिलीवरी ऐप्स पर सबसे ज्यादा ऑर्डर बिरयानी के ही आते हैं। हर मिनट कोई न कोई बिरयानी ऑर्डर कर रहा होता है। यह एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक क्रेज बन चुका है। और इसी क्रेज को एक बिजनेस आइडिया में बदलने का सपना देखा दो युवाओं ने—विशाल जिंदल और कौशिक रॉय ने।
विशाल जिंदल—एक आईआईटी ग्रैजुएट, और कौशिक रॉय—एक अनुभवी मार्केटिंग एक्सपर्ट। दोनों की नौकरियां अच्छी चल रही थीं, सैलरी बढ़िया मिल रही थी, लेकिन दिल के किसी कोने में एक सवाल था—क्या हम सिर्फ नौकरी के लिए बने हैं या कुछ बड़ा करने के लिए? और यही सवाल बना उनके स्टार्टअप का बीज। उन्होंने सोचा क्यों न भारत की सबसे पसंदीदा डिश—बिरयानी—को एक ब्रांड में बदला जाए। ऐसा ब्रांड जो न सिर्फ स्वाद दे, बल्कि एक अनुभव भी परोसे। इसी सोच के साथ 2015 में ‘Biryani By Kilo’ की शुरुआत हुई।
लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। एक IIT ग्रैजुएट जब कहता है कि वो बिरयानी बेचेगा, तो समाज उसे संदेह की निगाहों से देखता है। “इतनी पढ़ाई करके यही करना था?” जैसे सवाल हर दिन सुनने को मिलते थे। लेकिन विशाल और कौशिक जानते थे कि अगर देश टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग को अपना रहा है, तो वो अपने खाने की आदतों में भी बदलाव लाने को तैयार है—बशर्ते उसे क्वालिटी, स्वाद और भरोसा मिले। उन्होंने बिजनेस मॉडल तैयार किया—क्लाउड किचन, ऑर्डर ऑन डिमांड, और हर ऑर्डर पर ताजा, दम वाली हांडी में बिरयानी। ग्राहक को सिर्फ खाना नहीं, पूरा अनुभव देना था।
Biryani By Kilo ने शुरुआत में सिर्फ चार तरह की बिरयानी पेश की—हैदराबादी, लखनवी, कोलकाता और गुंटूर। हर फ्लेवर को खास experts की देखरेख में तैयार किया जाता था। उनकी टीम ने पूरे देश से मसाले मंगवाए, शेफ्स को ट्रेनिंग दी और सुनिश्चित किया कि हर हांडी का स्वाद एक जैसा हो, चाहे वह दिल्ली में बन रही हो या बेंगलुरु में। ब्रांड ने अपने ग्राहकों को वह अनोखी बात दी, जो बाजार में बाकी किसी से नहीं मिलती थी—एक अनुभव, जो घर बैठे बिरयानी की आत्मा को जिंदा कर दे।
कुछ ही समय में Biryani By Kilo ने तेजी से अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। सोशल मीडिया पर अच्छे रिव्यू आने लगे, फूड ब्लॉग्स में इसका जिक्र होने लगा और ग्राहकों की जुबान पर इसका नाम चढ़ने लगा। हर महीने की बिक्री लाखों में पहुंचने लगी। और फिर कंपनी ने एक के बाद एक कई शहरों में अपने क्लाउड किचन खोल दिए। ये किचन फिजिकल रेस्टोरेंट्स की तरह नहीं थे, लेकिन डिलीवरी के लिए पूरी तरह से सक्षम थे। इससे उनका ऑपरेशन स्केलेबल हो गया और लागत भी कम रही। यही स्मार्टनेस थी जिसने इस ब्रांड को खास बना दिया।
आज जब आप देखेंगे, तो पाएंगे कि Biryani By Kilo भारत के 45 से ज़्यादा शहरों में 100 से ज़्यादा आउटलेट्स चला रही है। हर महीने कंपनी का रेवेन्यू 22 से 25 करोड़ रुपये के बीच होता है। इस बिजनेस मॉडल ने इतने बड़े Investors को आकर्षित किया कि कंपनी की वैल्यूएशन करीब 894 करोड़ तक पहुंच गई। यानी एक दशक के अंदर एक डिश ने एक सपना खड़ा कर दिया। लेकिन तभी एक खबर आती है—Biryani By Kilo बिक गई है!
खबर सुनते ही लोगों के बीच सवाल उठने लगे। क्या कंपनी घाटे में जा रही थी? क्या फाउंडर्स थक गए थे? क्या कोई दबाव था? लेकिन असली कहानी कुछ और थी। इसे खरीदा था Devyani International ने। वही Devyani जो भारत में KFC, Pizza Hut और Costa Coffee जैसे इंटरनेशनल ब्रांड्स को चलाती है। भारत में ही नहीं, नेपाल और नाइजीरिया जैसे देशों में भी इसका मजबूत नेटवर्क है। 900 से ज्यादा KFC स्टोर्स, 580 से ज्यादा Pizza Hut आउटलेट्स, 190 से ज्यादा Costa Coffee कैफे—देवयानी भारत के सबसे बड़े फूड एंड बेवरेज प्लेयर्स में से एक है।
अब सवाल है कि देवयानी ने क्यों खरीदा एक लोकल बिरयानी ब्रांड? कारण था—भारत का स्वाद और उसकी संभावनाएं। विदेशी फास्ट फूड ब्रांड्स की लोकप्रियता अपनी जगह है, लेकिन भारतीय खाने का अपना अलग ही चार्म है। खासकर बिरयानी जैसी डिश, जो सदियों से भारत के हर कोने में लोकप्रिय रही है। Devyani International ने महसूस किया कि अगर वो इंडियन ट्रडिशनल फूड कैटेगरी में प्रवेश करना चाहते हैं, तो Biryani By Kilo से बेहतर शुरुआत कोई नहीं हो सकती। यह डील उनके लिए सिर्फ बिजनेस नहीं, बल्कि ब्रांड पोर्टफोलियो को मजबूत करने की रणनीति थी।
Biryani By Kilo के फाउंडर्स विशाल और कौशिक को भी यह समझ में आ गया था कि अब कंपनी को एक ऐसे पार्टनर की जरूरत है, जो न केवल पैसे लगाए, बल्कि स्केलिंग और इंटरनेशनल विस्तार की रणनीति भी दे सके। यही वजह रही कि उन्होंने अपने सपने को Devyani के हाथों सौंप दिया, ताकि यह सपना और बड़ा बन सके।
हालांकि डील की फाइनेंशियल डिटेल्स सार्वजनिक नहीं की गई हैं, लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि यह डील 500 से 700 करोड़ के बीच में हुई है। इसका मतलब यह है कि दोनों फाउंडर्स को न सिर्फ मुनाफा मिला, बल्कि कंपनी को एक ऐसा कंधा मिला जो इसे इंटरनेशनल स्टेज पर ले जा सकता है।
लेकिन जैसे ही डील हुई, सोशल मीडिया पर एक सवाल उठने लगा—क्या अब Biryani By Kilo का स्वाद पहले जैसा रहेगा? क्या बड़ी कंपनी के आने से वह देसी टच खत्म हो जाएगा? क्या उस मिट्टी की हांडी में अब भी वही खुशबू आएगी? यह सवाल जायज हैं। क्योंकि जब कोई स्टार्टअप किसी बड़े ब्रांड के हाथों बिकता है, तो उसकी आत्मा कहीं न कहीं खतरे में आ जाती है। लेकिन Devyani ने स्पष्ट किया है कि वह Biryani By Kilo की मूल पहचान को नहीं बदलेंगे, बल्कि उसे और मजबूती देंगे।
इस डील से एक और बात साबित होती है—कि भारत में फूड इंडस्ट्री में अभी भी बड़े मौके हैं। अगर आपके पास क्वालिटी, कंसिस्टेंसी और एक्सपीरियंस है, तो आप किसी भी आइडिया को अरबों का बिजनेस बना सकते हैं। और सबसे बड़ी बात—फूड में इनोवेशन करना सिर्फ शेफ्स का काम नहीं, बिजनेस माइंड का भी है।
Conclusion
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