एक शांत रात थी… दुनिया के हर कोने में तेल के टैंकर अपने-अपने Destination की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन वॉशिंगटन डीसी में बैठा एक अमेरिकी सीनेटर अचानक टीवी पर आता है और धमाका कर देता है—“अगर भारत, चीन और ब्राजील ने रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद नहीं किया… तो हम इनकी अर्थव्यवस्था को तबाह कर देंगे!” सोचिए, ये कोई आतंकवादी संगठन की धमकी नहीं थी, ये America की संसद में बैठे एक प्रतिष्ठित राजनेता की सीधी चेतावनी थी—और निशाने पर था भारत। आज हम इसी विषय पर गहराई में चर्चा करेंगे।
आपको बता दें कि आज दुनिया में तेल सिर्फ पेट्रोल पंप पर मिलने वाला ईंधन नहीं, बल्कि एक ऐसा हथियार बन चुका है जिससे देश उठते भी हैं… और गिराए भी जाते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। America चाहता है कि रूस पर हर तरफ से दबाव बढ़े, उसके पास फंडिंग न हो, और वो घुटनों पर आ जाए। लेकिन जब भारत, चीन और ब्राजील जैसे देश रूस से सस्ता तेल खरीदते हैं—तो America इसे अपनी रणनीति के खिलाफ सीधी चुनौती मानता है।
सीनेटर लिंडसे ग्राहम, जो America की रिपब्लिकन पार्टी से हैं, उन्होंने फॉक्स न्यूज पर यह धमकी दी। उन्होंने सीधे-सीधे कहा कि भारत, चीन और ब्राजील अगर रूस से तेल खरीदते रहे, तो America इन देशों की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि रूस के 80% तेल के खरीदार यही तीन देश हैं, और ये पैसा सीधे व्लादिमीर पुतिन की युद्ध मशीनरी को चला जाता है।
ग्राहम इतने गुस्से में थे कि उन्होंने इस पैसे को “ब्लड मनी” यानी खून से सना हुआ पैसा तक कह डाला। उनके अनुसार, ये तीनों देश न केवल रूस से सस्ता तेल लेकर अपने फायदे की सोच रहे हैं, बल्कि युद्ध को अनजाने में या जानबूझकर फंड कर रहे हैं। America को यह बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं है।
इतना ही नहीं, ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथाल ने मिलकर अमेरिकी संसद में एक नया बिल भी पेश कर दिया है। इस बिल का मकसद है—जो भी देश रूस से तेल या गैस खरीदेगा, उस पर 500% तक का Import duty यानी टैरिफ लगाया जाएगा। यानी भारत, चीन या ब्राजील ने अगर रूस से तेल खरीदा, तो उनके America में Export होने वाले प्रोडक्ट्स पर इतना टैक्स लगेगा कि उनकी Global competition खत्म हो जाएगी।
सोचिए, एक तरफ भारत वैश्विक ट्रेड का हिस्सा बनना चाहता है, Investment लाना चाहता है, और दूसरी तरफ सबसे बड़ा सुपरपावर उसे खुलेआम धमका रहा है। अमेरिकी संसद में इस बिल को 85 सांसदों का समर्थन मिल चुका है, जो इसे और भी खतरनाक बनाता है। मतलब ये सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक पॉलिसी का रूप लेने जा रहा है।
इस धमकी के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने NATO महासचिव मार्क रट के साथ मुलाकात में कहा—अगर पुतिन अगले 50 दिनों में यूक्रेन के साथ शांति वार्ता नहीं करते, तो रूस से तेल खरीदने वाले हर देश पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि पुतिन ने ओबामा, बाइडन, क्लिंटन और बुश को चकमा दे दिया था… लेकिन उन्हें ट्रंप को मूर्ख बनाने की गलती नहीं करनी चाहिए।
ट्रंप की इस धमकी में एक राजनीतिक चाल भी छिपी है। वो न केवल रूस पर दबाव बना रहे हैं, बल्कि America के सहयोगी देशों को भी एक लाइन में खड़ा करना चाहते हैं। ट्रंप का यह भी कहना है कि ये टैरिफ सिर्फ सज़ा नहीं, बल्कि रूस को शांति वार्ता के लिए मजबूर करने का तरीका है।
लेकिन भारत ने इस धमकी को सुनते ही चुप्पी नहीं साधी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि भारत रूस से तेल इसलिए खरीद रहा है क्योंकि हमारी ऊर्जा ज़रूरतें विशाल हैं, और हमारी प्राथमिकता देश की आर्थिक स्थिरता है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत ने अपनी चिंताओं और हितों को अमेरिकी सीनेटर ग्राहम के सामने रखा है, और अगर जरूरत पड़ी तो आगे भी विचार करने को तैयार है। लेकिन भारत का रुख बिल्कुल साफ है—राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा किसी भी कूटनीतिक दबाव से बड़ा मुद्दा है।
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि रूस से सस्ता तेल खरीदकर वह न तो किसी युद्ध को समर्थन दे रहा है, और न ही किसी की राजनीति का हिस्सा बनना चाहता है। बल्कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए सबसे किफायती विकल्प चुन रहा है। यह आर्थिक समझदारी है, न कि कोई नैतिक गलती।
यह बात America को शायद समझ नहीं आती या शायद वो समझना नहीं चाहता। क्योंकि America चाहता है कि पूरी दुनिया उसकी नीति के अनुसार चले। लेकिन भारत अब वह देश नहीं है जो आदेश पर चले। यह अब वैश्विक मंच पर अपनी रणनीति खुद तय करता है—कभी रूस के साथ, तो कभी America के साथ—पर हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखते हुए।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को यह सिखा दिया है कि कोई भी देश अब अकेला नहीं है। अगर एक देश पर प्रतिबंध लगता है, तो दूसरा उसके लिए विकल्प बन जाता है। और भारत आज न केवल रूस के लिए, बल्कि खुद के लिए भी एक वैकल्पिक शक्ति बन चुका है।
जहां एक तरफ पश्चिमी देश रूस को अलग-थलग करने में जुटे हैं, वहीं भारत उससे तेल लेकर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इससे भारत को आर्थिक राहत मिलती है, महंगाई काबू में रहती है, और रुपये की मजबूती बनी रहती है। भारत ने इस सस्ते तेल का इस्तेमाल न केवल खुद की जरूरतों के लिए किया, बल्कि रिफाइन करके विदेशों को बेचा भी। अब आप सोचिए, America को इस बात से कितनी जलन हो रही होगी कि भारत एक साथ रूस से भी खरीद रहा है, और पश्चिमी देशों को भी बेच रहा है। भारत की यही रणनीतिक चाल उसे एक Global Balancer बनाती है।
अमेरिका की तरफ से लगाए गए 100% से 500% तक के टैरिफ अगर लागू होते हैं, तो यह केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक युद्ध होगा। और इसका असर सिर्फ भारत पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ेगा। अगर भारत की टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स जैसी इंडस्ट्रीज America में महंगी हो गईं, तो इसका असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। वहां भी महंगाई बढ़ेगी, और यही बात भारत अमेरिका को बार-बार समझाने की कोशिश कर रहा है।
भारत ने यह भी कहा है कि America को इस मामले में सहयोगात्मक रवैया अपनाना चाहिए, न कि धमकी वाला। क्योंकि एक लोकतांत्रिक देश को धमकियों से नहीं, बातचीत से समझाया जाता है। भारत ने अपने रुख में संतुलन बनाए रखा है—एक तरफ रूस से ऊर्जा, दूसरी तरफ America के साथ कूटनीतिक रिश्ते।
ये पूरा मामला सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का है—एक, जो दुनिया को धमकी से चलाना चाहती है; और दूसरी, जो संतुलन बनाकर सबको साथ लेकर चलना चाहती है।
अमेरिका को यह भी याद रखना चाहिए कि भारत अब 1991 वाला भारत नहीं रहा, जो सिर्फ IMF और World Bank के भरोसे चलता था। आज भारत G20 का अध्यक्ष है, वैश्विक मंचों पर मजबूत आवाज़ है, और चीन के बाद एशिया की सबसे बड़ी शक्ति बन चुका है। अगर अमेरिका यह समझता है कि वह भारत पर टैरिफ का डंडा चलाकर उसे झुका लेगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। भारत किसी का समर्थन नहीं करता, भारत केवल भारत का साथ देता है।
आज जब पूरी दुनिया आर्थिक अस्थिरता से गुजर रही है, भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती से संभाला है। इसका बड़ा कारण है—सस्ता तेल। अगर भारत को मजबूर किया गया, तो इसका असर केवल भारत पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा। क्योंकि भारत आज केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ताकत है। अमेरिका को अब यह समझना होगा कि सहयोग ही भविष्य है, टकराव नहीं। और अगर वो भारत जैसे साझेदारों को धमकाना बंद करे, तो वो खुद भी मजबूत रहेगा।
Conclusion
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