Anil Ambani की अदम्य जिजीविषा — Distance, Decline… और वह अदृश्य लड़ाई जिसका सच कोई खुलकर नहीं बताता I 2025

कल्पना कीजिए उस इंसान की, जो कभी दुनिया के टॉप 10 सबसे अमीर लोगों में था। जिसकी कंपनियों के नाम से शेयर मार्केट में तूफान आ जाता था। जिसके एक बयान से करोड़ों लोगों का भविष्य बदल जाता था। लेकिन उसी इंसान को आज अपनी ही बनाई कंपनियों से दूर किया जा रहा है। उसका नाम बोर्ड्स से हटाया जा रहा है। उसकी पैदाइशी पहचान — Reliance — उससे धीरे-धीरे छीन रही है।

और हर कदम पर एक अदृश्य सा डर, एक खामोश सा प्रेशर… जैसे कोई पर्दे के पीछे से पूरी कहानी को लिख रहा हो — पर आवाज़ सामने आने नहीं दे रहा। क्या यह सब सिर्फ एक businessman की गिरती किस्मत है? या इसके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है? यह कहानी सिर्फ कंपनियों, कर्ज़, ED की पूछताछ या SEBI के नोटिस की नहीं… बल्कि उस इंसान की है जिसने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उसे खुद से ही दूरी बनानी पड़ेगी — अपनी ही legacy से। यह कहानी है Anil Ambani की।

सालों पहले, जब भारत के हर घर में दो ही नाम गूंजते थे — “मुकेश और अनिल”… तब कौन सोच सकता था कि आने वाले सालों में एक भाई दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति बनने की तरफ बढ़ जाएगा… और दूसरा भाई अपनी कंपनियों से भी नाम हटाने पर मजबूर होगा? यह सिर्फ किस्मत का उतार-चढ़ाव नहीं… यह एक पूरा corporate महाभारत है, जिसने अंबानी परिवार को दो हिस्सों में बाँट दिया, मार्केट को हिला दिया, और लाखों Investors को भारी नुकसान में छोड़ दिया।

कहानी शुरू होती है उस वक्त से जब धीरूभाई अंबानी इस दुनिया से चले गए, और एक ऐसा empire पीछे छोड़ गए जो भारत के industrial इतिहास में शायद ही किसी ने खड़ा किया हो। Reliance सिर्फ एक कंपनी नहीं थी — यह एक भावना थी। एक middle-class dream था।

और जब इस सपने का बंटवारा हुआ — तब उस दिन सिर्फ एक property division नहीं हुआ था… बल्कि उस दिन दो रास्ते बन गए थे। एक रास्ता Mukesh Ambani के leadership की तरफ गया — जो शांत, रणनीतिक और लंबे vision वाला माना जाता है। और दूसरा रास्ता Anil Ambani को मिला — जो flamboyant, aggressive और तेज़ growth के लिए जाने जाते थे। दोनों रास्तों की दिशा अलग थी। और असली कहानी यहीं से शुरू हुई।

शुरुआत में सब कुछ perfectly balanced लग रहा था। Anil Ambani को finance, telecom, infrastructure और entertainment जैसे high-potential सेक्टर मिले। R Com — Reliance Communications — उस समय भारत की सबसे चर्चित telecom कंपनी बन रही थी।

मीडिया में उन्हें India का “New Age Business Star” कहा जा रहा था। और सबसे बड़ा झटका तो 2008 में आया… जब Reliance Power का IPO हुआ। यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा IPO था — और 70 गुना oversubscription। लोग दीवानों की तरह शेयर खरीद रहे थे। अनिल अंबानी को उस वक्त “IPO King” तक कहा गया। उस समय ऐसा लग रहा था कि मुकेश और अनिल — दोनों अपनी-अपनी दुनिया बनाकर आगे निकल जाएंगे।

लेकिन… हर empire का एक टूटने वाला क्षण होता है। और अनिल अंबानी के empire में यह क्षण धीरे-धीरे, बहुत चुपचाप, बहुत खामोशी से आया। एक छोटा सा झटका, फिर उससे बड़ा… फिर उससे भी बड़ा — और फिर ऐसा जाल बन गया जिसने पूरी ADAG Group को अंदर से खा लिया।

R Com के कर्ज़ ने सबसे पहले घुटने टेकने शुरू किए। बाजार में competition बढ़ गया, tariffs नीचे गिर गए, और telecom युद्ध में R Com अपने rivals के सामने टिक नहीं पाई। फ़िर एक के बाद एक गलत strategic decisions, expensive spectrum purchases, और कर्ज़ का पहाड़… जिसने कंपनी को दिवालिया प्रक्रिया की तरफ धकेल दिया। धीरे-धीरे कर्ज़ इतना बढ़ गया कि बैंक भी घबरा गए। Creditors ने पूरी कमान अपने हाथों में ले ली — और Anil Ambani को पीछे हटना पड़ा।

फिर आया रिलायंस कैपिटल का पतन। एक समय था जब यह कंपनी 70,000 करोड़ की valuation पर पहाड़ की तरह खड़ी थी — insurance, asset management, lending… हर जगह। लेकिन कर्ज़ ने इसे भी खा लिया। Investors का भरोसा टूट गया। Default की खबरें सामने आने लगीं। और आखिरकार, पूरा समूह resolution के लिए बाहर की कंपनी के हाथों में चला गया। एक businessman के लिए इससे बड़ी हार क्या हो सकती है?

सके बाद Reliance Infrastructure, Reliance Power जैसी कंपनियाँ बची थीं — पर वहाँ भी कर्ज़ ने उन्हें घुटनों पर ला दिया था। Anil Ambani बार-बार कहते रहे कि वे इन कंपनियों को कर्ज़ मुक्त करेंगे, operational profits दिखाएंगे, turnaround करेंगे… लेकिन असल लड़ाई कहीं और चल रही थी। यहीं आता है कहानी का सबसे खतरनाक मोड़ — investigation agencies का घेरा।

जब ED ने पहली बार अनिल अंबानी को पूछताछ के लिए बुलाया, वो सिर्फ एक notice नहीं था — यह एक संकेत था कि कहानी और गहरी है। आरोप मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर FEMA के उल्लंघन तक लगे। कहा गया कि विदेशों में undisclosed assets हैं। कई कंपनियों के financial लेन-देन पर सवाल उठे। और जब नवंबर में ED ने दोबारा बुलावा भेजा, तो बात और गंभीर हो गई।

फिर आया Reliance Infrastructure का वो बयान जिसने पूरे बाजार को चौंका दिया — “अनिल अंबानी कंपनी के रोजाना के management में involved नहीं हैं… वे सिर्फ non-executive director थे… उन्होंने 2022 में ही exit कर दिया था।” एक तरफ investigation agencies का शिकंजा… दूसरी तरफ कंपनियों की ओर से यह साफ संदेश कि “हम अलग हैं… हमारे promoter अलग हैं… उनकी व्यक्तिगत जांच का हमारी कंपनी से कोई लेना-देना नहीं।”

यह सुनकर बाजार समझ गया कि कुछ बहुत बड़ा हो रहा है। क्यों एक कंपनी खुद को अपने ही promoter से अलग कर रही है? क्यों यह distancing इतनी public तरीके से की जा रही है? क्यों यह बताया जा रहा है कि अनिल अंबानी का कोई operational control नहीं है? इसका जवाब वही है — damage control। Companies यह साफ करना चाहती थीं कि “अगर promoter पर कोई कार्रवाई होती है… तो इसका असर कंपनी पर न पड़े, investors डरें नहीं, stock crash न हो।” एक तरह से यह Company vs Promoter का अलगाव था — जो भारत के corporate इतिहास में बहुत rare होता है। फिर आया एक और झटका — SEBI के orders।

SEBI ने कहा कि financial irregularities के चलते अनिल अंबानी को बोर्ड से बाहर रहना चाहिए। यह सिर्फ एक order नहीं था — यह एक reputational blow था। एक समय का biggest business icon… आज अपनी ही कंपनियों के board में नहीं बैठ सकता। और जैसे-जैसे ED, SEBI और CBI का दबाव बढ़ता गया — कंपनियों की तरफ से distancing बढ़ती गई।

इसी बीच शेयर बाजार ने भी अपने verdict दे दिया। Reliance Infrastructure का शेयर 44% टूट गया। Reliance Power 10% गिर गया। Market ने कहा — “हम भरोसा खो रहे हैं। यह सिर्फ एक financial story नहीं है… यह psychological story है। Investor psychology, corporate confidence और public trust — जब ये तीन चीज़ें टूटती हैं, तो कोई भी empire बच नहीं सकता। और अनिल अंबानी का empire टूट चुका था। लेकिन क्या यह सब सिर्फ business decisions की वजह से हुआ? बिल्कुल नहीं।

किसी भी बड़े पतन के पीछे तीन layers होती हैं —
पहली layer: गलत business choices
दूसरी layer: कर्ज़
तीसरी layer: कानून और investigations अनिल अंबानी की story में ये तीनों layers मौजूद हैं। लेकिन चौथी layer भी है — जो rarely दिखाई देती है, और अक्सर सबसे खतरनाक होती है — “strategic silence।” उनका silence बहुत कुछ कहता है। कभी flamboyant personality… public announcements… massive plans… big promises…

आज वही Anil Ambani हर सवाल से बचते हुए, camera से दूर, companies से distance बनाते हुए दिखाई दे रहे हैं। यह सिर्फ डर नहीं — यह दबाव का संकेत है। Invisible pressure. Corporate pressure. Investigative pressure. Political pressure. शायद family pressure भी। इस silence के बीच एक और सवाल छिपा है — क्या उनसे सिर्फ कंपनियों से ही नहीं… बल्कि पूरे corporate ecosystem से दूरी बनाने को कहा गया है?

कई experts मानते हैं कि companies उन्हें धीरे-धीरे legally और operationally हर position से remove कर रही हैं ताकि regulatory shield बन सके — ताकि अगर कल कुछ होता है, तो companies कह सकें कि “we are clean… promoter issues are personal.” लेकिन क्या यह दूरी असली है? या सिर्फ दिखावटी? यह कोई नहीं जानता।

असल परेशानी यह है कि investors का भरोसा टूट चुका है। जब-जब किसी company पर legal investigation होती है, उसका सबसे बड़ा नुकसान promoters को नहीं — investors को होता है। उनके पैसे फंस जाते हैं। उनके सपने डूब जाते हैं। जिन लोगों ने 2008 में हजारों रुपये लगा दिए थे, आज उनके shares practically worthless हैं। यही सबसे painful part है।

Anil Ambani की story का सबसे emotional हिस्सा वही है — कि उनकी companies के साथ crores of Indian middle-class families जुड़ी थीं। उन लोगों ने सपने देखे थे कि Anil Ambani भी अपने भाई की तरह India के future को shape करेंगे। पर बातें उलट गईं। किस्मत पलट गई। और एक ऐसा downfall आया, जैसा भारत के corporate जगत में शायद ही कभी देखा गया हो।

लेकिन क्या यह end है? या यह एक लंबी तैयारी का beginning? कहते हैं कि जो लोग जमीन पर गिरते हैं, वे या तो टूट जाते हैं या फिर बिना आवाज़ के, धीरे-धीरे वापसी की तैयारी करते हैं। Anil Ambani का खामोश चेहरा, उनकी distancing, उनकी low-profile appearance… क्या यह किसी comeback का संकेत है? या यह सिर्फ damage control है?

यह कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात साफ है — उनके पास अब दो ही रास्ते बचे हैं: या तो वे अपनी companies को operational stabilization और debt-clearance के जरिए वापस खड़ा करने की कोशिश करेंगे… या धीरे-धीरे पूरे business landscape से fade out हो जाएंगे।

Conclusion

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