Inspiring: AI की असली सीख — डिग्री का मोह छोड़ो, हुनर सीखो! रघुराम राजन की चेतावनी जो भारत को झकझोर देती है I 2025

सोचिए… एक युवा है, हाथ में चमकदार डिग्री, दीवार पर फ्रेम में लगी मार्कशीट, लेकिन जेब खाली है और आंखों में अनिश्चितता। दूसरी तरफ एक प्लंबर है, हाथों में औज़ार, चेहरे पर पसीना, लेकिन महीने के आखिर में स्थिर कमाई, सम्मान और आत्मविश्वास। सवाल उठता है—गलत कौन है? डिग्री वाला युवा या हुनर वाला कामगार? और इससे भी बड़ा सवाल—क्या भारत आज भी बच्चों को उसी रास्ते पर धकेल रहा है जो आने वाले कल में उन्हें बेरोज़गारी की भीड़ में खड़ा कर देगा? यही वो सवाल है, जिसने देश के पूर्व केंद्रीय बैंक प्रमुख रघुराम राजन को चिंता में डाल दिया है।

आपको बता दें कि रघुराम राजन कोई आम टिप्पणीकार नहीं हैं। वे भारत की अर्थव्यवस्था को बेहद करीब से देख चुके हैं—अकादमिक दुनिया से लेकर ग्लोबल फाइनेंस और नीति-निर्माण तक। जब वे कहते हैं कि “डिग्री का मोह छोड़ो, हुनर सीखो,” तो यह कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी है। AI के इस दौर में, जहां हर कोई मशीनों के डर से घिरा हुआ है, राजन एक अलग बात कहते हैं—कुछ काम ऐसे हैं जो खत्म नहीं होंगे। और हैरानी की बात यह है कि भारत अपने बच्चों को उन्हीं कामों के लिए तैयार नहीं कर रहा।

आज भारत में एक अजीब विडंबना है। एक तरफ लाखों युवा हैं, दूसरी तरफ कंपनियां कहती हैं कि उन्हें skilled लोग नहीं मिल रहे। हर साल करोड़ों डिग्रियां बांटी जाती हैं, लेकिन रोजगार पैदा नहीं होता। क्यों? क्योंकि डिग्री और हुनर के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है। राजन इसी खाई की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं कि हम बच्चों को थ्योरी तो सिखा रहे हैं, लेकिन काम करना नहीं सिखा रहे।

AI को लेकर पूरी दुनिया में डर का माहौल है। लोग कह रहे हैं कि मशीनें नौकरियां छीन लेंगी। लेकिन राजन इस डर को थोड़ा अलग नजर से देखते हैं। उनका कहना है कि AI बहुत सी white-collar नौकरियां बदल देगा, लेकिन हाथों से किए जाने वाले कई काम आज भी उतने ही जरूरी रहेंगे। प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, मैकेनिक, एयरक्राफ्ट इंजन रिपेयर करने वाले टेक्नीशियन—इनका काम ऑटोमेशन से बदलना इतना आसान नहीं है। फिर सवाल उठता है—अगर ये काम जरूरी हैं, तो भारत इनके लिए युवाओं को तैयार क्यों नहीं कर रहा?

आज की शिक्षा व्यवस्था को देखिए। स्कूल से लेकर कॉलेज तक एक ही रेस है—अच्छे नंबर लाओ, डिग्री लो, फिर नौकरी ढूंढो। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उस डिग्री से आप असल में कर क्या सकते हैं। कितने बच्चे हैं जो 12वीं पास करने के बाद एक पाइप ठीक कर सकते हैं? कितने ग्रेजुएट्स हैं जो बेसिक मशीन ऑपरेट कर सकते हैं? कितने पोस्ट-ग्रेजुएट्स हैं जो किसी तकनीकी समस्या को हाथों से सुलझा सकते हैं? जवाब अक्सर असहज करने वाला होता है—बहुत कम।

राजन प्लंबिंग का उदाहरण जानबूझकर देते हैं, क्योंकि यह समाज की सोच को आईना दिखाता है। हमारे यहां प्लंबर को अक्सर “कमतर” पेशा माना जाता है। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा इंजीनियर बने, डॉक्टर बने, मैनेजर बने। लेकिन वे यह नहीं देखते कि एक अच्छा प्लंबर, जो अपना काम जानता है, अपने समय की कीमत समझता है और ग्राहक से सही दाम वसूलता है, वह कई डिग्रीधारियों से ज्यादा कमा सकता है। राजन यहां सिर्फ कमाई की बात नहीं कर रहे, वे सम्मान की बात कर रहे हैं।

उन्होंने साफ कहा कि सफलता के लिए सिर्फ डिग्री जरूरी नहीं है। यह बात सुनने में साधारण लगती है, लेकिन भारत जैसे देश में यह एक क्रांतिकारी विचार है। जब राजन कहते हैं कि उन्हें फ्रेंच या अंग्रेजी साहित्य में डिग्री की जरूरत नहीं है और वे खुशी-खुशी मॉडर्न प्लंबिंग का टेक्निकल कोर्स कर सकते हैं, तो वे असल में समाज की सोच पर सवाल उठा रहे होते हैं। क्या हमने डिग्री को जरूरत से ज्यादा महिमामंडित नहीं कर दिया?

इस सोच का असर सिर्फ रोजगार पर नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब लाखों युवा ऐसी डिग्रियां लेकर निकलते हैं जिनका बाजार में कोई सीधा इस्तेमाल नहीं है, तो वे या तो बेरोज़गार रहते हैं या फिर ऐसे काम करते हैं जिनके लिए वे overqualified होते हैं। इससे frustration बढ़ता है, productivity घटती है और समाज में असंतोष पैदा होता है। राजन की चिंता यही है कि भारत इस जाल में फंसता जा रहा है।

लेकिन समस्या सिर्फ सोच की नहीं है, सिस्टम की भी है। राजन कहते हैं कि हमें अप्रेंटिसशिप को गंभीरता से लेना होगा। सीखने का मतलब सिर्फ क्लासरूम में बैठना नहीं है। सीखने का मतलब है किसी अनुभवी व्यक्ति के साथ काम करना, गलती करना, उसे सुधारना और धीरे-धीरे मास्टर बनना। दुनिया के कई विकसित देशों में अप्रेंटिसशिप को सम्मानजनक रास्ता माना जाता है। वहां बच्चा यह कहने में शर्म महसूस नहीं करता कि वह किसी ट्रेड में ट्रेनिंग ले रहा है। भारत में, दुर्भाग्य से, इसे second-class विकल्प माना जाता है।

राजन यह भी कहते हैं कि स्किल्ड ट्रेड्स को सिर्फ हुनर तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसमें एंटरप्रेन्योरशिप भी जुड़ी होनी चाहिए। एक अच्छा प्लंबर सिर्फ पाइप जोड़ना नहीं जानता, उसे यह भी पता होना चाहिए कि अपने काम की कीमत कैसे तय करे, खर्चों का हिसाब कैसे रखे, ग्राहकों से कैसे बात करे और अपने काम को कैसे बढ़ाए। यानी हुनर के साथ-साथ बिजनेस सेंस भी जरूरी है। हमारी शिक्षा प्रणाली इन दोनों को जोड़ने में पूरी तरह विफल रही है।

इस पूरी बहस में एक और गंभीर मुद्दा है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है—बचपन का विकास। राजन ने साफ शब्दों में कहा कि “हम अपने कुछ बच्चों को बचपन में ही फेल कर रहे हैं।” यह वाक्य बहुत भारी है। उनका इशारा कुपोषण की ओर है। भारत में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे हैं, जिनका शारीरिक और मानसिक विकास सही तरह से नहीं हो पाता। अगर शरीर और दिमाग ही पूरी तरह विकसित नहीं होंगे, तो वे भविष्य के कामों की मांग कैसे पूरी करेंगे?

AI, automation और आधुनिक अर्थव्यवस्था सिर्फ स्किल्स नहीं मांगती, बल्कि stamina, focus और adaptability भी मांगती है। कुपोषण से जूझता बच्चा आगे चलकर न तो physically demanding काम कर पाएगा, न ही cognitively complex tasks संभाल पाएगा। राजन चेतावनी देते हैं कि अगर हम 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनना चाहते हैं, तो हम अपने 35% वर्कफोर्स को इतनी नाजुक स्थिति में नहीं छोड़ सकते। कुपोषण को कम करना सिर्फ स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, यह आर्थिक भविष्य का सवाल है।

यहां पर तस्वीर और साफ हो जाती है। एक तरफ हम AI, स्टार्टअप्स और ग्लोबल लीडरशिप की बातें करते हैं। दूसरी तरफ हमारे बच्चे बुनियादी पोषण, बुनियादी शिक्षा और बुनियादी स्किल्स से वंचित हैं। यह विरोधाभास लंबे समय तक नहीं चल सकता। या तो हम अपनी प्राथमिकताएं बदलेंगे, या फिर हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो सपनों और हकीकत के बीच फंसी रहेगी।

राजन की बातों का असली मतलब यही है कि शिक्षा को फिर से परिभाषित करना होगा। शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबें और परीक्षाएं नहीं हैं। शिक्षा का मतलब है जीवन के लिए तैयार होना। इसका मतलब है यह समझना कि हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बनेगा, और न ही बनना चाहिए। समाज को हर तरह के हुनर की जरूरत होती है। जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक बेरोज़गारी और स्किल गैप की समस्या बनी रहेगी।

यह बदलाव आसान नहीं है। माता-पिता की सोच बदलनी होगी, स्कूलों का सिलेबस बदलना होगा, कॉलेजों को इंडस्ट्री से जोड़ना होगा, और सबसे जरूरी—हुनर वाले कामों को सम्मान देना होगा। जिस दिन एक प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या टेक्नीशियन को वही सामाजिक सम्मान मिलेगा जो आज एक कॉर्पोरेट मैनेजर को मिलता है, उस दिन असली बदलाव शुरू होगा। AI का दौर भारत के लिए खतरा भी है और मौका भी। खतरा इसलिए, क्योंकि अगर हम तैयार नहीं हुए तो मशीनें हमारी कमजोरियों को उजागर कर देंगी। मौका इसलिए, क्योंकि अगर हमने सही स्किल्स पर ध्यान दिया, तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा skilled workforce बन सकता है। लेकिन इसके लिए डिग्री का मोह छोड़ना होगा और हुनर को गले लगाना होगा।

रघुराम राजन की चेतावनी दरअसल एक निमंत्रण है—सोच बदलने का, सिस्टम बदलने का और भविष्य के लिए तैयार होने का। यह चेतावनी डराने के लिए नहीं है, बल्कि जगाने के लिए है। क्योंकि अगर हम आज भी यही मानते रहे कि सिर्फ डिग्री ही सफलता की चाबी है, तो आने वाला कल बहुत से युवाओं के लिए बेहद कठोर हो सकता है।

आखिर में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि AI कौन सी नौकरियां खत्म करेगा। असली सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को किस तरह की जिंदगी के लिए तैयार कर रहे हैं। एक ऐसी जिंदगी जहां उनके पास कागज़ पर लिखी डिग्री हो, या एक ऐसी जिंदगी जहां उनके हाथों में ऐसा हुनर हो जिसे कोई मशीन आसानी से छीन न सके। फैसला हमें आज करना है, क्योंकि भविष्य किसी का इंतजार नहीं करता।

Conclusion

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