ज़रा सोचिए… अगर आपको बताया जाए कि 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ था, तब हमारी आर्थिक और कृषि क्षमता चीन के बराबर थी, तो शायद आप यकीन करेंगे। पर अगर मैं कहूं कि आज, 2025 में, चीन की कृषि उत्पादकता भारत से लगभग दो गुना है, तो ये चौंकाने वाला नहीं लगता क्या?
दो देशों ने आज़ादी के बाद लगभग एक जैसी शुरुआत की — दोनों ही कृषि प्रधान अर्थव्यवस्थाएं थीं, दोनों के पास विशाल जनसंख्या थी, और दोनों ने गरीबी मिटाने का वादा किया था। पर सत्तर साल बाद, चीन न केवल भारत से आगे निकल गया, बल्कि उसने Agriculture को अपनी आर्थिक शक्ति का इंजन बना दिया। और भारत? भारत वहीं अटका रहा — सब्सिडियों, नीतियों, और राजनीति के दलदल में।
भारत की कृषि, जिसे कभी “भारत की आत्मा” कहा गया था, आज विकास की सबसे बड़ी पहेली बन चुकी है। अर्थशास्त्री देवेश कपूर इसे “भारत की सबसे अजीब विफलताओं में से एक” बताते हैं। वो कहते हैं — “कोई भी बड़ा देश बिना मजबूत कृषि क्षेत्र के विकसित नहीं हुआ है। और भारत, दुर्भाग्यवश, इस सिद्धांत को भूल गया।”
लेकिन सवाल ये नहीं कि चीन आगे कैसे निकला। असली सवाल ये है — भारत पीछे क्यों रह गया? कौन हैं वो “दुश्मन” जिन्होंने इस बराबरी को होने ही नहीं दिया? क्या वो विदेशी ताकतें थीं? नहीं। वो थे हमारे अपने — हमारी नीतियां, हमारी राजनीति, और वो मानसिकता जिसने किसान को वोट तो बनाया, लेकिन विकास का केंद्र नहीं।
1940 और 1950 के दशक में भारत और चीन दोनों के पास एक जैसा आर्थिक ढांचा था। दोनों देशों की 70% से ज़्यादा आबादी खेती पर निर्भर थी। लेकिन चीन ने क्रांति के बाद Land Reforms को सबसे पहले लागू किया। वहां बड़े जमींदारों की जमीनें जब्त की गईं और किसानों में बांट दी गईं। इसका फायदा ये हुआ कि लाखों छोटे किसान अपनी जमीन के मालिक बन गए, और उन्होंने मेहनत से उत्पादन बढ़ाया। भारत में भी भूमि सुधार की बातें हुईं, लेकिन ज़मींदारों के राजनीतिक प्रभाव ने इसे कभी सही से होने नहीं दिया।
कांग्रेस शासन के शुरुआती वर्षों में ज़्यादातर राज्यस्तरीय नेता खुद Landed Elites से आते थे। यानी जिन्हें जमीनें देनी थीं, वही लोग कानून बना रहे थे। देवेश कपूर कहते हैं, “भारत में भूमि सुधार लोकतंत्र के कारण असंभव हो गए — क्योंकि लोकतंत्र में ताकत उन्हीं के पास थी जिन्हें बदलना था।”
दूसरा बड़ा कारण था — भारत की Federal Structure। कृषि राज्य का विषय था, यानी राज्य सरकारों के नियंत्रण में। केंद्र सरकार नीतियां बना सकती थी, लेकिन अमल राज्यों को करना था। और जब हर राज्य की राजनीति अपनी-अपनी जातियों, वोटबैंकों और स्थानीय गुटों में बंटी हो, तो एक National Vision for Agriculture कभी बन ही नहीं सका।
1960 के दशक में आई Green Revolution ने भारत को अकाल से तो बचाया, लेकिन उसने असमानता को और गहरा किया। पंजाब, हरियाणा, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में गेहूं और धान की पैदावार बढ़ी, लेकिन देश के बाकी हिस्से पीछे रह गए। सरकारों ने खाद, बिजली, और पानी पर सब्सिडी दी — लेकिन किसानों की आय नहीं बढ़ी, सिर्फ़ खर्चे बढ़ गए।
हरित क्रांति का लक्ष्य था — “उपज बढ़ाना।” पर अगले दशकों में, नीतियां “वोट बढ़ाने” की दिशा में चली गईं। किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी और MSP (Minimum Support Price) राजनीतिक हथियार बन गए। नेता किसानों से कहते रहे — “हम तुम्हें कीमत देंगे,” लेकिन किसी ने ये नहीं पूछा कि किसान की उपज यानि (Yield) क्यों नहीं बढ़ रही।
आज भी भारत में एक हेक्टेयर जमीन से औसतन 2.8 टन गेहूं निकलता है। चीन में यही आंकड़ा 5.5 टन है। यानी चीन का किसान, भारत के किसान से लगभग दोगुनी उपज लेता है — वो भी उसी सूरज और बारिश के नीचे। तो आखिर फर्क कहां है? फर्क है सोच में। चीन ने किसानों को innovators बनाया — भारत ने उन्हें beneficiaries बना दिया। चीन में कृषि सुधारों को लेकर जितनी आक्रामक नीतियां आईं, भारत में उतनी ही उलझनें बढ़ती रहीं।
देवेश कपूर कहते हैं — “भारत में कृषि की जो प्रगति हुई है, वो सरकार के नियंत्रण से बाहर हुई है।” यानी जिन क्षेत्रों में सरकार की दखल कम थी, जैसे बागवानी, डेयरी, फल-सब्जी और पोल्ट्री, वहां प्रगति हुई। पर जहां सरकार सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण और खरीद नीति में घुसी रही — जैसे अनाज, वहां विकास रुक गया।
दूध, अंडे, फल और सब्जियां भारत की नई क्रांति बने — क्योंकि वहां किसान खुद प्रयोग करते हैं, बाज़ार तय करते हैं, और सरकारें कम हस्तक्षेप करती हैं। लेकिन गेहूं-धान जैसी पारंपरिक फसलें आज भी उस पुरानी नीतियों के जाल में फंसी हैं, जिन्हें 1970 के दशक में बनाया गया था।
भारत के नेताओं ने कभी किसानों को “उत्पादक” नहीं, बल्कि “उपभोक्ता” की तरह देखा — उन्हें बिजली, पानी और बीज सस्ते देने की राजनीति में उलझा दिया। नतीजा ये हुआ कि किसान आत्मनिर्भर बनने की बजाय सरकारी मदद पर निर्भर हो गया। अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन, जो इस विषय पर देवेश कपूर के साथ काम कर चुके हैं, कहते हैं — “भारत की सबसे बड़ी गलती थी — कृषि को नजरअंदाज करना। हमने इंडस्ट्रियलाइजेशन को प्राथमिकता दी और खेती को पीछे छोड़ दिया।”
भारत की शुरुआती योजनाएं — जैसे महालनोबिस मॉडल — भारी उद्योगों और इस्पात कारखानों पर केंद्रित थीं। सोच ये थी कि उद्योग से रोजगार आएगा और किसान धीरे-धीरे शहरों में आएंगे। लेकिन हुआ उल्टा — उद्योगों को कच्चा माल और labour चाहिए था, जो किसान दे रहा था, पर बदले में किसान को कुछ नहीं मिला।
भारत ने जापान, कोरिया और ताइवान जैसे देशों की राह क्यों नहीं अपनाई — ये भी एक बड़ा सवाल है। इन देशों ने सबसे पहले भूमि सुधार किए, कृषि को उत्पादक बनाया, किसानों की income बढ़ाई — और फिर उद्योगों को बढ़ाया। वहीं भारत ने उल्टा रास्ता लिया — पहले उद्योग बनाए, और बाद में याद आया कि किसान अब भी गरीब है। भारत की GDP का केवल 16% हिस्सा कृषि से आता है, लेकिन यहां की 43% आबादी अब भी खेती पर निर्भर है। यही असंतुलन गरीबी का सबसे बड़ा कारण है।
अब बात करते हैं “तीसरे दुश्मन” की — राजनीतिक लाभ की भूख। भारत की हर सरकार ने किसानों को रियायतें दीं, लेकिन सुधार नहीं। वोटों के लिए बिजली फ्री कर दी, पर सिंचाई व्यवस्था सुधारने की योजना नहीं बनाई। कर्ज़ माफ़ कर दिए, पर मार्केट सुधार पर चुप्पी साध ली। हर बजट में “किसान कल्याण” लिखा गया, लेकिन किसान की वास्तविक income 10 सालों में मुश्किल से 30% बढ़ी।
देवेश कपूर कहते हैं — “भारत के नेताओं में कल्पना की कमी थी। वे अपने वोट बैंक से आगे नहीं देख पाए।” यही वजह है कि भारत में कृषि नीति “status quo” पर अटकी रही। यानी कुछ भी नया करने से डरना, कहीं कोई असंतोष न फैल जाए।
भारत में हर बार जब कोई सरकार सुधार करने की कोशिश करती है, तो विरोध शुरू हो जाता है। 2020 के कृषि कानून इसका उदाहरण हैं। तीनों कानूनों का उद्देश्य था बाजार खोलना, लेकिन संवाद और भरोसे की कमी ने किसानों को डरा दिया। नतीजा — सरकार को पीछे हटना पड़ा। ये विफलता सिर्फ़ सरकार की नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सोच की है। हम बदलाव से डरते हैं। और जो समाज बदलाव से डरता है, वो बराबरी हासिल नहीं कर सकता।
भारत में “सब्सिडी पॉलिटिक्स” ने एक और नुकसान किया — Innovation की कमी। चीन के किसान नई तकनीक अपनाने में सबसे तेज़ हैं। वहां ड्रोन से कीटनाशक छिड़कना, मिट्टी की digital mapping, और AI आधारित सिंचाई सिस्टम आम हो चुके हैं। भारत में अब भी किसान फसल देखकर मौसम का अनुमान लगाता है।
भारत में कृषि अनुसंधान (R&D) पर खर्च GDP का सिर्फ़ 0.6% है। चीन इसका तीन गुना खर्च करता है। इसलिए वहां नई किस्में, नए hybrid seeds, और efficient irrigation systems लगातार बनते रहते हैं। अब सोचिए — जब इन सब चीजों की नींव कमजोर हो, तो उत्पादन कैसे बढ़ेगा?
भारत की एक और विफलता है Agricultural education और Training की कमी। हमारे कृषि विश्वविद्यालय डिग्रियाँ तो देते हैं, पर किसानों तक ज्ञान नहीं पहुंचाते। नतीजा — किसान पुरानी तकनीक पर अटका रहता है, और सरकारी अधिकारी सिर्फ़ फाइलों में आंकड़े सुधारते हैं। आज चीन में एक औसत किसान हर साल अपनी भूमि से करीब 2,000 dollar की कमाई करता है, जबकि भारत में यही आंकड़ा 800 dollar है। ये सिर्फ़ पैदावार का अंतर नहीं — ये सोच, नीति और नेतृत्व का अंतर है।
भारत की हर नई सरकार ने “कृषि सुधार” का नारा तो दिया, लेकिन किसी ने भूमि पट्टा व्यवस्था, ठोस मार्केट रिफॉर्म, या लॉजिस्टिक्स सुधार की तरफ कदम नहीं बढ़ाए। किसान आज भी अपनी फसल को मंडी तक पहुंचाने में 15% लागत खर्च कर देता है। और जब बाजार में पहुंचती है, तो बिचौलिया 40% मुनाफा ले जाता है।
कृषि में असमानता का एक और चेहरा है — महिला किसान। भारत में 40% किसान महिलाएं हैं, लेकिन उनके नाम पर सिर्फ़ 12% जमीन है। यानी मेहनत वही करती हैं, लेकिन मालिक कोई और होता है। यही सामाजिक असंतुलन भारत की कृषि को और कमजोर बनाता है। अब सवाल ये उठता है — क्या भारत अभी भी चीन को पकड़ सकता है? जवाब है — हाँ, लेकिन उसके लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी।
भारत को “सहायता” नहीं, “सशक्तिकरण” की नीति चाहिए। सब्सिडी की जगह हमें Innovation, Research और Market Reform में निवेश करना होगा। किसानों को डिजिटल टेक्नोलॉजी, डेटा एनालिटिक्स, और जलवायु आधारित खेती सिखानी होगी।
हमें उस सोच से बाहर निकलना होगा जिसमें किसान सिर्फ़ “मतदाता” है। उसे एक “उद्यमी” बनाना होगा। जैसे चीन ने अपने किसानों को “Agri Entrepreneurs” बनाया — जिनके पास अपने ब्रांड, अपनी supply chains, और अपनी export deals हैं। भारत के पास आज भी वो क्षमता है। हमारे पास दुनिया का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र है, सबसे विविध फसलें हैं, और सबसे मेहनती किसान हैं। बस जरूरत है एक ऐसे सिस्टम की, जो उन्हें रोके नहीं, बल्कि उड़ान दे।
अगर भारत आने वाले दशक में भूमि सुधार, कृषि शिक्षा, और R&D पर सही निवेश करे, तो वो चीन को पकड़ सकता है — और कुछ क्षेत्रों में आगे भी निकल सकता है। लेकिन अगर हम अभी भी सब्सिडी, MSP, और कर्ज़ माफी की राजनीति में उलझे रहे, तो हम सिर्फ़ “चुनाव जीतेंगे,” किसान नहीं। चीन और भारत की यह तुलना सिर्फ़ आंकड़ों की नहीं, बल्कि एक Vision की है। चीन ने अपने किसानों को शक्ति दी, भारत ने उन्हें सहारा दिया। फर्क यही है — शक्ति स्थायी होती है, सहारा अस्थायी।
इस कहानी का अंत निराशाजनक नहीं होना चाहिए। क्योंकि बदलाव संभव है — और कई जगहों पर शुरू भी हो चुका है। महाराष्ट्र में drip irrigation की सफलताएं हैं, गुजरात में cooperative farming का नया मॉडल है, केरल में women-led farming groups हैं, और पंजाब में organic farmers का rising network है। ये वही भारत है जो अगर एकजुट हो जाए, तो चीन को भी पीछे छोड़ सकता है।
Conclusion
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